श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)
Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)
श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२२ अक्टूबर, १८८२ | परिच्छेद ११ | ७३
भक्त हैं, सामान्य नहीं। तुम एक दिन इन्हें भोजन कराना। नरेन्द्र को तुम कैसा समझते हो?”
मणि – जी, बहुत अच्छा।
श्रीरामकृष्ण – देखो नरेन्द्र में कितने गुण हैं, – गाता है, बजाता है, विद्वान् है और जितेन्द्रिय है, कहता है – विवाह न करूँगा; बचपन से ही ईश्वर में मन है।
साकार अथवा निराकार – चिन्मय मूर्तिध्यान – मातृध्यान
श्रीरामकृष्ण (मणि से) – आजकल तुम्हारे ईश्वर-स्मरण का क्या हाल है? मन साकार पर जाता है या निराकार पर?
मणि – जी, अभी तो मन साकार पर नहीं जाता। और इधर निराकार में मन को स्थिर नहीं कर सकता।
श्रीरामकृष्ण – देखो, निराकार में तत्काल मन स्थिर नहीं होता। पहले पहले तो साकार अच्छा है।
मणि – मिट्टी की इन सब मूर्तियों की चिन्ता करना?
श्रीरामकृष्ण – नहीं नहीं, चिन्मयी मूर्ति की।
मणि – तो भी हाथ-पैर तो सोचने ही पड़ेंगे। परन्तु यह भी सोचता हूँ कि पहली अवस्था में किसी रूप की चिन्ता किए बिना मन स्थिर न होगा, यह आपने कह भी दिया है। अच्छा वे तो अनेक रूप धारण कर सकते हैं; तो क्या अपनी माता के स्वरूप का ध्यान किया जा सकता है?
श्रीरामकृष्ण – हाँ। वे (माँ) गुरु तथा ब्रह्ममयी हैं।
मणि चुप बैठे रहे। कुछ देर बाद, फिर श्रीरामकृष्ण से पूछने लगे।
मणि – अच्छा, निराकार में क्या दिखता है? क्या इसका वर्णन नहीं किया जा सकता?
श्रीरामकृष्ण (कुछ सोचकर) – वह कैसा है बताऊँ? –
यह कहकर श्रीरामकृष्ण कुछ देर चुप बैठे रहे। फिर साकार और निराकार दर्शन में कैसा अनुभव होता है, इस सम्बन्ध की एक बात कह दी और फिर चुप हो रहे।
श्रीरामकृष्ण – देखो, इसको ठीक ठीक समझने के लिए साधना चाहिए। यदि घर के भीतर के रत्न देखना चाहते हो और लेना चाहते हो, तो मेहनत करके कुंजी लाकर दरवाजे का ताला खोलो और रत्न निकालो। नहीं तो घर में ताला लगा हुआ है और द्वार पर खड़े हुए सोच रहे हैं, – 'लो, हमने दरवाजा खोला, सन्दूक का ताला तोड़ा, अब यह रत्न निकाल रहे हैं।' सिर्फ खड़े खड़े सोचने से काम न चलेगा। साधना करनी चाहिए।