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श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

प्रकाशकोंका निवेदन ९ बही विषय पृष्ठ लेखन-काल १ रहस्य. प्र. १ से ८ १ से ४१३ २ नवंबर १९१० से ८ दिसंबर १९१० २ रहस्य. प्र. ९ से १३ १ से ४०२ { १३ दिसंबर १९१० से १५ जनवरी १९११ ३ रहस्य. प्र. १४ से १५ १ से १४७ बहिरंगपरीक्षण १५१-२४४ १५ जनवरी १९११ से ४०१-४१२ ३० जनवरी १९११ मुखपृष्ठ, समर्पण २४५-२४७ श्लोकोंका अनुवाद ( अध्याय १-३ ) २४९-३९९ १-३४० ४ श्लोकोंका अनुवाद ३४४-३७४ १० मार्च १९११ से ( अध्याय ४ से १८ ) ३८५-४०७ ३० मार्च १९११ ३४१-३४३ प्रस्तावना ३७५-३८४ ग्रंथकी अनुक्रमणिका, समर्पण और प्रस्तावनाभी लोकमान्य महोदयने कारा- गृहमेंही लिखी थी, और स्थान-स्थानपर ऐसी सूचनाएँ लिखकर, कि किस विषयके बाद कौन विषय हो, ग्रंथ परिपूर्ण कर रखा था । इससे ज्ञात होता है, कि उनको यह विश्वास नहीं था, कि अपने जीते जी कारागृहसे मुक्तता होगी या नहीं, और उनकी यह अत्युत्कट इच्छा थी, कि यदि मुक्तता न हो, तोभी अपना परिश्रम- पूर्वक संपादन किया हुआ ज्ञान और उसमे सूझे हुए विचार व्यर्थ न जायें, बल्कि उनका लाभ अगली पीढ़ीको मिले । पहली दो बहियोंके आरंभमें उन बहियोंमें वर्णित विषयोंकी अनुक्रमणिका है । ग्रंथका मुखपृष्ठ और समर्पण तीसरी बहीके २४५ से २४७ पृष्ठोंमें है और प्रस्तावना चौथी बहीके ३४१ से ३४३ और ३७५ से ३८४ पृष्ठोंमें है । कारागृहसे मुक्तता होनेपर प्रस्तावनामें कुछ सुधार किया गया है और वह प्रकाशन-कालमें सहायक व्यक्तियोंके निर्देशतकही सीमित है । यह विषय प्रथम संस्करणकी प्रस्तावनाके अंतिम परिच्छेदके पहलेके परिच्छेदमें है । अंतिम परिच्छेद तो कारागृहमेंही लिखा हुआ था । इनमेंसे पहली बहीके पहले आठ प्रकरणोंको 'पूर्वार्ध' संज्ञा दी गई है ( यह प्रथम बहीके प्रथम पृष्ठके चित्रसे ज्ञात होगा ), दूसरीको उत्तरार्ध भाग पहला और तीसरीको उत्तरार्ध भाग दूसरा, इस प्रकार संज्ञाएँ दी गई हैं । इससे ज्ञात होता है, कि ग्रंथके दो भाग करनेका उनका विचार था । इनमेंसे पहली बहीके आठ प्रकरणोंका हस्तलिखित केवल एक महीनेमेंही लिखकर तैयार हुआ था और यही

१० गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र प्रकरण अत्यंत महत्त्वके हैं। इससे लोकमान्य महोदयकी इस विषयकी ओतप्रोत तैयारीका और उनके लेखनके अस्खलित प्रवाहका यथार्थ ज्ञान पाठकोंको सहजही होगा। बहीके पृष्ठ फाड़ देनेकी अथवा नये जोड़नेकी, कारागृहके नियमानुसार, उनको आज्ञा न थी, किंतु पुनर्विचारसे सूझी बातोंके नये पृष्ठ बीच-बीचमें जोड़नेकी सुविधा उनको मिली थी। यह जानकारी दूसरी और तीसरी बहीके आवरणके अंदरके बाजूमें लिखी है। पहली तीन बहियाँ केवल एक-एक महीनेमें लिखी गई हैं और अंतिम बही सिर्फ़ एक पखवाडेमें लिखी गई है। मुख्य विषय दाहिने हाथके पृष्ठोंपर लिखके उनके पीछेके कोरे पृष्ठोंपर अगले पृष्ठोंमें समावेश करनेके लिये नयी बातें लिखी हुई हैं। आशा है, कि मूल हस्तलिखित प्रतिसंबंधी जिज्ञासा उक्त जानकारीसे पूर्ण होगी। इस ग्रंथका जन्म होनेके पहलेभी प्रस्तुत विषयके संबंधमें उनका व्यासंग जारी था, इसका उत्तम प्रमाण उनके अन्य दो ग्रंथ हैं। ‘मासानां मार्गशीर्षोऽहं’ (गीता १०-३५, गीतार. पृष्ठ ७७४) इस श्लोकका अर्थ निश्चित करते समय, उन्होंने वेदोंके महोदधिमें डुबकी लगा कर, ‘ओरायन’ रुपी रत्न जनताको दे दिया और वेदोदधिका पर्यटन करत करते आर्योंके मूल वसतिस्थानका पता लगाया है। काला- नुक्रमसे गीतारहस्य यद्यपि अंतिम ग्रंथ है, तोभी उक्त दो ग्रंथोंका पूर्व वृत्तान्त ध्यानमे रखनेसे, महत्त्वकी दृष्टिसे गीतारहस्यकोही आद्यस्थान देना पड़ता है। गीताविषयक व्यासंगसेही ये ग्रंथ निर्माण हुए हैं। ‘ओरायन’ ग्रंथकी प्रस्तावनामें लोकमान्य महाशयने गीताके अभ्यासका उल्लेख किया है। ‘ओरायन’ और ‘आर्योंका मूल वसतिस्थान’ ये दोनों अंग्रेजी ग्रंथ यथावकाश प्रकाशित हुए और जगत्भरमें विख्यात हो गये। परंतु गीतारहस्य लिखनेका मुहूर्त लोकमान्यके तीसरे दीर्घ कारावाससे प्राप्त हुआ। गीतारहस्यके पहलेके दोनों ग्रंथोंका लेखनभी कारागृहमेंही हुआ है। सार्वजनिक कार्य-प्रवृत्तियोंकी उपाधिसे मुक्त होकर ग्रंथलेखनके लिये आवश्यक स्वस्थता कारागृहमें मिल सकी; परंतु प्रत्यक्ष ग्रंथलेखनका आरंभ करनेके पूर्व उनको जिन बड़ी भारी मुसीबतोंका सामना करना पड़ा, उन्हें उनकेही शब्दोंमें इस जगह कहना उचित है- “ग्रंथके संबंधमें तीन बार तीन हुक्म आये...कुछ दिनके बाद मेरे पास सब पुस्तकें रखनेकी मनाही की गयी और सिर्फ़ चार पुस्तकेंही एक समय रखनेका हुक्म हुआ। उसपर बर्मा सरकारसे अर्ज करनेपर, ग्रंथ लेखनके लिये आवश्यक सब पुस्तकें मेरे पास रखनेकी आज्ञा हुई। जब मै वहाँसे लौटा, तब पुस्तकोंकी संख्या ३५० से ४०० तक पहुँची थी। ग्रंथलेखनके लिये जो काग़ज़ देते थे, वेभी छूटे न दे कर, जिल्ददार किताब, भीतरके पृष्ठ गिनके और उनपर दोनों ओर क्रमांक लिखकर, देते थे और लिखनेको स्याही न देके सिर्फ़ नोकदार पेन्सिलें देते थे” (लोकमान्य तिलक महाशयके कारागारसे छूटनेके बादकी पहली मुलाक़ात – ‘केसरी’ दि. ३० जून १९१४)।

