श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)
Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)
श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६४ श्रीरामकृष्णवचनामृत १६ अक्टूबर, १८८२
नरेन्द्र ने कीर्तन गाया, मृदंग बजने लगा –
(भावार्थ) – “ऐ मन, तू चिद्घन हरि का चिन्तन कर। उनकी मोहनमूर्ति की कैसी अनुपम छटा है! – वह श्रीहरी भक्तों का हृदयधन उसकी सौंदर्य सुषमा कोट्यवधि चन्द्रमाओ को लज्जित करेगी! उसके लावण्य दर्शनसे प्राण पुलकित हो जाते हैं। हृत्कमलासन में उसके श्रीचरणों का चिन्तन कर, शान्तिपूर्ण मनसे तथा प्रेमनेत्रों से उस अपरूप प्रियदर्शन का दर्शन कर भक्ति के आवेग से उस चिदानन्द रस में चिरनिमग्न हो जा। ...”
नरेन्द्र ने फिर गाया –
(भावार्थ) – “सत्य-शिव-सुन्दर का रूप हृदय-मन्दिर में शोभायमान है, जिसे नित्य देखकर हम उस रूप के समुद्र में डूब जाएँगे। वह दिन कब आएगा? हे प्रभु, मुझ दीन के भाग्य में यह कब होगा? हे नाथ, कब अनन्त ज्ञान के रूप में तुम हमारे हृदय में विराजोगे और हमारा चंचल मन निर्वाक होकर तुम्हारी शरण लेगा? कब अविनाशी आनन्द के रूप में तुम हृदयाकाश में उदित होंगे? चन्द्रमा के उदय होने पर चकोर जैसे उल्लसित होता है, वैसे हम भी तुम्हारे प्रकट होने पर मस्त हो जाएँगे। तुम शान्त, शिव, अद्वितीय और राजराज हो। हे प्राणसखा, तुम्हारे चरणों में हम बिक जाएँगे और अपने जीवन को सफल करेंगे। ऐसा अधिकार और ऐसा जीते जी स्वर्गभोग हमें और कहाँ मिलेगा? तुम्हारा शुद्ध और अपापविद्ध रूप हम देखेंगे। जिस तरह प्रकाश को देखकर अँधेरा जल्द भाग जाता है, उसी तरह तुम्हारे प्रकट होने से पापरूपी अन्धकार भाग जायगा। तुम ध्रुवतारा हो, हे दीनबन्धो, हमारे हृदय में ज्वलन्त विश्वास का संचार कर मन की आशाएँ पूरी कर दो। तुम्हें प्राप्त कर हम अहर्निश प्रेमानन्द में डूबे रहेंगे और अपने आपको भूल जाएँगे। वह दिन कब आएगा, प्रभो?”
(भावार्थ) – “आनन्द से मधुर ब्रह्मनाम का उच्चारण करो। नाम से सुधा का सिन्धु उमड़ आयगा। – उसे लगातार पीते रहो आप पीते रहो और दूसरों को पिलाते रहो। विषयरूपी मृगजल में पड़कर यदि कभी हृदय शुष्क हो जाय तो नामगान करना। प्रेम से हृदय सरस हो उठेगा। देखना, वह महामन्त्र नहीं भूलना। संकट के समय उसे दयालु पिता कहकर पुकारना। हुंकार से पाप का बन्धन तोड़ डालो। जय ब्रह्म कहकर आओ, सब मिलकर ब्रह्मानन्द में मस्त होवें और सब कामनाओं को मिटा दें। प्रेमयोग के योगी बनें।”
मृदंग और करताल के साथ कीर्तन हो रहा है। नरेन्द्र आदि भक्त श्रीरामकृष्ण को घेरकर कीर्तन कर रहे हैं। कभी गाते हैं – ‘प्रेमानन्द-रस में चिरदिन के लिए मग्न हो जा।’ फिर कभी गाते हैं – ‘सत्य-शिव-सुन्दर का रूप हृदय-मन्दिर में शोभायमान है।’
अन्त में नरेन्द्र ने स्वयं मृदंग उठा लिया और मतवाले होकर श्रीरामकृष्ण के साथ गाने लगे – ‘आनन्द से मधुर ब्रह्मनाम का उच्चारण करो।’