श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)
Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)
श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२४ अगस्त, १८८२
परिच्छेद ९
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से चिलम भरता है। कामिनी और कांचन की आँधी, तूफान से निकल जाने पर शान्ति मिलती है।
श्रीरामकृष्ण तथा योगतत्त्व - योगभ्रष्ट - योगावस्था -
"निवातनिष्कम्पमिव प्रदीपम्" - योग के विघ्न
“किसी किसी में योगियों के लक्षण दीखते हैं परन्तु उन लोगों को भी सावधानी से रहना चाहिए। कामिनी और कांचन ही योग में विघ्न डालते हैं। योगभ्रष्ट होकर साधक फिर संसार में आता है, – भोग की कुछ इच्छा रही होगी। इच्छा पूरी होने पर वह फिर ईश्वर की ओर जाएगा - फिर वही योग की अवस्था होगी। 'सटका' कल जानते हो?”
मास्टर – जी नहीं।
श्रीरामकृष्ण – उस देश में है*। बाँस को झुका देते हैं। उसमें बंसी और डोर लगी रहती है। काँटे में मछलियों के खाने का चारा बेध दिया जाता है। ज्योंही मछली उसे निगल जाती है, त्योंही वह बाँस झटके के साथ ऊपर उठ जाता है। जिस प्रकार उसका सिर ऊँचा था वैसा ही हो जाता है।
“तराजू में किसी ओर कुछ रख देने से नीचे की सुई और ऊपर की सुई दोनों बराबर नहीं रहतीं। नीचे की सुई मन है और ऊपर की सुई ईश्वर। नीचे की सुई का ऊपर की सुई से एक होना ही योग है।
“मन के स्थिर हुए बिना योग नहीं होता। संसार की हवा मनरूपी दीपशिखा को सदा ही चंचल किया करती है। वह शिखा यदि जरा भी न हिले तो योग की अवस्था हो जाती है।
“कामिनी और कांचन योग के विघ्न हैं। वस्तुविचार करना चाहिए। स्त्रियों के शरीर में क्या है - रक्त, मांस, आँतें, कृमि, मूत्र, विष्ठा - यही सब। उस शरीर पर प्यार क्यों?
“त्याग के लिए मैं अपने में राजसी भाव भरता था। साध हुई थी कि जरी की पोशाक पहनूँगा, अँगूठी पहनूँगा, लम्बी नलीवाले हुक्के में तम्बाकू पिऊँगा। जरी की पोशाक पहनी। ये लोग (रानी रासमणि के दामाद मथुरबाबू आदि) ले आए थे। कुछ देर बाद मन से कहा – यही शाल है, यही अँगूठी है, यही हुक्के में तम्बाकू पीना है। सब फेंक दिया, तब से फिर मन नहीं चला।”
शाम हो रही है। कमरे के दक्षिण-पूर्व की ओर के बरामदे में द्वार के पास ही, अकेले में श्रीरामकृष्ण मणि^+ से बातें कर रहे हैं।
श्रीरामकृष्ण – योगियों का मन सदा ईश्वर में लगा रहता है – सदा आत्मस्थ रहता
* श्रीरामकृष्ण अपनी जन्मभूमि को बहुधा 'वह देश' कहते थे।
+ मणि और मास्टर एक ही व्यक्ति हैं।