प्रकाशकोंका निवेदन ११ इस प्रकार वाचकवृन्द कल्पना कर सकते हैं, कि तिलक महोदयको ग्रंथलेखनमें कैसी-कैसी मुसीबतोंका सामना करना पड़ा होगा, परंतु उनकी चिंता न करके सन् १९१० के जाड़ेंमें उन्होंने हस्तलिखित प्रति तैयार कर दी । ग्रंथके हस्तलिखितके तैयार होनेका समाचार उन्होंने सन् १९११ के आरंभके एक पत्रमें दिया था और वह पत्र सन् १९११ के मार्च महीनेके 'मराठा' पत्रके एक अंकमें समग्र प्रसिद्ध हुआ है । गीतारहस्यमें किया गया विवेचन लोगोंको अधिक सुगम हो, इसलिये तिलक महोदयने सन् १९१४ के गणेशोत्सवमें चार व्याख्यान दिये, और बादमें ग्रंथ छापनेके कामका आरंभ होकर १९१५ के जून महीनेमें उसका पूर्णावतार हुआ । इसके आगेका इतिहास सबको सुविदितही है । सन् १९५६ ईसवीमें, लोकमान्य तिलकजीकी जन्मशताब्दीके उपलक्ष्यमें, इस मौलिक ग्रंथके नये संस्करणको प्रकाशित करते समय, यह निश्चय किया गया, कि इस ग्रंथका वेष्टनभी नया हो । इच्छा थी, कि वेष्टनपर स्वर्गीय लोकमान्य तिलक महोदयका तथा उनकी कल्पनाके अनुसार कुरुक्षेत्रकी रणभूमिका चित्र रहे । हमारे चित्रकार-मित्र श्रीमान् दलालजीने हमारी मूल कल्पनाकी अपेक्षाभी इतनी अधिक सफलतापूर्वक ये दोनों चित्र चित्रित किये हैं, कि उनकी अलग प्रशंसा करनेकी कोई आवश्यकता नहीं रही । चित्रकारसे मोहक एवं अत्युत्तम चित्र खिंचवाये जानेपरभी छपाईका कार्यभी उतनीही लगनसे करना पड़ता है । शिवराज फाईन आर्ट लिथो वर्क्स ( नागपुर ) ने वेष्टनछपाईका वह कार्य सुचारू रूपसे पूर्ण कर दिया है । सोलहवां संस्करणको संशोधित तथा दोषरहित बनानेके लिये श्री. भगवान नारायण कानडेजीने अत्यधिक परिश्रम किये थे । उन्नीसवां संस्करणके सभी ग्रंथ बीक चुके है और इस मौलिक तथा शास्त्रीय ग्रंथके लिये सतत माँग हो रही है । इसलिये यह उन्नीसवाँ संस्करण तुरन्त प्रकाशित किया है । परशुराम प्रोसेसके श्री. सुभाष बर्वेजीने यह ग्रंथ तुरन्त छपवा दिया इसलिये आपको धन्यवाद प्रदान करना हम अपना कर्तव्य मानते है । काग़ज़का मूल्य अधिकाधिक बढ़ रहा है और छपाईकी दरोंमेंभी वृद्धि होती रही है अतः इस ग्रंथका मूल्य बढ़ा देना अपरिहार्य-सा हो गया है । इस प्रकार ग्रंथकी सजावटमें अनेकोंने परिश्रम उठाये हैं । पाठकोंके हाथमें आज यह ग्रंथ हम दे रहे हैं । आशा है, पाठक इसका सहर्ष और सानन्द स्वीकार करेंगे । पूना, दी. ज. टिळक दि. १।५।१९८२ शै. श्री. टिळक

