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श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)

श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा

DevanagariHindipublished711 पृष्ठ

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१ अक्टूबर, १८८४परिच्छेद १५६६७

ने कीर्तन समाप्त किया। फिर श्रीराधाकृष्ण का मिलन गाया जाने लगा। श्रीरामकृष्ण मारे आनन्द के नृत्य करने लगे। साथ साथ भक्तगण भी उन्हें घेरकर नाचने और गाने लगे। कीर्तन हो जाने पर सब ने आसन ग्रहण किया।

श्रीरामकृष्ण – (विजय से) – ये बहुत अच्छा गाते हैं।

यह कहकर उन्होंने वैष्णवचरण को इशारे से बतला दिया। फिर 'गौरांग-सुन्दर' गाने के लिए उनसे कहा। वैष्णवचरण गाने लगे।

गाना समाप्त हो जाने पर श्रीरामकृष्ण विजय से पूछते हैं “कैसा रहा?” –

विजय – सुनकर तो मुझे आश्चर्य हो रहा है।

इसके बाद बड़ी देर तक कीर्तनानन्द होता रहा।

(३)

साकार-निराकार की कथा। चीनी का पहाड़

केदार और कई भक्त घर जाने के लिए उठे। केदार ने श्रीरामकृष्ण को प्रणाम किया, और कहा, आज्ञा हो तो अब चले।

श्रीरामकृष्ण – तुम अधर से बिना कहे ही चले जाओगे, अभद्रता न होगी?

केदार – तस्मिन् तुष्टे जगत् तुष्टम्। जब आप रहे तो सब का रहना हुआ। अभी मेरी तबीयत भी कुछ खराब है और फिर विवाह आदि के लिए जरा कुछ डर भी लगता है। समाज ही तो है – एक बार गड़बड़ हो भी चुका है।*

विजय – क्या इन्हें (श्रीरामकृष्ण को) छोड़कर जायेंगे?

इसी समय श्रीरामकृष्ण को ले जाने के लिए अधर आये। भीतर पत्तलें पड़ चुकी थीं। श्रीरामकृष्ण उठे। विजय और केदार से कहा – “आओ जी मेरे साथ।” विजय, केदार और दूसरे भक्तों ने श्रीरामकृष्ण के साथ बैठकर प्रसाद पाया।

भोजन के बाद श्रीरामकृष्ण एक बार फिर बैठकखाने में आकर बैठे। केदार, विजय और दूसरे भक्त चारों ओर बैठे।

केदार ने हाथ जोड़कर बड़े ही विनयपूर्ण शब्दों में श्रीरामकृष्ण से कहा – 'मैं टाल-मटोल कर रहा था, मुझे क्षमा कीजिये।'

केदार ढाका में काम करते हैं। वहाँ बहुत से भक्त उनके पास आते हैं और उन्हें खिलाने के लिए सन्देश आदि बहुत तरह की चीजें ले आया करते हैं। केदार यही सब बातें श्रीरामकृष्ण से कह रहे हैं।


* अधर केदार की अपेक्षा कुछ नींची जाति के थे। केदार ब्राह्मण थे इसलिए वे न तो अधर के घर पर खा सकते थे और न उनके साथ ही।