श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)
Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)
श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा
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परिच्छेद ९
दक्षिणेश्वर में भक्तों के साथ
श्रीरामकृष्ण दक्षिणेश्वर मन्दिर में भक्तों के साथ विराजमान हैं। दिन बृहस्पतिवार है, सावन शुक्ला दशमी, २४ अगस्त १८८२ ई.।
आजकल श्रीरामकृष्ण के पास हाजरा महाशय, रामलाल, राखाल आदि रहते हैं। श्रीयुत रामलाल श्रीरामकृष्ण के भतीजे हैं; कालीमन्दिर में पूजा करते हैं। मास्टर ने आकर देखा, उत्तर-पूर्व के लम्बे बरामदे में श्रीरामकृष्ण हाजरा के पास खड़े हुए बातें कर रहे हैं। मास्टर ने भूमिष्ठ हो श्रीरामकृष्ण की चरणवन्दना की।
श्रीरामकृष्ण का मुख सहास्य है। मास्टर से कहने लगे – “विद्यासागर से और भी दो एक बार मिलना चाहिए। चित्रकार पहले नक्शा खींच लेता है, फिर उस पर रंग चढ़ाता रहता है। प्रतिमा पर पहले दो तीन बार मिट्टी चढ़ायी जाती है, फिर सफेद रंग चढ़ाया जाता है, फिर वह ढंग से रँगी जाती है। – विद्यासागर का सब कुछ ठीक है, सिर्फ ऊपर कुछ मिट्टी पड़ी हुई है। कुछ अच्छे काम करता है; परन्तु हृदय में क्या है उसकी खबर नहीं। हृदय में सोना दबा पड़ा है। हृदय में ईश्वर है, – यह समझने पर सब कुछ छोड़कर व्याकुल हो उसे पुकारने की इच्छा होती है।”
श्रीरामकृष्ण मास्टर से खड़े खड़े वार्तालाप कर रहे हैं, कभी बरामदे में टहल रहे हैं।
साधना – कामिनी-कांचनरूपी तूफान से पार होने के लिए
श्रीरामकृष्ण – हृदय में क्या है इसका ज्ञान प्राप्त करने के लिए कुछ साधना आवश्यक है।
मास्टर – साधना क्या बराबर करते ही जाना चाहिए?
श्रीरामकृष्ण – नहीं, पहले कुछ कमर कसकर करनी चाहिए। फिर ज्यादा मेहनत नहीं उठानी पड़ती। जब तक तरंग, आँधी, तूफान और नदी की मोड़ से नौका जाती है तभी तक मल्लाह को मजबूती से पतवार पकड़नी पड़ती है; उतने से पार हो जाने पर फिर नहीं। जब वह मोड़ से बाहर हो गया और अनुकूल हवा चली तब वह आराम से बैठा रहता है, पतवार में हाथ भर लगाए रहता है। फिर तो पाल टाँगने का बन्दोबस्त करके आराम
CC-0. In Public Domain. Gurukul Kangri Collection, Haridwar