अनुवादककी भूमिका भूमिका लिखकर महात्मा तिलकके ग्रंथका परिचय कराना, मानो सूर्यको दीपकसे दिखलानेका प्रयत्न करना है। यह ग्रंथ स्वयं प्रकाशमान् होनेके कारण अपना परिचय आपही दे देता है। परंतु भूमिका लिखनेकी प्रणाली-सी पड़ गई है। ग्रंथको पातेही पत्र उलट-पलटकर पाठक भूमिका खोजने लगते हैं। इसलिये उक्त प्रणालीकी रक्षा करने और पाठकोंकी मनस्तुष्टि करनेके लिये इस शीर्षकके नीचे दो शब्द लिखना आवश्यक हो गया है। संतोषकी बात है, कि श्रीसमर्थ रामदासस्वामीकी अशेष कृपासे, तथा सद्गुरु श्रीरामदासानुदास महाराजके (हनुमानगढ़, वर्धा निवासी श्रीधर विष्णु परांजपे) प्रत्यक्ष अनुग्रहसे, जब मेरे हृदयमें अध्यात्म-विषयकी जिज्ञासा उत्पन्न हुई है, तभीसे इस विषयके अध्ययनके महत्त्वपूर्ण अवसर अनायास मिलते जाते हैं। यह उसी कृपा और अनुग्रहका फल था, कि मैं संवत् १९७० में श्रीसमर्थके दासबोधका हिंदी अनुवाद कर सका। अब उसी कृपा और अनुग्रहके प्रभावसे लोकमान्य बाल गंगाधर तिलककृत श्रीमद्भगवद्गीतारहस्यके अनुवाद करनेका अनुपम अवसर हाथ लग गया हैं। जब मुझे यह काम सौंपा गया, तब ग्रंथकारने अपनी यह इच्छा प्रकट की, कि मूल ग्रंथमें प्रतिपादित सब भाव ज्यों-के-त्यों हिंदीमें पूर्णतया व्यक्त किये जायें; ग्रंथमें प्रतिपादित सिद्धान्तोंपर जो आक्षेप होंगे, उनके उत्तरदाता मूल लेखकही हैं। इसलिये मैंने अपने लिये दो कर्तव्य निश्चित किये :- (१) यथा- मति मूल भावोंकी पूरी पूरी रक्षा की जावे, और (२) अनुवादकी भाषा यथाशक्ति शुद्ध, सरल, सरस और सुबोध हो। अपनी अल्पबुद्धि और सामर्थ्यके अनुसार इन दोनों कर्तव्योंके पालन करनेमें मैंने कोई बात उठा नहीं रखी है; और मेरा आंतरिक विश्वास है, कि मूल ग्रंथके भाव यत्किंचित्भी अन्यथा नहीं हो पाये हैं। परंतु संभव है, कि विषयकी कठिनता और भावोंकी संभी- रताके कारण मेरी भाषाशैली कहीं कहीं क्लिष्ट अथवा दुर्बोध-सी हो गई हो; और यहभी संभव है, कि ढूंढनेवालोंको इसमें 'मराठीपनकी बू' भी मिलजाय। परंतु इसके लिये क्या किया जाय ? लाचारी है। मूल ग्रंथ मराठीमें है, मैं स्वयं महाराष्ट्रका हूँ, मराठीही मेरी मातृभाषा है, महाराष्ट्र देशके केंद्रस्थल पूनामेंही यह अनुवाद छापा गया है। और मैं हिंदीका कोई 'धुरंधर' लेखकभी नहीं हूँ। ऐसी अवस्थामें, यदि इस ग्रंथमें उक्त दोष न मिलें, तो बहुत आश्चर्य होगा। यद्यपि मराठी 'रहस्य' को हिंदी पोशाक पहनाकर सर्वांगसुंदर रूपसे हिंदी पाठकोंके उत्सुक हृदयोंमें प्रवेश करानेका यत्न किया गया है; और ऐसे महत्त्वपूर्ण

अनुवादककी भूमिका १३ विषयको समझानेके लिये उन सब साधनोंकी सहायता ली गई है, कि जो हिंदी साहित्य-संसारमें प्रचलित है; फिरभी स्मरण रहे, कि यह केवल अनुवादही है - इसमें वह तेज नहीं आ सकता, कि जो मूलग्रंथमें है। गीताके संस्कृत श्लोकोंके मराठी अनुवादके विषयमें स्वयं महात्मा तिलकने उपोद्घातमें (पृष्ठ ६००) यह लिखा है :- " स्मरण रहे, कि अनुवाद आखिर अनुवादही है। हमने अपने अनुवादमें गीताके सरल, खुले और प्रधान अर्थको ले आनेका प्रयत्न किया है सही ; परंतु संस्कृत शब्दोंमें और विशेषतः भगवानकी प्रेमयुक्त, रसीली, व्यापक और क्षण- क्षणमे नई रुचि उत्पन्न करानेवाली वाणीमें लक्षणासे अनेक व्यंग्यार्थ उत्पन्न करनेकी जो सामर्थ्य है, उसे जराभी न घटा-बढ़ाकर, दूसरे शब्दोंमें ज्यों-का-त्यों झलक देना असंभव है...!" ठीक यही बात महात्मा तिलकके ग्रंथके हिंदी अनुवादके विषयमें कही जा सकती है। एक तो विषय तात्त्विक, दूसरे गंभीर, और फिर महात्मा तिलककी वह ओजस्विनी, व्यापक एवं विकट भाषा कि जिसके मर्मको ठीक ठीक समझ लेना कोई साधारण बात नहीं है। इन दुहरी-तिहरी कठिनाइयोंके कारण यदि वाक्यरचना कहीं कठिन हो गई हो, दुरूह हो गई हो, या अशुद्धभी हो गई हो, तो उसके लिये सहृदय पाठक मुझे क्षमा करें। ऐसे ग्रंथके अनुवादमें किन किन कठिनाइयोंका सामना करना पड़ता है और अपनी स्वतंत्रताका त्यागकर पराधीनताके किन किन नियमोंमें बंध जाना होता है, इसका अभव वे सहानुभूतिशील पाठक और लेखकही कर सकते हैं, कि जिन्होंने इस ओर कभी ध्यान दिया हो। राष्ट्रभाषा हिंदीको इस बातका अभिमान है, कि वह महात्मा तिलकके गीता- रहस्यसंबंधी विचारोंको अनुवाद-रूपमें उस समय पाठकोंको भेंट कर सकी है, जब कि और किसीभी भाषाका अनुवाद प्रकाशित नहीं हुआ; - यद्यपि दो-एक अनुवाद तैयार थे। इससे, आशा है, कि हिंदीप्रेमी अवश्य प्रसन्न होंगे। अनुवादका श्रीगणेश जुलाई १९१५ में हुआ था और दिसंबरमें उसकी पूर्ति हुई। जनवरी १९१६ से छपाईका आरंभ हुआ, जो जून सन् १९१६ में समाप्त हो गया। इस प्रकार एक वर्षमें यह ग्रंथ तैयार हो पाया। यदि मित्रमंडलीने मेरी पूर्ण सहायता न की होती, तो मैं, इतने समयमें, इस कामको कभी पूरा न कर सकता। इनमें वैद्य विश्वनाथराव लुखे और श्रीयुत मौलिप्रसादजीका नाम उल्लेख करने- योग्य है। कविवर बा. मैथिलीशरण गुप्तने कुछ मराठी पद्योंका हिंदी रूपांतर करनेमें अच्छी महायता दी है, इसलिये वे धन्यवादके भागी हैं। श्रीयुत पं. लल्लीप्रसाद पांडेयने जो सहायता की है, वह अवर्णनीय एवं अत्यंत प्रशंसाके योग्य है। लेख लिखनेमें, हस्तलिखित प्रतिको दुहरानेमें और प्रूफका संशोधन करनेमें आपने दिन-रात कठिन परिश्रम किया है। अधिक क्या कहा जाय, घर छोड़कर महीनोंतक आपको इस कामके लिये पूनामें रहना पड़ा है। इस सहायता और उपकारका बदला केवल

