भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

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अनुवादककी भूमिका भूमिका लिखकर महात्मा तिलकके ग्रंथका परिचय कराना, मानो सूर्यको दीपकसे दिखलानेका प्रयत्न करना है। यह ग्रंथ स्वयं प्रकाशमान् होनेके कारण अपना परिचय आपही दे देता है। परंतु भूमिका लिखनेकी प्रणाली-सी पड़ गई है। ग्रंथको पातेही पत्र उलट-पलटकर पाठक भूमिका खोजने लगते हैं। इसलिये उक्त प्रणालीकी रक्षा करने और पाठकोंकी मनस्तुष्टि करनेके लिये इस शीर्षकके नीचे दो शब्द लिखना आवश्यक हो गया है। संतोषकी बात है, कि श्रीसमर्थ रामदासस्वामीकी अशेष कृपासे, तथा सद्गुरु श्रीरामदासानुदास महाराजके (हनुमानगढ़, वर्धा निवासी श्रीधर विष्णु परांजपे) प्रत्यक्ष अनुग्रहसे, जब मेरे हृदयमें अध्यात्म-विषयकी जिज्ञासा उत्पन्न हुई है, तभीसे इस विषयके अध्ययनके महत्त्वपूर्ण अवसर अनायास मिलते जाते हैं। यह उसी कृपा और अनुग्रहका फल था, कि मैं संवत् १९७० में श्रीसमर्थके दासबोधका हिंदी अनुवाद कर सका। अब उसी कृपा और अनुग्रहके प्रभावसे लोकमान्य बाल गंगाधर तिलककृत श्रीमद्भगवद्गीतारहस्यके अनुवाद करनेका अनुपम अवसर हाथ लग गया हैं। जब मुझे यह काम सौंपा गया, तब ग्रंथकारने अपनी यह इच्छा प्रकट की, कि मूल ग्रंथमें प्रतिपादित सब भाव ज्यों-के-त्यों हिंदीमें पूर्णतया व्यक्त किये जायें; ग्रंथमें प्रतिपादित सिद्धान्तोंपर जो आक्षेप होंगे, उनके उत्तरदाता मूल लेखकही हैं। इसलिये मैंने अपने लिये दो कर्तव्य निश्चित किये :- (१) यथा- मति मूल भावोंकी पूरी पूरी रक्षा की जावे, और (२) अनुवादकी भाषा यथाशक्ति शुद्ध, सरल, सरस और सुबोध हो। अपनी अल्पबुद्धि और सामर्थ्यके अनुसार इन दोनों कर्तव्योंके पालन करनेमें मैंने कोई बात उठा नहीं रखी है; और मेरा आंतरिक विश्वास है, कि मूल ग्रंथके भाव यत्किंचित्भी अन्यथा नहीं हो पाये हैं। परंतु संभव है, कि विषयकी कठिनता और भावोंकी संभी- रताके कारण मेरी भाषाशैली कहीं कहीं क्लिष्ट अथवा दुर्बोध-सी हो गई हो; और यहभी संभव है, कि ढूंढनेवालोंको इसमें 'मराठीपनकी बू' भी मिलजाय। परंतु इसके लिये क्या किया जाय ? लाचारी है। मूल ग्रंथ मराठीमें है, मैं स्वयं महाराष्ट्रका हूँ, मराठीही मेरी मातृभाषा है, महाराष्ट्र देशके केंद्रस्थल पूनामेंही यह अनुवाद छापा गया है। और मैं हिंदीका कोई 'धुरंधर' लेखकभी नहीं हूँ। ऐसी अवस्थामें, यदि इस ग्रंथमें उक्त दोष न मिलें, तो बहुत आश्चर्य होगा। यद्यपि मराठी 'रहस्य' को हिंदी पोशाक पहनाकर सर्वांगसुंदर रूपसे हिंदी पाठकोंके उत्सुक हृदयोंमें प्रवेश करानेका यत्न किया गया है; और ऐसे महत्त्वपूर्ण