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श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)

श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा

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५० श्रीरामकृष्णवचनामृत ५ अगस्त, १८८२

फिर कुछ दिन बीतने पर और आगे बढ़ा और देखा तो सोने की खान मिली। फिर क्रमशः हीरे की - मणियों की। वह सब लेकर वह मालामाल हो गया।

“निष्काम कर्म कर सकने से ईश्वर पर प्रेम होता है। क्रमशः उनकी कृपा से उन्हें लोग पाते भी हैं। ईश्वर के दर्शन होते हैं, उनसे बातचीत होती है जैसे कि मैं तुमसे वार्तालाप कर रहा हूँ।” (सब निःशब्द हैं।)

(७)

अहेतुक कृपासिन्धु श्रीरामकृष्ण

सब की जबान बन्द हैं। लोग चुपचाप बैठे ये बातें सुन रहे हैं। श्रीरामकृष्ण की जिह्वा पर मानो साक्षात् वाग्वादिनी बैठी हुई जीवों के हित के लिए विद्यासागर से बातें कर रही हैं। रात हो रही है - नौ बजने को है। श्रीरामकृष्ण अब चलनेवाले हैं।

श्रीरामकृष्ण (विद्यासागर से, सहास्य) - यह सब जो कहा, वह तो ऐसे ही कहा। आप सब जानते हैं, किन्तु अभी आपको इसकी खबर नहीं। (सब हँसे।) वरुण के भण्डार में कितने ही रत्न पड़े हैं, परन्तु वरुण महाराज को कोई खबर नहीं।

विद्यासागर (हँसते हुए) - यह आप कह सकते हैं।

श्रीरामकृष्ण (सहास्य) - हाँ जी, अनेक बाबू नौकरों के नाम तक नहीं जानते! (सब हँसते हैं।) घर में कहाँ कौनसी कीमती चीज पड़ी है, वे नहीं जानते।

वार्तालाप सुनकर लोग आनन्दित हो रहे हैं। थोड़ी देर के लिए सब लोग शांत हो गए। श्रीरामकृष्ण विद्यासागर से फिर प्रसंग उठाते हैं।

श्रीरामकृष्ण (हँसमुख) - एक बार बगीचा देखने जाइए, रासमणि का बगीचा बड़ी अच्छी जगह है।

विद्यासागर - जरूर जाऊँगा। आप आए और मैं न जाऊँगा?

श्रीरामकृष्ण - मेरे पास? राम राम

विद्यासागर - यह क्या! ऐसी बात आपने क्यों कही? मुझे समझाइए।

श्रीरामकृष्ण (सहास्य) - हम लोग छोटी छोटी किश्तियाँ हैं जो खाई, नाले और बड़ी नदियों में भी जा सकती हैं। परन्तु आप हैं जहाज; कौन जानता है, जाते समय रेत में लग जाय! (सब हँसते हैं।)

विद्यासागर प्रफुल्लमुख किन्तु चुपचाप बैठे हैं। श्रीरामकृष्ण हँसते हैं।

श्रीरामकृष्ण - पर हाँ, इस समय जहाज भी जा सकता है।

विद्यासागर - (हँसते हुए) - हाँ, ठीक है, यह वर्षाकाल है। (लोग हँसे।)

मास्टर (स्वगत्) - नवानुराग की वर्षा, नवानुराग जब होता है, तब मान-अपमान का बोध क्या रह सकता है।