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श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)

श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा

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७४ श्री श्रीरामकृष्णवचनामृत २२ अक्टूबर, १८८२

(२)

अनन्त श्रीरामकृष्ण तथा अनन्त ईश्वर! सभी मार्ग हैं – श्रीवृन्दावन-दर्शन

ज्ञानी तथा अवतारवाद

श्रीरामकृष्ण – ज्ञानी निराकार का चिन्तन करते हैं। वे अवतार नहीं मानते। अर्जुन ने श्रीकृष्ण की स्तुति में कहा, तुम पूर्णब्रह्म हो। श्रीकृष्ण ने अर्जुन से कहा कि आओ, देखो, हम पूर्णब्रह्म हैं या नहीं। यह कहकर श्रीकृष्ण अर्जुन को एक जगह ले गए और पूछा, तुम क्या देखते हो? अर्जुन बोला, मैं एक बड़ा पेड़ देख रहा हूँ जिसमें जामुन के से गुच्छे के गुच्छे फल लगे हैं। श्रीकृष्ण ने कहा कि और भी पास आकर देखो; वे काले फल नहीं, गुच्छे के गुच्छे अनगिनती कृष्ण फले हुए हैं – मुझ जैसे। अर्थात् उस पूर्णब्रह्मरूपी वृक्ष से करोड़ों अवतार होते हैं और चले जाते हैं।

“कबीरदास का रुख निराकार की ओर था। श्रीकृष्ण की चर्चा होती तो कबीरदास कहते, ‘उसे क्या भजूँ? – गोपियाँ तालियाँ पीटती थीं और वह बन्दर की तरह नाचता था।’ (हँसते हुए) मैं साकारवादियों के निकट साकार हूँ और निराकारवादियों के निकट निराकार।”

मणि (हँसकर) – जिनकी बात हो रही है वे (ईश्वर) जैसे अनन्त हैं आप भी वैसे ही अनन्त हैं! – आपका अन्त ही नहीं मिलता।

श्रीरामकृष्ण (सहास्य) – वाह रे, तुम तो समझ गए! सुनो एक बार सब धर्म कर लेने चाहिए; सब मार्गों से आना चाहिए। खेलने की गोटी सब घर बिना पार किए कहीं लाल होती है? गोटी जब लाल होती है, तब कोई उसे नहीं छू पाता।

मणि – जी हाँ।

कुटीचक। तीर्थयात्रा का उद्देश्य

श्रीरामकृष्ण – योगी दो प्रकार के हैं – बहूदक और कुटीचक। जो साधु तीर्थों में घूम रहा है, जिसके मन को अभी तक शान्ति नहीं मिली, उसे बहूदक कहते हैं, और जिसने चारों ओर घूमकर मन को स्थिर कर लिया है – जिसे शान्ति मिल गयी है – वह किसी एक जगह आसन जमा देता है, फिर नहीं हिलता। उसी एक ही जगह बैठे उसे आनन्द मिलता है। उसे तीर्थ जाने की कोई आवश्यकता नहीं। यदि वह तीर्थ जाए तो केवल उद्दीपना के लिए जाता है।

“मुझे एक बार सब धर्म करने पड़े थे, – हिन्दू, मुसलमान, क्रिस्तान, – इधर शाक्त, वैष्णव, वेदान्त, इन सब रास्तों से भी आना पड़ा है। ईश्वर वही एक हैं – उन्हीं की ओर सब चल रहे हैं, भिन्न भिन्न मार्गों से।