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श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)

श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा

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६६८ श्रीरामकृष्णवचनामृत १ अक्टूबर, १८८४

केदार – (विनयपूर्वक) – बहुत से आदमी खिलाने के लिए आते हैं। क्या करूँ? कोई आज्ञा दीजिये।

श्रीरामकृष्ण – भक्ति होने पर चाण्डाल का भी अन्न खाया जा सकता है। सात वर्ष की उन्माद-अवस्था के बाद मैं उस देश में (कामारपुकुर) गया। तब कैसी कैसी अवस्थाएँ थीं! वेश्याओं तक ने खिलाया, परन्तु अब वह सब नहीं होता।

केदार जाने को उठे।

केदार – (धीमी आवाज में) – महाराज, आप मुझ में कुछ शक्ति-संचार कर दीजिये, बहुत से लोग मेरे पास आते हैं, मुझे क्या ज्ञान है?

श्रीरामकृष्ण – अजी, सब हो जायगा, आन्तरिक भक्ति के रहने पर सब हो जाता है।

केदार के बिदा होने के पहले बंगवासी के सम्पादक श्रीयुत योगेन्द्र ने आकर प्रवेश किया। श्रीरामकृष्ण को प्रणाम करके उन्होंने आसन ग्रहण किया। साकार निराकार की बात होने लगी।

श्रीरामकृष्ण – वे साकार हैं, निराकार हैं और भी क्या क्या हैं, यह सब हम लोग क्या जानें? केवल निराकार कहने से कैसे काम चलेगा?

योगेन्द्र – ब्राह्म-समाज की एक बात बड़े आश्चर्य की है। बारह वर्ष का लड़का है, उसे भी निराकार ही सूझता है! आदि-समाजवाले साकार पर विशेष आपत्ति नहीं करते। दुर्गा पूजा के समय वे लोग भलेमानसों के घर भी जा सकते हैं।

श्रीरामकृष्ण – (हँसकर) – उन्होंने ठीक कहा, उसे भी निराकार ही सूझता है!

अधर – शिवनाथ बाबू साकार नहीं मानते।

विजय – वह उनके समझने की भूल है। ये जैसा कहते हैं, गिरगिट कितने ही रंग बदलता रहता है; जो पेड़ के नीचे रहता है, वही जान सकता है। मैंने ध्यान करते हुए मूर्तियाँ देखी। कितने ही देवता थे! उन्होंने बहुत कुछ कहा! मैंने मन में कहा, 'मैं उनके (श्रीरामकृष्ण के) पास जाऊँगा, ये बातें तभी मेरी समझ में आयेंगी।'

श्रीरामकृष्ण – तुमने ठीक देखा है।

केदार – भक्तों के लिए वे साकार हैं। भक्त प्रेम से उन्हें साकार देखता है। ध्रुव ने जब उनके दर्शन किये, तब पूछा, आपके कुण्डल क्यों नहीं हिल रहे हैं? श्रीठाकुरजी ने कहा, हिलाओं तो हिलें।

श्रीरामकृष्ण – सब मानना चाहिए जी – निराकार और साकार सब मानना चाहिए। काली-मन्दिर में ध्यान करते हुए मैंने देखी, एक वेश्या। मैंने कहा, माँ, तू इस रूप में भी है। इसीलिए कहता हूँ, सब मानना चाहिए। वे कब किस रूप से दर्शन देते हैं, सामने आते हैं, यह कहा नहीं जा सकता।