श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअनुवादककी भूमिका १३ विषयको समझानेके लिये उन सब साधनोंकी सहायता ली गई है, कि जो हिंदी साहित्य-संसारमें प्रचलित है; फिरभी स्मरण रहे, कि यह केवल अनुवादही है - इसमें वह तेज नहीं आ सकता, कि जो मूलग्रंथमें है। गीताके संस्कृत श्लोकोंके मराठी अनुवादके विषयमें स्वयं महात्मा तिलकने उपोद्घातमें (पृष्ठ ६००) यह लिखा है :- " स्मरण रहे, कि अनुवाद आखिर अनुवादही है। हमने अपने अनुवादमें गीताके सरल, खुले और प्रधान अर्थको ले आनेका प्रयत्न किया है सही ; परंतु संस्कृत शब्दोंमें और विशेषतः भगवानकी प्रेमयुक्त, रसीली, व्यापक और क्षण- क्षणमे नई रुचि उत्पन्न करानेवाली वाणीमें लक्षणासे अनेक व्यंग्यार्थ उत्पन्न करनेकी जो सामर्थ्य है, उसे जराभी न घटा-बढ़ाकर, दूसरे शब्दोंमें ज्यों-का-त्यों झलक देना असंभव है...!" ठीक यही बात महात्मा तिलकके ग्रंथके हिंदी अनुवादके विषयमें कही जा सकती है। एक तो विषय तात्त्विक, दूसरे गंभीर, और फिर महात्मा तिलककी वह ओजस्विनी, व्यापक एवं विकट भाषा कि जिसके मर्मको ठीक ठीक समझ लेना कोई साधारण बात नहीं है। इन दुहरी-तिहरी कठिनाइयोंके कारण यदि वाक्यरचना कहीं कठिन हो गई हो, दुरूह हो गई हो, या अशुद्धभी हो गई हो, तो उसके लिये सहृदय पाठक मुझे क्षमा करें। ऐसे ग्रंथके अनुवादमें किन किन कठिनाइयोंका सामना करना पड़ता है और अपनी स्वतंत्रताका त्यागकर पराधीनताके किन किन नियमोंमें बंध जाना होता है, इसका अभव वे सहानुभूतिशील पाठक और लेखकही कर सकते हैं, कि जिन्होंने इस ओर कभी ध्यान दिया हो। राष्ट्रभाषा हिंदीको इस बातका अभिमान है, कि वह महात्मा तिलकके गीता- रहस्यसंबंधी विचारोंको अनुवाद-रूपमें उस समय पाठकोंको भेंट कर सकी है, जब कि और किसीभी भाषाका अनुवाद प्रकाशित नहीं हुआ; - यद्यपि दो-एक अनुवाद तैयार थे। इससे, आशा है, कि हिंदीप्रेमी अवश्य प्रसन्न होंगे। अनुवादका श्रीगणेश जुलाई १९१५ में हुआ था और दिसंबरमें उसकी पूर्ति हुई। जनवरी १९१६ से छपाईका आरंभ हुआ, जो जून सन् १९१६ में समाप्त हो गया। इस प्रकार एक वर्षमें यह ग्रंथ तैयार हो पाया। यदि मित्रमंडलीने मेरी पूर्ण सहायता न की होती, तो मैं, इतने समयमें, इस कामको कभी पूरा न कर सकता। इनमें वैद्य विश्वनाथराव लुखे और श्रीयुत मौलिप्रसादजीका नाम उल्लेख करने- योग्य है। कविवर बा. मैथिलीशरण गुप्तने कुछ मराठी पद्योंका हिंदी रूपांतर करनेमें अच्छी महायता दी है, इसलिये वे धन्यवादके भागी हैं। श्रीयुत पं. लल्लीप्रसाद पांडेयने जो सहायता की है, वह अवर्णनीय एवं अत्यंत प्रशंसाके योग्य है। लेख लिखनेमें, हस्तलिखित प्रतिको दुहरानेमें और प्रूफका संशोधन करनेमें आपने दिन-रात कठिन परिश्रम किया है। अधिक क्या कहा जाय, घर छोड़कर महीनोंतक आपको इस कामके लिये पूनामें रहना पड़ा है। इस सहायता और उपकारका बदला केवल