१४ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र धन्यवाद दे देनेसेही नहीं हो जाता; हृदय जानता है; कि मैं आपका कैसा ऋणी हूँ । हिं. चि. ज. के संपादक श्रीयुत भास्कर रामचंद्र भालेरावने तथा औरभी अनेक मित्रोंने समय-समयपर यथाशक्ति सहायता की है । अतः इन सब महाशयोंको मैं आंतरिक धन्यवाद देता हूँ । एक वर्षसे अधिक समयतक इस ग्रंथके साथ मेरा अहोरात्र सहवास रहा है । सोते-जागते इसी ग्रंथके विचारोंकी मधुर कल्पनाएँ नजरोंमें झूलती रही हैं । इन विचारोंसे मुझे मानसिक तथा आत्मिक अपार लाभ हुआ है । अतः जगदीश्वरसे यही विनय है, कि इस ग्रंथके पढ़नेवालोंकोभी इससे लाभान्वित होनेका मंगलमय आशीर्वाद दीजिये । श्रीरामदासी मठ, रायपुर (सी. पी.) देवशयनी ११, मंगलवार, माधवराव सप्रे संवत् १९७३ वि.

प्रस्तावना सन्तों की उच्छिष्ट उक्ति है मेरी बानी । जानूँ उसका भेद भला क्या मैं अज्ञानी ॥* श्रीमद्भगवद्गीतापर अनेक संस्कृत भाष्य, टीकाएँ अथवा देशी भाषाओंमें अनुवाद या सर्वमान्य विस्तृत निरूपण हैं, फिरभी यह ग्रंथ क्यों प्रकाशित किया गया ? यद्यपि इसका कारण ग्रंथके आरंभमेंही बतलाया गया है, तथापि कुछ बातें ऐसी हैं, कि जिनका ग्रंथके प्रतिपाद्य विषयके विवेचनमें उल्लेख न हो सकता था, अतः उन बातोंको प्रकट करनेके लिये प्रस्तावनाको छोड़ और दूसरा स्थान नहीं है । इनमें सबसे पहली बात स्वयं ग्रंथकारके विषयमें है । कोई तैतालीस वर्ष हुए जब हमारा भगवद्गीतासे प्रथम परिचय हुआ था । सन् १८७२ ईसवीमें हमारे पूज्य पिताजी अंतिम रोगसे आक्रान्त हो शय्यापर पड़े हुए थे, उस समय उन्हें 'भाषा- विवृत्ति' नामक भगवद्गीताकी मराठी टीका सुनानेका काम हमें मिला था । तब, अर्थात् अपनी आयुके सोलहवें वर्षमें गीताका भावार्थ पूर्णतया समझमें न आ सकता था । फिरभी छोटी अवस्थामें मनपर जो संस्कार होते हैं, वे दृढ़ हो जाते हैं, इस कारण उस उमय भगवद्गीताके संबंधमें जो चाह उत्पन्न हो गई थी, वह स्थिर बनी रही और आगे जब संस्कृत और अंग्रेजीका अधिक अभ्यास हो गया, तब हमने गीताके संस्कृत भाष्य, अन्यान्य टीकाएँ और अनेक पंडितोंके मराठी तथा अंग्रेजीमें लिखे हुए विवेचनभी समय-समयपर पढ़े । परंतु तब मनमें शंका उत्पन्न हुई, कि जो गीता अपने स्वजनोंके साथ युद्ध करनेको बड़ा भारी कुकर्म समझकर खिन्न होने- वाले अर्जुनको युद्धमें प्रवृत्त करनेके लिये बतलाई गई है, उस गीतामें ब्रह्मज्ञानसे या भक्तिसे मोक्ष-प्राप्तिकी विधिका - निरे मोक्ष-मार्गका - विवेचन क्यों किया गया है ? यह शंका इसलिये औरभी दृढ़ होती गई, कि गीताकी किसीभी टीकामें इस विषयका योग्य उत्तर ढूँढ़े न मिला । कौन जानता है, कि हमारे समानही और लोगोंकोभी यही शंका हुई न होगी ! परंतु टीकाओंपरही निर्भर रहनेसे, टीका- कारोंका दिया हुआ उत्तर समाधानकारक न भी जँचे, तोभी उसको छोड़ और दूसरा उत्तर सूझताही नहीं है । इसीलिये जब हमने गीताकी समस्त टीकाओं और भाष्योंको लपेटकर एक ओर धर दिया और केवल गीताकेही स्वतंत्र विचार- पूर्वक अनेक पारायण किये, तब टीकाकारोंके चंगुलसे छूटे, और यह बोध हुआ, कि मूल गीता निवृत्ति-प्रधान नहीं है, वह तो कर्म-प्रधान है, और अधिक क्या कहें ! गीतामें अकेला 'योग' शब्दही 'कर्मयोग'के अर्थमें प्रयुक्त हुआ है । महा-

