श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)
Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)
श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा
पृष्ठ 85, कुल 711 में से
संदर्भ में पढ़ें६२ श्रीरामकृष्णवचनामृत १६ अक्टूबर, १८८२
"आरियादह के घाट पर एक साधु आया था। हमने सोचा कि एक दिन देखने जाएँगे। कालीमन्दिर में मैंने हलधारी से कहा, 'कृष्णकिशोर और हम साधु-दर्शन को जाएँगे। तुम चलोगे?' हलधारी ने कहा, 'एक मिट्टी का पिंजरा देखने जाने से क्या होगा?' हलधारी गीता और वेदान्त पढ़ता था न? इसी से उसने साधु-शरीर को 'मिट्टी का पिंजरा' बताया! मैंने जाकर कृष्णकिशोर से वह बात कही तो वह बड़े क्रोध में आ गया। उसने कहा, 'क्या! हलधारी ने ऐसी बात कही है? जो ईश्वर-चिन्तन करता है, राम-चिन्तन करता है, और जिसने उसी उद्देश से सर्वत्याग किया है, क्या उसका शरीर मिट्टी का पिंजरा ठहरा? हलधारी नहीं जानता कि भक्त का शरीर चिन्मय होता है!' उसे इतना क्रोध आ गया था कि, कालीमन्दिर में फूल तोड़ने आया करता था, पर हलधारी से भेंट होने पर मुँह फेर लेता था। उससे बोलता तक न था।
"उसने मुझसे कहा था, 'तुमने जनेऊ क्यों फेंक दिया?' जब मेरी यह अवस्था हुई तब आश्विन की आँधी की तरह एक भाव आकर वह सब कुछ न जाने कहाँ उड़ा ले गया, कुछ पता ही न चला! पहले की एक भी निशानी न रही। होश नहीं थे। जब कपड़ा ही खिसक जाता था, तो जनेऊ कैसे रहे? मैंने कहा, 'एक बार तुम्हें भी उन्माद हो जाय तो तुम समझो!'
"फिर हुआ भी वैसा! उसे उन्माद हो गया। तब वह केवल 'ॐ ॐ' कहा करता और एक कोठरी में चुपचाप बैठा रहता था। यह समझकर कि वह पागल हो गया है, लोगों ने वैद्य बुलाया। नाटागढ़ का राम कविराज आया, कृष्णकिशोर ने उससे कहा, 'मेरी बीमारी तो अच्छी कर दो, पर देखो मेरे ॐकार को मत छुड़ाना!' (सब हँसे।)
"एक दिन मैंने जाकर देखा कि वह बैठा सोच रहा है। पूछा 'क्या हुआ है?' उसने कहा, 'टैक्सवाले आए थे, इसीलिए सोच में पड़ा हूँ। उन्होंने कहा है रुपया न देने से घर का माल बेच लेंगे।' मैंने कहा, 'तो सोचकर क्या होगा? अगर सब उठा ले जायँ तो ले जाने दो। अगर बाँधकर ही ले जायँ तो तुम्हें थोड़े ही ले जा सकेंगे। तुम तो 'ख' (आकाश) हो!' (नरेन्द्र आदि हँसे।) कृष्णकिशोर कहा करता था कि मैं आकाशवत् हूँ। वह अध्यात्मरामायण पढ़ता था न! बीच बीच में उसे 'तुम ख हो' कहकर दिल्लगी करता था। सो हँसते हुए मैंने कहा, 'तुम ख हो; टैक्स तुम्हें तो खींचकर नहीं ले जा सकेगा।'
"उन्माद की दशा में मैं लोगों से सच सच बातें - स्पष्ट बातें कह देता था। किसी की परवाह न करता था। अमीरों को देखकर मुझे डर नहीं लगता था।
"यदु मल्लिक के बाग में यतीन्द्र आया था। मैं भी वहीं था। मैंने उससे पूछा, 'कर्तव्य क्या है? क्या ईश्वर का चिन्तन करना ही हमारा कर्तव्य नहीं है?' यतीन्द्र ने कहा, 'हम संसारी आदमी हैं। हमारे लिए मुक्ति कैसी! राजा युधिष्ठिर को भी नरक दर्शन करना पड़ा था!' तब मुझे बड़ा क्रोध आया। मैंने कहा, 'तुम भला कैसे आदमी हो, युधि-