श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)
Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)
श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा
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६६४ श्रीरामकृष्णवचनामृत २९ सितम्बर, १८८४
रामलाल से कहा है, ‘बाबा से आने के लिए कहना। हम लोग उनसे कुछ माँगेंगे नहीं।’ उसकी बातें सुनकर मेरी आँखों में आँसू भर आये।
“हाजरा की माँ ने रामलाल से कहा है, ‘प्रताप (हाजरा) से एक बार आने के लिए कहना। और अपने चाचा (श्रीरामकृष्ण) से मेरा नाम लेकर कहना जिससे वे उसे आने के लिए कहें।’ मैंने हाजरा से कहा; उसने कुछ ध्यान ही नहीं दिया।
“माँ का स्थान कितना ऊँचा है! चैतन्यदेव ने कितना समझाया था, तब माँ के पास से आ सके थे। शची ने कहा था, ‘मैं केशव भारती को काट डालूँगी!’ चैतन्यदेव ने बहुत तरह से समझाया। कहा, ‘माँ, तुम्हारी आज्ञा जब तक न होगी, तब तक मैं न जाऊँगा; परन्तु अगर मुझे संसार में रखोगी, तो मेरा शरीर न रह जायगा। और माँ जब तुम मेरी याद करोगी, तभी मैं तुमसे मिलूँगा। मैं पास ही रहा करूँगा। कभी कभी तुमसे मिल जाया करूँगा।’ तब शची ने आज्ञा दी।
“माँ जब तक थीं, तब तक नारद तपस्या के लिए नहीं निकल सके। माता की सेवा करते थे न? माता की देह छूट जाने पर वे साधना के लिए निकले थे।
“वृन्दावन जाकर फिर वहाँ से मेरी लौटने की इच्छा ही नहीं हुई। गंगा माँ के पास रहने का विचार हुआ। सब ठीक हो गया कि इस ओर मेरा बिस्तरा लगाया जायगा, उस ओर गंगा माँ का। अब कलकत्ता न जाऊँगा। केवट का अन्न और कितने दिन खाऊँ? तब हृदय ने कहा, नहीं, तुम कलकत्ता चलो। एक ओर वह खींचता था, एक ओर गंगा माँ। मेरी तो रहने की इच्छा अधिक थी; इसी समय माँ की याद आ गयी। बस सब ठाट बदल गया। माँ बुड्ढी हो गयी थीं। सोचा, माँ की चिन्ता करने लगूँगा तो ईश्वर-फीश्वर का भाव सब उड़ जायगा। अतएव माँ के पास ही चलकर रहना चाहिए। वहीं जाकर ईश्वरचिन्ता करूँगा, निश्चिन्त होकर।
(नरेन्द्र से) “तुम जरा उससे कहो न। मुझसे उस दिन कहा था कि देश जायेगा, जाकर तीन दिन रहेगा। परन्तु फिर ज्यों का त्यों हो गया।
(भक्तों से) “आज घोषपाड़ा-फोसपाड़ा की कैसी सब वाहियात बातें हुईं। गोविन्द! गोविन्द! गोविन्द! अब जरा ईश्वर का नाम लो। उड़द की दाल के बाद पायस-लड्डू हो जाय।”
नरेन्द्र गा रहे हैं।
“निरंजन पुरातन पुरुष एक हैं, अरे तू उन पर अपने चित्त को लगा दे। वे आदि-सत्य हैं, वे कारण (माया) के भी कारण हैं। प्राणरूप से वे चराचर में व्याप्त हैं। वे स्वतः प्रकाशित और ज्योतिर्मय हैं। सब के आश्रय हैं। जिसका उन पर विश्वास होता है, वह उनके दर्शन करता है। वे अतीन्द्रिय भूमि में रहते हैं, नित्य और चैतन्यस्वरूप हैं।” इत्यादि।
नरेन्द्र एक गाना और गा रहे हैं। श्रीरामकृष्ण उठकर नाचने लगे। उन्हें घेरकर
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