  • साधु तुकारामके एक 'अभंग'का भाव ।

१६ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र भारत, वेदान्तसूत्र, उपनिषद् और वेदान्तशास्त्रविषयक अन्यान्य संस्कृत तथा अंग्रेजी भाषाके ग्रंथोंके अध्ययनसेभी वही मत दृढ़ होता गया; और चार-पाँच स्थानोंपर इसी विषयपर व्याख्यान इस इच्छासे दिये, कि सर्वसाधारणमें उस विषयके संबंधमें उक्त मत प्रकट कर देनेसे, अधिक चर्चा होगी, एवं सत्य तत्त्वका निर्णय करनेमें औरभी सुविधा हो जायगी । इनमेंसे पहला व्याख्यान नागपुरमें जनवरी सन् १९०२ में हुआ और दूसरा सन् १९०४ ईसवीके अगस्त महीनेमें करवीर एवं संकेश्वर मठके जगद्गुरु श्रीशंकराचार्यकी उपस्थितिमें उन्हींकी आज्ञासे, संकेश्वर मठमें हुआ था, और उस समय नागपुरवाले व्याख्यानका विवरणभी समाचारपत्रोंमें प्रकाशित हुआ है । इसके अतिरिक्त जब जब समय मिल गया, तब तब इसी विचारसे, कुछ विद्वान् मित्रोंके साथ समय-समयपर वाद-विवादभी किया । इन्हीं मित्रोंमें स्वर्गीय श्रीपतिबाबा भिंगारकर थे । इनके सहवाससे भागवत संप्रदायके कुछ प्राकृत ग्रंथ देखनेमें आये, और गीतारहस्यमें वर्णित कुछ बातें तो आपके और हमारे वाद-विवादमेंही पहले निश्चित हो चुकी थीं । यह बड़े दुःखकी बात है, कि आप इस ग्रंथको देख न पाये । अस्तु; इस प्रकार यह मत निश्चित हो गया, कि गीताका प्रतिपाद्य विषय प्रवृत्ति- प्रधान है; और इसको लिखकर ग्रंथरूपमें प्रकाशित करनेका विचार कियेभी अनेक वर्ष बीत गये । वर्तमान समयमें पाये जानेवाले भाष्यों, टीकाओं या अनुवादोंमें जो गीता-तात्पर्य स्वीकृत नहीं हुआ है, केवल उसेही यदि पुस्तकरूपसे प्रकाशित कर देते, और इसका कारण न बतलाते, कि प्राचीन टीकाकारोंका निश्चित किया हुआ तात्पर्य हमें ग्राह्य क्यों नहीं है, तो बहुत संभव था, कि लोग कुछका कुछ समझने लग जाते - उनको भ्रम हो जाता; और समस्त टीकाकारोंके मतोंका संग्रह करके उनकी सकारण अपूर्णता दिखला देना, एवं अन्य धर्मों या तत्त्वज्ञानोंके साथ गीता-धर्मकी तुलना करना कोई ऐसा साधारण काम न था, जो शीघ्रतापूर्वक चटपट हो जाय। अतएव यद्यपि हमारे मित्र श्रीयुत दाजीसाहेब खरे और दादासाहेब खापर्डेने कुछ पहलेही यह प्रकाशित कर दिया था, कि हम गीतापर एक नवीन ग्रंथ शीघ्रही प्रसिद्ध करनेवाले हैं; तथापि ग्रंथ लिखनेका काम इस समझसे टलता गया, कि हमारे पास जो सामग्री है वह अभी, अपूर्ण है; जब सन् १९०८ ईसवीमें सजा देकर हम मंडाले भेज दिये गये, तब तो इस ग्रंथके लिखे जानेकी आशा बहुत कुछ घटही गई थी । किंतु कुछ समय बाद ग्रंथ लिखनेके लिये आवश्यक पुस्तकें आदि सामग्री पूनासे मँगा लेनेकी अनुमति जब सरकारकी मेहरबानीसे मिल गई, तब सन् १९१०-११ के कुछ कालमें (संवत् १९६७, कार्तिक शुक्ल १ से चैत्र कृष्ण ३० के भीतर) इस ग्रंथकी पांडु- लिपि (मसविदा) मंडालेके जेलखानेमें पहले पहल लिखी गई । और फिर समयानुसार जैसे जैसे विचार सूझते गये, वैसे वैसे उसमें काट-छांट होती गई; उस समय समग्र पुस्तकें वहाँ न होनेके कारण कई स्थानोंमें जो अपूर्णता रह गई थी, उसे वहाँसे छुटकारा हो जानेपर पूर्ण तो कर लिया गया है; परंतु अभीभी यह नही कहा

प्रस्तावना १७ जा सकता, कि यह ग्रंथ सर्वांशमें पूर्ण हो गया। क्योंकि मोक्ष और नीति-धर्मके तत्त्व गहन तो हैंही; साथही उनके संबंधमें अनेक प्राचीन और अर्वाचीन पंडितोंने इतना विस्तृत विवेचन किया है, कि व्यर्थ फैलावसे बचकर यह निर्णय करना कई बार कठिन हो जाता है, कि उसमेंसे इस छोटे-से ग्रंथमें किन किन बातोंका समावेश किया जावे ? परंतु अब हमारी स्थिति महाराष्ट्रके कविकी इस उक्तिके अनुसार हो गई है:- यम-सेना की विमल ध्वजा अब 'जरा' दृष्टिमें आती है। करती हुई युद्ध रोगोंसे देह हारती जाती है ॥* और हमारे सांसारिक साथीभी पहलेही चल बसे हैं। अतएव अब इस ग्रंथको यह समझकर प्रसिद्ध कर दिया है, कि हमें जो बातें मालूम हो गई है और जिन विचारोंको हमने सोचा है, वे सब लोगोंकोभी ज्ञात हों जाएँ; फिर कोई-न-कोई 'समानधर्मा' अभी या आगे उत्पन्न होकर उन्हें पूर्ण करही लेगा। आरंभमेंही यह कह देना आवश्यक है, कि यद्यपि हमें यह मत मान्य नहीं है, कि सांसारिक कर्मोंको गौण अथवा त्याज्य मानकर, ब्रह्मज्ञान और भक्ति प्रभृति निरे निवृत्ति-प्रधान मोक्ष-मार्गकाही निरूपण गीतामें है; तथापि हम यहभी नहीं कहते, कि मोक्ष-प्राप्ति-मार्गका विवेचन भगवद्गीतामें बिलकुलही नहीं है। हमनेभी इस ग्रंथमें स्पष्ट दिखला दिया है, कि गीताशास्त्रके अनुसार इस जगत्में प्रत्येक मनुष्यका पहला कर्तव्य यही है, कि वह परमेश्वरके शुद्ध स्वरूपका ज्ञान प्राप्त करके उसके द्वारा अपनी बुद्धिको, जितनी हो सके उतनी, निर्मल और पवित्र कर ले, परंतु यह गीताका मुख्य विषय नहीं है। युद्धके आरंभमें अर्जुन इस कर्तव्य- मोहमें फँसा था, कि, कि युद्ध करना क्षत्रियका धर्म भलेही हो, परंतु विपरीत पक्षमें कुलक्षय आदि घोर पातक होनेसे जो युद्ध मोक्ष-प्राप्तिरूप आत्म-कल्याणका नाशकर डालेगा, उस युद्धको करना चाहिये अथवा नहीं। अतएव हमारा यह अभिप्राय है, कि उस मोहको दूर करनेके लिये शुद्ध वेदान्तशास्त्रके आधारपर कर्म-अकर्मका और साथही साथ मोक्षके उपायोंकाभी पूर्ण विवेचन कर, इस प्रकार निश्चय किया गया है, कि एक तो कर्म कभी छूटतेही नहीं है; और दूसरे, उनको छोड़नाभी नहीं चाहिये; एवं गीतामें उस युक्तिका, अर्थात् ज्ञानमूलक और भक्ति-प्रधान- कर्मयोगकाही प्रतिपादन किया गया है, कि जिससे कर्म करनेपर कोईभी पाप नहीं लगता तथा अंतमें उसीसे मोक्षभी मिल जाता है। कर्म-अकर्मके या धर्म-अधर्मके इस विवेचनकोही वर्तमानकालीन निरे आधिभौतिक पंडित नीतिशास्त्र कहते हैं। सामान्य पद्धतिके अनुसार गीताके श्लोकोंके क्रमसे टीका लिखकरभी यह दिखलाया जा सकता था, कि यह विवेचन गीतामें किस प्रकार किया गया है; परंतु वेदान्त,

