श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)
Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)
श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२४ अगस्त, १८८२ | परिच्छेद ९ | ५७
श्रीरामकृष्ण – फल होने पर फूल नहीं रह जाता। ईश्वरलाभ हो जाने से कर्म नहीं करना पड़ता, मन भी नहीं लगता।
“ज्यादा शराब पी लेने से मतवाला होश नहीं सम्हाल सकता – दुअन्नीभर पीने से कामकाज कर सकता है। ईश्वर की ओर जितना ही बढ़ोगे उतना ही वे कर्म घटाते रहेंगे। डरो मत। गृहस्थ की बहू के जब लड़का होनेवाला होता है तब उसकी सास धीरे धीरे काम घटाती जाती है। दसवें महीने में काम छूने भी नहीं देती। लड़का होने पर वह उसी को लिए रहती है।
“जो कुछ कर्म है, जहाँ वे समाप्त हो गए कि चिन्ता दूर हो गयी। गृहिणी घर का सारा कामकाज समाप्त करके जब कहीं बाहर निकलती है, तब जल्दी नहीं लौटती, बुलाने पर भी नहीं आती।”
ईश्वरलाभ तथा ईश्वरदर्शन का अर्थ
मणि – अच्छा, ईश्वरलाभ के क्या माने हैं? ईश्वरदर्शन किसे कहते हैं और किस तरह होते हैं?
श्रीरामकृष्ण – वैष्णव कहते हैं कि ईश्वरमार्ग के पथिक चार प्रकार के होते हैं – प्रवर्त्तक, साधक, सिद्ध और सिद्धों में सिद्ध। जो पहले ही पहल मार्ग पर आया है वह प्रवर्त्तक है। जो भजन-पूजन, जप-ध्यान, नाम-गुणकीर्तनादि करता है वह साधक है। जिसे ईश्वर के अस्तित्व का अनुभव मात्र हुआ है वह सिद्ध है। उसकी वेदान्त में एक उपमा है, – वह यह कि अँधेरे घर में बाबूजी सो रहे हैं। कोई टटोलकर उन्हें खोज रहा है। कोच पर हाथ जाता है, तो वह मन ही मन कह उठता है – यह नहीं है; झरोखा छू जाता है तो भी कह उठता है – यह नहीं है; दरवाजे में हाथ लगता है तो यह भी नहीं है, – नेति नेति नेति। अन्त में जब बाबूजी की देह पर हाथ लगा तो कहा – यह – बाबूजी यह हैं; अर्थात् अस्ति का बोध हुआ। बाबूजी को प्राप्त तो किया किन्तु भलीभाँति जान-पहचान नहीं हुई।
“एक दर्जे के और लोग हैं, जो सिद्धों में सिद्ध कहलाते हैं। बाबूजी के साथ यदि विशेष वार्तालाप हो तो वह एक और ही अवस्था है, यदि ईश्वर के साथ प्रेम-भक्ति द्वारा विशेष परिचय हो जाय तो दूसरी ही अवस्था हो जाती है। जो सिद्ध है उसने ईश्वर को पाया तो है, किन्तु जो सिद्धों में सिद्ध है उसका ईश्वर के साथ विशेष परिचय हो गया है।
“परन्तु उनको प्राप्त करने की इच्छा हो तो एक न एक भाव का सहारा लेना पड़ता है, जैसे – शान्त, दास्य, सख्य, वात्सल्य या मधुर।
“शान्त भाव ऋषियों का था। उनमें भोग की कोई वासना न थी; ईश्वरनिष्ठा थी जैसी पति पर स्त्री की होती है; वह यह समझती है कि मेरे पति कन्दर्प हैं।
“दास्य – जैसे हनुमान का; रामकाज करते समय सिंहतुल्य। स्त्रियों का भी दास्य