श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)
Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)
श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| ४८ | श्रीरामकृष्णवचनामृत | ५ अगस्त, १८८२ |
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विषय है। बिना भाव के, अभाव द्वारा क्या कोई उसे पकड़ सकता है? पहले अपनी शक्ति द्वारा कामक्रोधादि को अपने वश में करो। उसका दर्शन न तो षड्दर्शनों ने पाया, न निगमागम-तन्त्रों ने। वह भक्तिरस का रसिक है, सदा आनन्दपूर्वक हृदय में विराजमान है। उस भक्तिभाव को पाने के लिए बड़े बड़े योगी युग-युगान्तर से योग कर रहे हैं। जब भाव का उदय होता है, तब भक्त को वह अपनी ओर खींच लेता है। जैसे लोहे को चुम्बक। ‘प्रसाद’ कहता है कि मैं मातृभाव से जिसकी खोज कर रहा हूँ, उसके तत्त्व का भण्डा क्या मुझे चौराहे पर फोड़ना होगा? मन, इशारे से ही समझ लो।”
श्रीरामकृष्ण समाधि में
गाते हुए श्रीरामकृष्ण समाधिस्थ हो गए, हाथों की अंजलि बँध गयी – देह उन्नत और स्थिर, – नेत्र स्पन्दहीन हो गए। पश्चिम की ओर मुँह किये उसी बेंच पर पैर लटकाए बैठे रहे। सभी लोग गर्दन ऊँची करके यह अद्भुत अवस्था देखने लगे। पण्डित विद्यासागर भी चुपचाप एकटक देख रहे हैं।
श्रीरामकृष्ण प्रकृतिस्थ हुए। लम्बी साँस छोड़कर फिर हँसते हुए बातें कर रहे हैं – “भाव भक्ति, इसके माने उन्हें प्यार करना। जो ब्रह्म हैं, उन्हीं को माँ कहकर पुकारते हैं।
“‘प्रसाद कहता है कि मैं मातृभाव से जिसकी खोज कर रहा हूँ उसके तत्त्व का भण्डा क्या मुझे चौराहे पर फोड़ना होगा? मन, इशारे ही से समझ लो।’
“रामप्रसाद मन को इशारे ही से समझने के लिए उपदेश करते हैं। यह समझने को कहते हैं कि वेदों ने जिन्हें ब्रह्म कहा है उन्हीं को मैं माँ कहकर पुकारता हूँ। जो निर्गुण हैं वे ही सगुण हैं; जो ब्रह्म हैं वे ही शक्ति हैं। जब यह बोध होता है कि वे निष्क्रिय हैं तब उन्हें ब्रह्म कहता हूँ और जब यह सोचता हूँ कि वे सृष्टि, स्थिति और प्रलय करते हैं, तब उन्हें आद्याशक्ति काली कहता हूँ।
“ब्रह्म और शक्ति अभेद हैं, जैसे कि अग्नि और उसकी दाहिकाशक्ति। अग्नि कहते ही दाहिकाशक्ति का ज्ञान होता है और दाहिकाशक्ति कहने से अग्नि का ज्ञान। एक को मानिए तो दूसरा भी साथ मान लिया जाता है।
“उन्हीं को भक्तजन माँ कहकर पुकारते हैं। माँ बड़े प्यार की वस्तु है न। ईश्वर को प्यार करने से वे प्राप्त होते हैं; भाव, भक्ति, प्रीति और विश्वास चाहिए। एक गाना और सुनो –
भाव और विश्वास
(भावार्थ) – “‘चिन्तन करने से भाव का उदय होता है। जैसा भाव होगा, लाभ भी वैसा होगा, मूल है प्रत्यय। काली के चरण-सुधासागर में यदि चित्त डूब जाय तो पूजा-होम, याग-यज्ञ – कुछ भी आवश्यक नहीं।’”