श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)
Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)
श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१६ अक्टूबर, १८८२ | परिच्छेद १० | ६३
सिर्फ नरकदर्शन ही तुमने याद रखा है? युधिष्ठिर का सत्यवचन, क्षमा, धैर्य, विवेक, वैराग्य, ईश्वर की भक्ति – यह सब बिलकुल याद नहीं आता!’ और भी बहुत कुछ कहने जाता था, पर हृदय ने मेरा मुँह दबा लिया। थोड़ी देर बाद यतीन्द्र यह कहकर कि जरा काम है, चला गया।
“बहुत दिनों बाद मैं कप्तान के साथ सौरिन्द्र ठाकुर के घर गया था। उसे देखकर मैंने कहा, ‘तुम्हें राजा-वाजा कह नहीं सकूँगा, क्योंकि वह झूठ बात होगी।’ उसने मुझसे थोड़ी बातचीत की। फिर मैंने देखा कि साहब लोग आने-जाने लगे। वह रजोगुणी आदमी है, बहुत कामों में लगा रहता है। यतीन्द्र को खबर भेजी गयी। उसने जवाब दिया, ‘मेरे गले में दर्द हुआ है।’
“उस उन्माद की दशा में एक दूसरे दिन वंराहनगर के घाट पर मैंने देखा कि जय मुकर्जी जप कर रहा है, पर अनमना होकर। तब मैंने पास जाकर दो थप्पड़ लगा दिए।
“एक दिन रासमणि दक्षिणेश्वर में आयी। कालीमाता के मन्दिर में आयी। वह पूजा के समय आया करती और मुझसे एक दो गीत गाने को कहती थी। मैं गीत गा रहा था, देखा कि वह अनमनी होकर फूल चुन रही है। बस, दो थप्पड़ जमा दिए तब होश सम्हालकर हाथ बाँधे रही।
“हलधारी से मैंने कहा, ‘भैया, यह कैसा स्वभाव हो गया! क्या उपाय करूँ? फिर माँ को पुकारते पुकारते वह स्वभाव दूर हुआ।
काशी में विषयसम्बन्धी चर्चा सुनकर श्रीरामकृष्ण का रुदन
“उस अवस्था में ईश्वरीय प्रसंग के सिवा और कुछ अच्छा नहीं लगता था। वैषयिक चर्चा होते सुनकर मैं बैठा रोया करता था। जब मथुरबाबू मुझे अपने साथ तीर्थों को ले गए, तब थोड़े दिन हम वाराणसी में राजाबाबू के मकान पर रहे। मथुरबाबू के साथ बैठकखाने में मैं बैठा था और राजाबाबू भी थे। मैंने देखा कि वे सांसारिक बातें कह रहे हैं। ‘इतने रुपये का नुकसान हुआ है’ – ऐसी ऐसी बातें। मैं रोने लगा – कहा, ‘माँ, मुझे यह कहाँ लायी! मैं रासमणि के मन्दिर में कहीं अच्छा था। तीर्थ करने को आते हुए भी वे ही कामिनी-कांचन की बातें! पर वहाँ (दक्षिणेश्वर में) तो विषय-चर्चा सुननी नहीं पड़ती थी।’ ”
श्रीरामकृष्ण ने भक्तों से, विशेषकर नरेन्द्र से, जरा आराम लेने के लिए कहा, और आप भी छोटे तख्त पर थोड़ा आराम करने चले गए।
(२)
नरेन्द्र आदि के साथ कीर्तनानन्द। नरेन्द्र का प्रेमालिंगन
तीसरा प्रहर हुआ है। नरेन्द्र गाना गा रहे हैं। राखाल, लाटू, मास्टर, नरेन्द्र के ब्राह्म मित्र प्रिय, हाजरा आदि सब हैं।