  • महाराष्ट्र-कविवर्य मोरोपंतकी 'केका'का भाव। गी. र. २ *

१८ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र मीमांसा, सांख्य, कर्मविपाक अथवा भक्ति प्रभृति शास्त्रोंके जिन अनेक वादों अथवा प्रमेयोंके आधारपर गीतामें कर्मयोगका प्रतिपादन किया गया है, और जिनका उल्लेख कभी कभी बहुतही संक्षिप्त रीतिसे पाया जाता है, उन शास्त्रीय सिद्धान्तोंका पहलेसेही ज्ञान हुए बिना गीताके विवेचनका पूर्ण रहस्य सहसा ध्यानमें नहीं जमता । इसीलिये गीतामें जो जो विषय अथवा सिद्धान्त आये हैं, उनके शास्त्रीय रीतिसे प्रकरणोंमें विभाग करके उनकी प्रमुख प्रमुख युक्तियोंसहित गीतारहस्यमें उनका पहले संक्षेपमे निरूपण किया गया है; और फिर उसीमें वर्तमान युगकी आलोचना- त्मक पद्धतिके अनुसार गीताके प्रमुख सिद्धान्तोंकी तुलना अन्यान्य धर्मोंके और तत्त्वज्ञानोंके साथ प्रसंगानुसार संक्षेपमें कर दिखलाई गई है। इस रीतिसे इस पुस्तकके पूर्वार्धमें जो गीतारहस्य नामक निबंध है, वह कर्मयोगविषयक एक छोटासा किंतु स्वतंत्र ग्रंथही कहा जा सकता है । जो हो; इस प्रकारके सामान्य निरूपणमें गीताके प्रत्येक श्लोकका पूर्ण विचार हो नहीं सकता था । अतएव अंतमें गीताके प्रत्येक श्लोकका अनुवाद दे दिया है; और उसीके साथ स्थान-स्थानपर यथेष्ट टिप्पणियाँभी इसलिये जोड़ दीं गई हैं, कि जिसमें पूर्वापर संदर्भ पाठकोंकी समझमें भली भाँति आ जाय, अथवा पुराने टीकाकारोंने अपने संप्रदायकी सिद्धिके लिये गीताके कुछ श्लोकोंकी जो खींचातानी की है, उसे पाठक समझ जायें ( गीता ३.१७-१९; ६. ३; १८. २ ); या वे सिद्धान्त सहजही ज्ञात हो जाय कि जो गीतारहस्यमें बतलाये गये हैं, और यहभी ज्ञात हो जाय, कि उनमेंसे कौनकौनसे सिद्धान्त गीताकी संवादात्मक प्रणालीके अनुसार कहाँ कहाँ किस प्रकार आये हैं ? इसमें संदेह नहीं, कि ऐसा करनेसे कुछ विचारोंकी द्विरुक्ति अवश्य हो गई है; परंतु गीतारहस्यका विवेचन गीताके अनुवादसे इसलिये पृथक् रखना पड़ा है, कि गीता-ग्रंथके तात्पर्यके विषयमें साधारण पाठकोंमें जो भ्रम फैल गया है, वह भ्रम अन्य रीतिसे पूर्णतया दूर नहीं हो सकता था; और इस पद्धतिसे पूर्व इतिहास और आधारसहित यह दिखलानेमें सुविधा हो गई है, कि वेदान्त, मीमांसा और भक्ति प्रभृतिविषयक गीताके सिद्धान्त भारत, सांख्यशास्त्र, वेदान्त-सूत्र, उपनिषद् और मीमांसा आदि मूल ग्रंथोंसे कैसे और कहाँ आये हैं ? इससे यहभी स्पष्टतया बतलाना सुगम हो गया है, कि संन्यास-मार्ग और कर्मयोग-मार्गमें क्या भेद हैं, तथा अन्यान्य धर्ममतों और तत्त्वज्ञानोंके साथ गीताकी तुलना करके व्यावहारिक कर्म-दृष्टिसे गीताके महत्त्वका योग्य निरूपण करना सरल हो गया है। यदि गीतापर अनेक प्रकारकी टीकाएँ न लिखी गई होतीं और अनेकोंने अनेक प्रकारसे गीताके तात्पर्या- र्थोंका प्रतिपादन न किया होता, तो हमें अपने ग्रंथके सिद्धान्तके लिये पोषक और आधारभूत मूल संस्कृत वचनोंके अवतरण स्थान-स्थानपर देनेकी कोई आवश्यकताही न थी । किंतु वर्तमान समय दूसरा है; और लोगोंके मनमें यह शंका हो सकती थी, कि हमने जो गीतार्थ अथवा सिद्धान्त बतलाया है, वह ठीक है या नहीं ? इसीलिये

