भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

पृष्ठ 12, कुल 956 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 12

प्रकाशकोंका निवेदन ९ बही विषय पृष्ठ लेखन-काल १ रहस्य. प्र. १ से ८ १ से ४१३ २ नवंबर १९१० से ८ दिसंबर १९१० २ रहस्य. प्र. ९ से १३ १ से ४०२ { १३ दिसंबर १९१० से १५ जनवरी १९११ ३ रहस्य. प्र. १४ से १५ १ से १४७ बहिरंगपरीक्षण १५१-२४४ १५ जनवरी १९११ से ४०१-४१२ ३० जनवरी १९११ मुखपृष्ठ, समर्पण २४५-२४७ श्लोकोंका अनुवाद ( अध्याय १-३ ) २४९-३९९ १-३४० ४ श्लोकोंका अनुवाद ३४४-३७४ १० मार्च १९११ से ( अध्याय ४ से १८ ) ३८५-४०७ ३० मार्च १९११ ३४१-३४३ प्रस्तावना ३७५-३८४ ग्रंथकी अनुक्रमणिका, समर्पण और प्रस्तावनाभी लोकमान्य महोदयने कारा- गृहमेंही लिखी थी, और स्थान-स्थानपर ऐसी सूचनाएँ लिखकर, कि किस विषयके बाद कौन विषय हो, ग्रंथ परिपूर्ण कर रखा था । इससे ज्ञात होता है, कि उनको यह विश्वास नहीं था, कि अपने जीते जी कारागृहसे मुक्तता होगी या नहीं, और उनकी यह अत्युत्कट इच्छा थी, कि यदि मुक्तता न हो, तोभी अपना परिश्रम- पूर्वक संपादन किया हुआ ज्ञान और उसमे सूझे हुए विचार व्यर्थ न जायें, बल्कि उनका लाभ अगली पीढ़ीको मिले । पहली दो बहियोंके आरंभमें उन बहियोंमें वर्णित विषयोंकी अनुक्रमणिका है । ग्रंथका मुखपृष्ठ और समर्पण तीसरी बहीके २४५ से २४७ पृष्ठोंमें है और प्रस्तावना चौथी बहीके ३४१ से ३४३ और ३७५ से ३८४ पृष्ठोंमें है । कारागृहसे मुक्तता होनेपर प्रस्तावनामें कुछ सुधार किया गया है और वह प्रकाशन-कालमें सहायक व्यक्तियोंके निर्देशतकही सीमित है । यह विषय प्रथम संस्करणकी प्रस्तावनाके अंतिम परिच्छेदके पहलेके परिच्छेदमें है । अंतिम परिच्छेद तो कारागृहमेंही लिखा हुआ था । इनमेंसे पहली बहीके पहले आठ प्रकरणोंको 'पूर्वार्ध' संज्ञा दी गई है ( यह प्रथम बहीके प्रथम पृष्ठके चित्रसे ज्ञात होगा ), दूसरीको उत्तरार्ध भाग पहला और तीसरीको उत्तरार्ध भाग दूसरा, इस प्रकार संज्ञाएँ दी गई हैं । इससे ज्ञात होता है, कि ग्रंथके दो भाग करनेका उनका विचार था । इनमेंसे पहली बहीके आठ प्रकरणोंका हस्तलिखित केवल एक महीनेमेंही लिखकर तैयार हुआ था और यही