श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१० गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र प्रकरण अत्यंत महत्त्वके हैं। इससे लोकमान्य महोदयकी इस विषयकी ओतप्रोत तैयारीका और उनके लेखनके अस्खलित प्रवाहका यथार्थ ज्ञान पाठकोंको सहजही होगा। बहीके पृष्ठ फाड़ देनेकी अथवा नये जोड़नेकी, कारागृहके नियमानुसार, उनको आज्ञा न थी, किंतु पुनर्विचारसे सूझी बातोंके नये पृष्ठ बीच-बीचमें जोड़नेकी सुविधा उनको मिली थी। यह जानकारी दूसरी और तीसरी बहीके आवरणके अंदरके बाजूमें लिखी है। पहली तीन बहियाँ केवल एक-एक महीनेमें लिखी गई हैं और अंतिम बही सिर्फ़ एक पखवाडेमें लिखी गई है। मुख्य विषय दाहिने हाथके पृष्ठोंपर लिखके उनके पीछेके कोरे पृष्ठोंपर अगले पृष्ठोंमें समावेश करनेके लिये नयी बातें लिखी हुई हैं। आशा है, कि मूल हस्तलिखित प्रतिसंबंधी जिज्ञासा उक्त जानकारीसे पूर्ण होगी। इस ग्रंथका जन्म होनेके पहलेभी प्रस्तुत विषयके संबंधमें उनका व्यासंग जारी था, इसका उत्तम प्रमाण उनके अन्य दो ग्रंथ हैं। ‘मासानां मार्गशीर्षोऽहं’ (गीता १०-३५, गीतार. पृष्ठ ७७४) इस श्लोकका अर्थ निश्चित करते समय, उन्होंने वेदोंके महोदधिमें डुबकी लगा कर, ‘ओरायन’ रुपी रत्न जनताको दे दिया और वेदोदधिका पर्यटन करत करते आर्योंके मूल वसतिस्थानका पता लगाया है। काला- नुक्रमसे गीतारहस्य यद्यपि अंतिम ग्रंथ है, तोभी उक्त दो ग्रंथोंका पूर्व वृत्तान्त ध्यानमे रखनेसे, महत्त्वकी दृष्टिसे गीतारहस्यकोही आद्यस्थान देना पड़ता है। गीताविषयक व्यासंगसेही ये ग्रंथ निर्माण हुए हैं। ‘ओरायन’ ग्रंथकी प्रस्तावनामें लोकमान्य महाशयने गीताके अभ्यासका उल्लेख किया है। ‘ओरायन’ और ‘आर्योंका मूल वसतिस्थान’ ये दोनों अंग्रेजी ग्रंथ यथावकाश प्रकाशित हुए और जगत्भरमें विख्यात हो गये। परंतु गीतारहस्य लिखनेका मुहूर्त लोकमान्यके तीसरे दीर्घ कारावाससे प्राप्त हुआ। गीतारहस्यके पहलेके दोनों ग्रंथोंका लेखनभी कारागृहमेंही हुआ है। सार्वजनिक कार्य-प्रवृत्तियोंकी उपाधिसे मुक्त होकर ग्रंथलेखनके लिये आवश्यक स्वस्थता कारागृहमें मिल सकी; परंतु प्रत्यक्ष ग्रंथलेखनका आरंभ करनेके पूर्व उनको जिन बड़ी भारी मुसीबतोंका सामना करना पड़ा, उन्हें उनकेही शब्दोंमें इस जगह कहना उचित है- “ग्रंथके संबंधमें तीन बार तीन हुक्म आये...कुछ दिनके बाद मेरे पास सब पुस्तकें रखनेकी मनाही की गयी और सिर्फ़ चार पुस्तकेंही एक समय रखनेका हुक्म हुआ। उसपर बर्मा सरकारसे अर्ज करनेपर, ग्रंथ लेखनके लिये आवश्यक सब पुस्तकें मेरे पास रखनेकी आज्ञा हुई। जब मै वहाँसे लौटा, तब पुस्तकोंकी संख्या ३५० से ४०० तक पहुँची थी। ग्रंथलेखनके लिये जो काग़ज़ देते थे, वेभी छूटे न दे कर, जिल्ददार किताब, भीतरके पृष्ठ गिनके और उनपर दोनों ओर क्रमांक लिखकर, देते थे और लिखनेको स्याही न देके सिर्फ़ नोकदार पेन्सिलें देते थे” (लोकमान्य तिलक महाशयके कारागारसे छूटनेके बादकी पहली मुलाक़ात – ‘केसरी’ दि. ३० जून १९१४)।