प्रस्तावना १९ हमने सर्वत्र स्थलनिर्देश कर बतला दिया है, कि हमारे कथनके लिये प्रमाण क्या है, और मुख्य मुख्य स्थानोंपर तो मूल संस्कृत वचनोंकोही अनुवादसहित उद्धृत कर दिया है। इसके व्यतिरिक्त इन संस्कृत वचनोंको उद्धृत करनेका औरभी एक प्रयोजन है, वह यह, कि इनमेंसे अनेक वचन साधारण तथा वेदान्त-ग्रंथोंसे प्रमाणार्थ लिये जाते हैं; अतः पाठकोंको यहाँ उनका सहजही ज्ञान हो जायगा और उन सिद्धान्तोंको भली भांति समझभी सकेंगे। किंतु यह कब संभव है, कि वे सभी पाठक संस्कृतज्ञ हों ? इसलिये समस्त ग्रंथकी रचना इस ढंगसे की गई है, कि यदि संस्कृत न जाननेवाले पाठक संस्कृत श्लोकोंको छोड़कर केवल ग्रंथही पढ़ते चले जायें, तोभी अर्थमें कहीं भी गडबड न हो। इस कारण संस्कृत श्लोकोंका शब्दशः अनुवाद न लिखकर अनेक स्थलोंपर उनका केवल सारांश देकरही निर्वाह कर लेना पड़ा है। परंतु मूल श्लोक सदैव ऊपर रखा गया है। इसलिये इस प्रणालीसे भ्रम होनेकी कुछभी आशंका नहीं है। कहा जाता है, कि कोहनूर हीरा जब भारतवर्षसे विलायत पहुँचाया गया, तब वहाँ फिर उसके नये पहलू बनानेपर वह औरभी तेजस्वी हो गया। हीरेके लिये उप- युक्त होनेवाला यह न्याय सत्यरूपी रत्नोंके लियेभी प्रयुक्त हो सकता है। गीतामें प्रतिपादित धर्म, सत्य और अभय है सही; परंतु वह जिस समय और जिस स्वरूपमें बतलाया गया था, उस देश-काल आदि परिस्थितिमें अब बहुत अंतर हो गया है; इस कारण अब उसका तेज पहलेकी भाँति कितनोंहीकी दृष्टिमें नहीं समाता है। किसी कर्मको भला-बुरा माननेके पहले, जिस समय यह सामान्य प्रश्नही महत्त्वका समझा जाता था, कि “ कर्म करना चाहिये अथवा न करना चाहिये ”, उस समय गीता बतलाई गई है, इस कारण उसका बहुत-सा अंश अब कुछ लोगोंको अना- वश्यक प्रतीत होता है; और, उसपरभी निवृत्ति-मार्गीय टीकाकारोंकी लीपा-पोतीने तो गीताके कर्मयोगके विवेचनको आजकल बहुतेरोंके लिये दुर्बोध कर डाला है। इसके अतिरिक्त कुछ नये विद्वानोंकी यह समझ हो गई है, कि अर्वाचीन कालमें आधिभौतिक ज्ञानकी पश्चिमी देशोंमें जो बाढ़ हुई है, उस बाढ़के कारण अध्यात्म शास्त्रके आधारपर किये गये कर्मयोगके प्राचीन विवेचन वर्तमान-कालके लिये पूर्णतया उपयुक्त नहीं हो सकते; किंतु यह समझ ठीक नहीं। इस समझकी पोल खोलनेके लिये गीतारहस्यके विवेचनमें गीताके सिद्धान्तोंकी जोड़केही पश्चिमी पंडितोंके सिद्धान्तभी हमने स्थान-स्थानपर संक्षेपमें दिये हैं। वस्तुतः गीताका धर्म- अधर्म विवेचन इस तुलनासे कुछ अधिक सुदृढ नहीं हो जाता; तथापि अर्वाचीन कालकी आधिभौतिक शास्त्रोंकी अश्रुतपूर्व-वृद्धिसे जिनकी दृष्टिमें चकाचौंध लग गई है, अथवा जिन्हें आजकलकी एकदेशीय शिक्षापद्धतिके कारण आधिभौतिक अर्थात् बाह्य-दृष्टिसेही नीतिशास्त्रका विचार करनेकी आदत पड़ गई है, उन्हें इस तुलनासे इतना तो स्पष्ट ज्ञान हो जायगा, कि मोक्ष-धर्म और नीति, ये दोनों विषय

२० गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र आधिभौतिक ज्ञानके परे है; और वे यहभी जान जाएँगे, कि इसीसे प्राचीन-कालमें हमारे शास्त्रकारोंने इस विषयमें जो सिद्धान्त स्थिर किये हैं, उनके आगे मानवी ज्ञानकी गति अबतक नहीं पहुँच पाई है; यही नहीं, किंतु पश्चिमी देशोंमेंभी अध्यात्म-दृष्टिसे इन प्रश्नोंका विचार अभीतक हो रहा है, और इन आध्यात्मिक ग्रंथकारोंके विचार गीताशास्त्रके सिद्धान्तोंसे कुछ अधिक भिन्न नहीं हैं। गीता- रहस्यके भिन्न भिन्न प्रकरणोंमें जो तुलनात्मक विवेचन है, उससे यह बात स्पष्ट हो जायगी। परंतु यह विषय अत्यंत व्यापक है, इस कारण पश्चिमी पंडितोंके मतोंका जो सारांश विभिन्न स्थलोंपर हमने दे दिया है, उसके संबंधमें यहाँ इतना बतला देना आवश्यक है, कि गीतार्थको प्रतिपादन करनाही हमारा मुख्य काम है, अतएव गीताके सिद्धान्तोंको प्रमाण मानकर पश्चिमी मतोंका अनुवाद हमने केवल यही दिखलानेके लिये किया है कि इन सिद्धान्तोंसे पश्चिमी नीतिशास्त्रज्ञों अथवा पंडितोंके सिद्धान्तोंका यहाँ तक मेल है; और यह काम हमने इस ढंगसे किया है, कि जिससे सामान्य पाठकोंको उनका अर्थ समझनेमें कोई कठिनाई न हो। अब यह निर्विवाद है, कि इन दोनोंके बीच जो सूक्ष्म भेद हैं-और वे हैं भी बहुतही, अथवा इन सिद्धान्तोंके जो पूर्ण उपपादन या विस्तार हैं, उन्हें जाननेके लिये मूल पश्चिमी ग्रंथही देखने चाहिये। पश्चिमी विद्वान् कहते हैं, कि कर्म-अकर्मविवेक अथवा नीतिशास्त्रपर पहला नियमबद्ध ग्रंथ यूनानी तत्त्ववेत्ता अरिस्टाटलने लिखा है। परंतु हमारा मत है, कि अरिस्टाटलसेभी पहले, उनकी अपेक्षा अधिक व्यापक और तात्त्विक-दृष्टिसे, इन प्रश्नोंका विचार महाभारत एवं गीतामें हो चुका था, तथा अध्यात्म-दृष्टिसे गीतामें जिस नीतितत्त्वका प्रतिपादन किया गया है, उससे भिन्न कोई और नीतितत्त्व अबतक नहीं निकला है। "संन्यासियोंके समान रहकर तत्त्वज्ञानके विचारमें शांतिसे आयु बिताना अच्छा है, अथवा अनेक प्रकारकी राजकीय उथल-पुथल करना भला है"-इस विषयका जो स्पष्टीकरण अरिस्टाटलने किया है, वह गीतामें है; और साक्रेटीज़के इस मतकाभी गीतामें एक प्रकारसे समा- वेश हो गया है, कि "मनुष्य जो कुछ पाप करता है, वह अज्ञानसेही करता है।" क्योंकि गीताका तो यही सिद्धान्त है, कि ब्रह्मज्ञानसे बुद्धिकेसम हो जानेपर, फिर मनुष्यसे कोईभी पाप हो नहीं सकता। एपिक्यूरियन और स्टोइक पंथोंके यूनानी पंडितोंका यह कथनभी गीताको ग्राह्य है, कि पूर्ण अवस्थामें पहुँचे हुए परम ज्ञानी पुरुषका व्यवहारही नीति-दृष्टिसे सबके लिये आदर्शके समान प्रमाण है; और इन पंथवालोंने परम ज्ञानी पुरुषका जो वर्णन किया है, वह गीताके स्थितप्रज्ञके वर्णनके समानही है। इसी प्रकार मिल, स्पेन्सर, और कांट प्रभृति आधिभौतिकवादियोंका यह जो कथन है, कि नीतिकी पराकाष्ठा अथवा कसौटी यही है, कि प्रत्येक मनुष्यको सारी मानव-जातिके हितार्थ उद्योग करना चाहिये, उसकाभी गीतामें वर्णित स्थित- प्रज्ञके 'सर्वभूतहिते रतः' इस बाह्य लक्षणमें समावेश हो गया है, एवं, कांट और

