श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)
Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)
श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५८ श्रीरामकृष्णवचनामृत २४ अगस्त, १८८२
भाव होता है, – पति की हृदय खोलकर सेवा करती है। माता में भी यह भाव कुछ कुछ रहता है, – यशोदा में था।
"सख्य – मित्रभाव। आओ, पास बैठो। सुदामा आदि श्रीकृष्ण को कभी जूठे फल खिलाते थे, कभी कन्धे पर चढ़ते थे।
"वात्सल्य – जैसे यशोदा का। स्त्रियों में भी कुछ कुछ होता है, – स्वामी को खिलाते समय मानो जी काढ़कर रख देती हैं। लड़का जब भरपेट भोजन कर लेता है, तभी माँ को सन्तोष होता है। यशोदा कृष्ण को खिलाने के लिए मक्खन हाथ में लिए घूमती फिरती थीं।
"मधुर – जैसे श्रीराधिका का। स्त्रियों का भी मधुर भाव है। इस भाव में शान्त, दास्य, सख्य, वात्सल्य सब भाव हैं।"
मणि – क्या ईश्वर के दर्शन इन्हीं नेत्रों से होते हैं?
श्रीरामकृष्ण – चर्मचक्षु से उन्हें कोई नहीं देख सकता। साधना करते करते शरीर प्रेम का हो जाता है। आँखें प्रेम की, कान प्रेम के। उन्हीं आँखों से वे दीख पड़ते हैं, उन्हीं कानों से उनकी वाणी सुन पड़ती है। और प्रेम का लिंग और योनि भी होती है।
यह सुनकर मणि खिलखिलाकर हँस पड़े। श्रीरामकृष्ण जरा भी नाराज न होकर फिर कहने लगे।
श्रीरामकृष्ण – इस प्रेम के शरीर में आत्मा के साथ रमण होता है।
मणि फिर गम्भीर हो गए।
श्रीरामकृष्ण – "ईश्वर को बिना खूब प्यार किये दर्शन नहीं होते।
"खूब प्यार करने से चारों ओर ईश्वर ही ईश्वर दीखते हैं। जिसे पीलिया हो जाता है उसे चारों ओर पीला दिखायी पड़ता है।
"तब 'मैं वही हूँ' यह बोध भी हो जाता है। मतवाले का नशा जब खूब चढ़ जाता है तब वह कहता है, 'मैं ही काली हूँ'।
"गोपियाँ प्रेमोन्मत्त होकर कहने लगीं – 'मैं ही कृष्ण हूँ'।
"दिनरात उन्हीं की चिन्ता करने से चारों ओर वे ही दीख पड़ते हैं। जैसे थोड़ी देर दीपशिखा की ओर ताकते रहो, तो फिर चारों ओर सब कुछ शिखामय ही दिखायी देता है।"
क्या ईश्वरदर्शन मस्तिष्क का भ्रम है? "संशयात्मा विनश्यति"
मणि सोचते हैं कि वह शिखा तो सत्य शिखा है नहीं।
अन्तर्यामी श्रीरामकृष्ण कहने लगे – "चैतन्य की चिन्ता करने से कोई अचेत नहीं हो जाता। शिवनाथ ने कहा था, 'ईश्वर की बार बार चिन्ता करने से लोग पागल हो जाते