भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

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प्रकाशकोंका निवेदन ११ इस प्रकार वाचकवृन्द कल्पना कर सकते हैं, कि तिलक महोदयको ग्रंथलेखनमें कैसी-कैसी मुसीबतोंका सामना करना पड़ा होगा, परंतु उनकी चिंता न करके सन् १९१० के जाड़ेंमें उन्होंने हस्तलिखित प्रति तैयार कर दी । ग्रंथके हस्तलिखितके तैयार होनेका समाचार उन्होंने सन् १९११ के आरंभके एक पत्रमें दिया था और वह पत्र सन् १९११ के मार्च महीनेके 'मराठा' पत्रके एक अंकमें समग्र प्रसिद्ध हुआ है । गीतारहस्यमें किया गया विवेचन लोगोंको अधिक सुगम हो, इसलिये तिलक महोदयने सन् १९१४ के गणेशोत्सवमें चार व्याख्यान दिये, और बादमें ग्रंथ छापनेके कामका आरंभ होकर १९१५ के जून महीनेमें उसका पूर्णावतार हुआ । इसके आगेका इतिहास सबको सुविदितही है । सन् १९५६ ईसवीमें, लोकमान्य तिलकजीकी जन्मशताब्दीके उपलक्ष्यमें, इस मौलिक ग्रंथके नये संस्करणको प्रकाशित करते समय, यह निश्चय किया गया, कि इस ग्रंथका वेष्टनभी नया हो । इच्छा थी, कि वेष्टनपर स्वर्गीय लोकमान्य तिलक महोदयका तथा उनकी कल्पनाके अनुसार कुरुक्षेत्रकी रणभूमिका चित्र रहे । हमारे चित्रकार-मित्र श्रीमान् दलालजीने हमारी मूल कल्पनाकी अपेक्षाभी इतनी अधिक सफलतापूर्वक ये दोनों चित्र चित्रित किये हैं, कि उनकी अलग प्रशंसा करनेकी कोई आवश्यकता नहीं रही । चित्रकारसे मोहक एवं अत्युत्तम चित्र खिंचवाये जानेपरभी छपाईका कार्यभी उतनीही लगनसे करना पड़ता है । शिवराज फाईन आर्ट लिथो वर्क्स ( नागपुर ) ने वेष्टनछपाईका वह कार्य सुचारू रूपसे पूर्ण कर दिया है । सोलहवां संस्करणको संशोधित तथा दोषरहित बनानेके लिये श्री. भगवान नारायण कानडेजीने अत्यधिक परिश्रम किये थे । उन्नीसवां संस्करणके सभी ग्रंथ बीक चुके है और इस मौलिक तथा शास्त्रीय ग्रंथके लिये सतत माँग हो रही है । इसलिये यह उन्नीसवाँ संस्करण तुरन्त प्रकाशित किया है । परशुराम प्रोसेसके श्री. सुभाष बर्वेजीने यह ग्रंथ तुरन्त छपवा दिया इसलिये आपको धन्यवाद प्रदान करना हम अपना कर्तव्य मानते है । काग़ज़का मूल्य अधिकाधिक बढ़ रहा है और छपाईकी दरोंमेंभी वृद्धि होती रही है अतः इस ग्रंथका मूल्य बढ़ा देना अपरिहार्य-सा हो गया है । इस प्रकार ग्रंथकी सजावटमें अनेकोंने परिश्रम उठाये हैं । पाठकोंके हाथमें आज यह ग्रंथ हम दे रहे हैं । आशा है, पाठक इसका सहर्ष और सानन्द स्वीकार करेंगे । पूना, दी. ज. टिळक दि. १।५।१९८२ शै. श्री. टिळक