श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रकाशकोंका निवेदन हमारे पितामह स्वर्गीय लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक महोदय प्रणीत श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र ग्रंथका उन्नीसवाँ संस्करण प्रकाशित करनेका सुअवसर आज प्राप्त हुआ है। इसके तीन संस्करण लोकमान्यजीके जीवन- कालमेंही प्रसिद्ध हो चुके थे। चतुर्थ संस्करणमें इस ग्रंथका थोड़ेमें इतिहास दिया था। यहाँभी उसको दुहराना हम उचित मानते हैं। यह सर्वत्र सुविदितही है, कि यह गीतारहस्य ग्रंथ लो. तिलक महोदयने ब्रह्मदेश (बर्मा) के मंडाले नगरके कारागृह-वासके समय लिखा था। हमारे पासकी इस ग्रंथकी पेन्सिलसे लिखी हुई मूल चार हस्तलिखित बहियोंसे ज्ञात होता है कि मंडालेमें दि. २ नवंबर सन् १९१० को इस ग्रंथके लेखनका आरंभ करके, लगभग ९०० पृष्ठोंके इस संपूर्ण ग्रंथका लेखन दि. ३० मार्च १९११ के रोज, अर्थात् केवल पांच महीनोंमें, उन्होंने पूर्ण कर दिया। सोमवार दि. ८ जून १९१४ के रोज लोकमान्य महोदयकी मंडालेके कारागृहसे मुक्तता हुई। वहाँसे पूना लौट आनेपर कई सप्ताहोंतक राह देखनेपरभी, मंडालेके कारागृहके अधिकारीको सौंपे गये गीतारहस्यके हस्त- लिखितोंको जल्द लौटा देनेका सरकारका इरादा दीख नहीं पड़ा। ज्यों-ज्यों दिन बीतते गये, त्यों-त्यों सरकारके हेतुके बारेमें लोग अधिकाधिक साशंक होते गये और कोई कोई तो आखिर स्पष्ट कहने लगे, “कि सरकारका लक्षण कुछ ठीक नहीं लगता; मालूम होता है, बहियाँ न देनेका विचार है।” ऐसे शब्द जब किसीके मुँहसे लोकमान्यजी सुनते थे, तब वे कहा करते थे, कि “डरनेका कोई कारण नहीं। यद्यपि बहियाँ सरकारके पास हैं, तोभी ग्रंथका एक-एक शब्द मेरे मस्तिष्कमें है। विश्रामके समय ‘सिंहगढ़’ किलेपर जाकर अपने बंगलेमें बैठकर मैं फिरसे ग्रंथ यथा- पूर्व लिख डालूँगा।” आत्मविश्वासकी यह तेजस्वी भाषा ढलती उम्रवाले अर्थात् ६० वर्षके वयोवृद्ध गृहस्थकी है, और ग्रंथभी मामूली नहीं, बल्कि गहन तत्त्वज्ञान- विषयक पूरे ९०० पृष्ठोंका है। इन बातोंपर ध्यान देनेसे लोकमान्य महोदयके प्रवृत्तिप्रधान प्रयत्नवादकी यथार्थ कल्पना त्वरित की जा सकती है। सौभाग्यसे तदनंतर जल्दीही सरकारसे सभी बहियाँ सुरक्षित प्राप्त हुई, और लोकमान्यके जीवन-कालमेंही इस ग्रंथके तीन हिंदी संस्करण प्रकाशित हुए। ऊपर यह उल्लेख किया गया है, कि गीतारहस्यका मूल हस्तलिखित चार बहियोंमें है। उन बहियोंके संबंधमें अधिक जानकारी इस प्रकार है:-