श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)
Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)
श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| ५ अगस्त, १८८२ | परिच्छेद ७ | ४७ |
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महाकाल ही जानते हैं। वैसा और कोई नहीं समझ सकता। उसको जानने का लोगों का प्रयास देखकर ‘प्रसाद’ हँसता है। अपार सागर क्या कोई तैरकर पार कर सकता है? यह मेरा मन समझ रहा है, परन्तु फिर भी जी नहीं मानता, वामन होकर चन्द्रमा की ओर हाथ बढ़ाता है।’
“सुना? कहते हैं – माता के जिस उदर में ब्रह्माण्ड समाया हुआ है समझो कि वह कितना बड़ा है’ और यह भी कहा है कि षड्दर्शनों ने उसका दर्शन नहीं पाया। पाण्डित्य द्वारा उसे प्राप्त करना असम्भव है।
विश्वास का बल – ईश्वर के प्रति विश्वास तथा महापातक
“विश्वास और भक्ति चाहिए। विश्वास कितना बलवान है, सुनो। किसी मनुष्य को लंका से समुद्र के पार जाना था। विभीषण ने कहा – इस वस्तु को कपड़े के छोर में बाँध लो तो बिना किसी बाधा के पार हो जाओगे, जल के ऊपर से चल कर जा सकोगे; परन्तु खोलकर न देखना, खोलकर देखोगे तो डूब जाओगे। वह मनुष्य आनन्दपूर्वक समुद्र के ऊपर से चला जा रहा था, विश्वास की ऐसी शक्ति है। कुछ रास्ता पार कर वह सोचने लगा कि विभीषण ने ऐसा क्या बाँध दिया, जिसके बल से मैं पानी के ऊपर से चला जा रहा हूँ! यह सोचकर उसने गाँठ खोली और देखा तो एक पत्ते पर केवल ‘रामनाम’ लिखा था! तब वह मन ही मन कहने लगा – अरे, बस यही है! ज्योंही यह सोचा कि डूब गया।
“यह कहावत प्रसिद्ध है कि रामनाम पर हनुमान का इतना विश्वास था कि विश्वास ही के बल से वे समुद्र लाँघ गये, परन्तु स्वयं राम को सेतु बाँधना पड़ा था।
“यदि उन पर विश्वास हो तो चाहे पाप करे और चाहे महापातक ही करे, किन्तु किसी से भय नहीं होता।”
यह कहकर श्रीरामकृष्ण भक्त के भावों से मस्त होकर विश्वास का माहात्म्य गा रहे हैं –
(भावार्थ) – “दुर्गा दुर्गा अगर जपूँ मैं, जब मेरे निकलेंगे प्राण।
देखूँ कैसे नहीं तारती, कैसे हो करुणा की खान।”
(६)
जीवन का उद्देश्य – ईश्वरप्रेम
“विश्वास और भक्ति। भक्ति से वे सहज ही में मिलते हैं। वे भाव के विषय हैं।”
यह कहते हुए श्रीरामकृष्ण ने फिर भजन आरम्भ किया। भाव यह है –
“मन तू अँधेरे घर में पागल जैसा उसकी खोज क्यों कर रहा है? वह तो भाव का