श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)
Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)
श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| ५ अगस्त, १८८२ | परिच्छेद ७ | ५१ |
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श्रीरामकृष्ण उठे। भक्तजन भी उठे। विद्यासागर आत्मीयों के साथ खड़े हैं, श्रीरामकृष्ण को गाड़ी पर चढ़ाने जाएँगे।
श्रीरामकृष्ण अब भी खड़े हैं। करजाप कर रहे हैं। जपते हुए भाव के आवेश में आ गए, मानो विद्यासागर के आत्मिक हित के लिए परमात्मा से प्रार्थना करते हों।
भक्तों के साथ श्रीरामकृष्ण उतर रहे हैं। एक भक्त हाथ पकड़े हुए हैं। विद्यासागर स्वजन-बन्धुओं के साथ आगे आगे जा रहे हैं, हाथ में बत्ती लिए रास्ता दिखाते हुए। सावन की कृष्णपक्ष की षष्ठी है, अभी चन्द्रोदय नहीं हुआ है। अँधेरे से ढकी हुई उद्यान-भूमि को बत्ती के मन्द प्रकाश के सहारे किसी तरह पार कर लोग फाटक की ओर आ रहे हैं।
भक्तों के साथ श्रीरामकृष्ण फाटक के पास ज्योंही पहुँचे त्योंही एक सुन्दर दृश्य ने सब को चकित कर दिया। सामने एक दाढ़ीवाले, गौरवर्ण पुरुष खड़े थे। उम्र छत्तीस-सैंतीस वर्ष की होगी। बंगालियों की तरह पोशाक थी पर सिर पर सिक्खों की तरह शुभ्र साफा बँधा था। उन्होंने श्रीरामकृष्ण को देखते ही भूमि पर मस्तक रखकर प्रणाम किया। उनके उठ खड़े होने पर श्रीरामकृष्ण ने कहा, “बलराम तुम हो? इतनी रात को?”
बलराम (हँसकर) – मैं बड़ी देर से आया हूँ।
श्रीरामकृष्ण – भीतर क्यों नहीं गए?
बलराम – जी, लोग आपका वार्तालाप सुन रहे थे। बीच में पहुँचकर क्यों शान्ति भंग करूँ, यह सोचकर नहीं गया।
यह कहकर बलराम हँसने लगे।
श्रीरामकृष्ण भक्तों के साथ गाड़ी पर बैठ गए।
विद्यासागर (मास्टर से धीमी आवाज में) – गाड़ी का किराया क्या दे दें?
मास्टर – जी नहीं, दे दिया गया है।
विद्यासागर और अन्यान्य लोगों ने श्रीरामकृष्ण को प्रणाम किया।
गाड़ी उत्तर की ओर चलने लगी, दक्षिणेश्वर काली मन्दिर को जाएगी। सब लोग गाड़ी की ओर देखते हुए खड़े हैं। सोच रहे हैं – ये महापुरुष कौन हैं? ये ईश्वर पर कितना प्रेम करते हैं फिर जीवों के घर घर जाकर कहते हैं कि ईश्वर पर प्रेम करना ही जीवन का उद्देश्य है।
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