श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रकाशकोंका निवेदन ९ बही विषय पृष्ठ लेखन-काल १ रहस्य. प्र. १ से ८ १ से ४१३ २ नवंबर १९१० से ८ दिसंबर १९१० २ रहस्य. प्र. ९ से १३ १ से ४०२ { १३ दिसंबर १९१० से १५ जनवरी १९११ ३ रहस्य. प्र. १४ से १५ १ से १४७ बहिरंगपरीक्षण १५१-२४४ १५ जनवरी १९११ से ४०१-४१२ ३० जनवरी १९११ मुखपृष्ठ, समर्पण २४५-२४७ श्लोकोंका अनुवाद ( अध्याय १-३ ) २४९-३९९ १-३४० ४ श्लोकोंका अनुवाद ३४४-३७४ १० मार्च १९११ से ( अध्याय ४ से १८ ) ३८५-४०७ ३० मार्च १९११ ३४१-३४३ प्रस्तावना ३७५-३८४ ग्रंथकी अनुक्रमणिका, समर्पण और प्रस्तावनाभी लोकमान्य महोदयने कारा- गृहमेंही लिखी थी, और स्थान-स्थानपर ऐसी सूचनाएँ लिखकर, कि किस विषयके बाद कौन विषय हो, ग्रंथ परिपूर्ण कर रखा था । इससे ज्ञात होता है, कि उनको यह विश्वास नहीं था, कि अपने जीते जी कारागृहसे मुक्तता होगी या नहीं, और उनकी यह अत्युत्कट इच्छा थी, कि यदि मुक्तता न हो, तोभी अपना परिश्रम- पूर्वक संपादन किया हुआ ज्ञान और उसमे सूझे हुए विचार व्यर्थ न जायें, बल्कि उनका लाभ अगली पीढ़ीको मिले । पहली दो बहियोंके आरंभमें उन बहियोंमें वर्णित विषयोंकी अनुक्रमणिका है । ग्रंथका मुखपृष्ठ और समर्पण तीसरी बहीके २४५ से २४७ पृष्ठोंमें है और प्रस्तावना चौथी बहीके ३४१ से ३४३ और ३७५ से ३८४ पृष्ठोंमें है । कारागृहसे मुक्तता होनेपर प्रस्तावनामें कुछ सुधार किया गया है और वह प्रकाशन-कालमें सहायक व्यक्तियोंके निर्देशतकही सीमित है । यह विषय प्रथम संस्करणकी प्रस्तावनाके अंतिम परिच्छेदके पहलेके परिच्छेदमें है । अंतिम परिच्छेद तो कारागृहमेंही लिखा हुआ था । इनमेंसे पहली बहीके पहले आठ प्रकरणोंको 'पूर्वार्ध' संज्ञा दी गई है ( यह प्रथम बहीके प्रथम पृष्ठके चित्रसे ज्ञात होगा ), दूसरीको उत्तरार्ध भाग पहला और तीसरीको उत्तरार्ध भाग दूसरा, इस प्रकार संज्ञाएँ दी गई हैं । इससे ज्ञात होता है, कि ग्रंथके दो भाग करनेका उनका विचार था । इनमेंसे पहली बहीके आठ प्रकरणोंका हस्तलिखित केवल एक महीनेमेंही लिखकर तैयार हुआ था और यही