श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)
Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)
श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा
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परिच्छेद ९५
भक्तों के साथ कीर्तनानन्द
(१)
अधर के मकान पर
आज आश्विन शुक्ला एकादशी है। बुधवार, १ अक्टूबर, १८८४। श्रीरामकृष्ण दक्षिणेश्वर से अधर के यहाँ आ रहे हैं। साथ में नारायण और गंगाधर हैं। रास्ते में एकाएक श्रीरामकृष्ण को भावावेश हो गया। श्रीरामकृष्ण भावावेश में कह रहे हैं - “मैं माला जपूँगा? छिः! ये शिव पाताल फोड़कर निकले हुए शिव हैं, स्वयम्भू लिंग।”
वे अधर के यहाँ पहुँचे। वहाँ बहुत से भक्त एकत्रित हुए हैं। केदार, विजय, बाबूराम आदि सब आये हैं। कीर्तनिया वैष्णवचरण आये हुए हैं। श्रीरामकृष्ण की आज्ञानुसार, रोज आफिस से आते ही, अधर वैष्णवचरण का कीर्तन सुनते हैं। वैष्णवचरण बड़ा मधुर कीर्तन करते हैं।
आज भी संकीर्तन होगा। श्रीरामकृष्ण अधर के बैठकखाने में गये। भक्तमण्डली उन्हें देखकर खड़ी हो गयी और चरण-वन्दना करने लगी। श्रीरामकृष्ण ने प्रसन्न-चित्त से आसन ग्रहण किया। उसके बाद उन लोगों ने भी आसन ग्रहण किया। केदार और विजय ने श्रीरामकृष्ण को प्रणाम किया। श्रीरामकृष्ण ने बाबूराम और नारायण से उन्हें प्रणाम करने के लिए कहा, फिर कहा, आप लोग आशीर्वाद दें, जिससे इन्हें भक्ति हो। नारायण को दिखाकर बोले, यह बड़ा सरल है। भक्तगण नारायण और बाबूराम को देख रहे हैं।
श्रीरामकृष्ण - (केदार आदि भक्तों से) - तुम्हारे साथ रास्ते में मुलाकात हुई, नहीं तो तुम लोग काली-मन्दिर जाते। ईश्वर की इच्छा से मुलाकात हो गयी।
केदार - (विनयपूर्वक) - जो ईश्वर की इच्छा है, वही आपकी इच्छा है। (श्रीरामकृष्ण हँस रहे हैं।)
(२)
भक्तों के साथ कीर्तनानन्द
अब कीर्तन शुरू हुआ। अभिसार से आरम्भ करके रासलीला कहकर वैष्णवचरण
CC-0. In Public Domain. Gurukul Kangri Collection, Haridwar