प्रस्तावना २१ ग्रीनका, नीतिशास्त्रकी उपपत्तिविषयक तथा इच्छास्वातंत्र्यसंबंधी सिद्धान्तभी उपनिषदोंके ज्ञानके आधारपर गीतामें आ गया है। इसकी अपेक्षा यदि गीतामें और कुछ अधिकता न होती, तोभी वह सर्वमान्य हो गयी होती। परंतु गीता इतनेहीसे संतुष्ट नहीं हुई, प्रत्युत उसने यह दिखलाया है, कि मोक्ष, भक्ति और नीति-धर्मके बीच आधिभौतिक ग्रंथकारोंको जिस विरोधका आभास होता है, वह विरोध सच्चा नहीं है, अथवा ज्ञान और कर्ममें संन्यास-मार्गियोंके मतसे समझमें जो विरोध है, वहभी ठीक नहीं है, और ब्रह्मविद्याका और भक्तिका जो मूलतत्त्व है, वही नीतिका और सत्कर्मकाभी आधार है; एवं इस बातकाभी निर्णय कर दिया है, कि ज्ञान, संन्यास, कर्म और भक्तिके समुचित मेलसे, इस लोगमें आयु बितानेके किस मार्गको मनुष्य स्वीकार करे ? इस प्रकार गीता-ग्रंथ प्रधानतासे कर्मयोगका है, और इसीलिये, "ब्रह्मविद्यान्तर्गत (कर्म-)योगशास्त्र" इस नामसे समस्त वैदिक ग्रंथोंमें उसे अग्रस्थान प्राप्त हो गया है। गीताके विषयमें जो कहा जाता है, कि "गीता सुगीता कर्तव्या किमन्यैः शास्त्रविस्तरैः" - अकेली गीताकाही पूरा पूरा अध्ययन कर लेना बस है; शेष शास्त्रोंके योयो विस्तारसे क्या करना है, यह वह झूठ नहीं है, अतएव जिन लोगोंको हिंदु धर्म और नीतिशास्त्रके मूल तत्त्वोंसे परिचय कर लेना हो, उन लोगोंसे हम सविनय किंतु आग्रहपूर्वक कहते हैं, कि सबसे पहले आप इस अपूर्व ग्रंथका अध्ययन कीजिये। इसका कारण यह है, कि क्षर-अक्षर- सृष्टिका और क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ-ज्ञानका विचार करनेवाले सांख्य, न्याय, मीमांसा, उप- निषद् और वेदान्त आदि प्राचीन शास्त्र उस समय, जितने हो सकते थे उतने, पूर्ण अवस्थामें आ चुके थे; और उसके बादही वैदिक धर्मको जो ज्ञानमूलक, भक्ति-प्रधान एवं कर्मयोग-प्रधान अंतिम स्वरूप प्राप्त हुआ, तथा वर्तमान-कालमें प्रचलित वैदिक धर्मका जो मूल है, वही गीतामें प्रतिपादित होनेके कारण हम कह सकते हैं, कि संक्षेपमे किंतु निस्संदिग्ध रीतिसे वर्तमानकालीन हिंदु धर्मके तत्त्वोंको समझा देनेवाला, गीताकी जोड़का दूसरा ग्रंथही संस्कृत साहित्यमें नहीं है। उल्लिखित वक्तव्यसे पाठक सामान्यतः समझ होये होंगे, कि गीतारहस्यके विवेचनका ढंग कैसा है। गीतापर जो शांकरभाष्य है, उसके तीसरे अध्यायके आरंभके पुरातन टीकाकारोंके अभिप्रायोंके उल्लेखमे ज्ञात होता है, कि गीतापर पहले कर्मयोग-प्रधान टीकाएँ रही होंगी। किंतु इस समय ये टीकाएं उपलब्ध नहीं हैं; अतएव यह कहनेमें कोई क्षति नहीं, कि गीताका यह कर्मयोग-प्रधान और तुलनात्मक पहलाही विवेचन है। इसमें कुछ श्लोकोंके अर्थ उन अर्थोंसे भिन्न हैं, कि जो आजकलकी टीकाओंमें पाये जाते हैं, एवं ऐसे अनेक विषयभी बतलाये गये हैं, कि जो अबतककी प्राकृत टीकाओंमें विस्तारसहित कहींभी वर्णित नहीं थे। इन विषयोंको और उनकी उपपत्तियोंको यद्यपि हमने संक्षेपमेंही बतलाया है, तथापि यथाशक्य सुस्पष्ट और सुबोध रीतिसे बतलानेके उद्योगमें हमने कोई बात

२२ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र उठा नहीं रखी है; और ऐसा करनेमें यद्यपि कहीं कहीं द्विरुक्ति हो गई है, तोभी हमने उसकी कोई परवाह नहीं की; और जिन शब्दोंके अर्थ अबतक भाषामें प्रचलित नहीं हो पाये हैं उनके पर्याय शब्द उनके साथ-ही-साथ अनेक स्थलोंपर दे दिये हैं; इसके अतिरिक्त इस विषयके प्रमुख सिद्धान्त सारांशरूपसे स्थान-स्थानपर, उपपादनसे पृथककर दिखला दिये गये हैं। फिरभी शास्त्रीय और गहन विषयोंका थोड़े शब्दोंमें विचार करना सदैव कठिन है, और इन विषयोंकी हिंदी परि- भाषाभी अभी स्थिर नहीं हो पाई है; अतः हम जानते हैं, कि भ्रमसे, दृष्टिदोषसे, अथवा अन्यान्य कारणोंसे, हमारे इस नये ढंगके विवेचनमें कठिनाई, दुर्बोधता, अपूर्णता अथवा अन्य दोषभी रह गये होंगे। परंतु भगवद्गीता पाठकोंसे अपरिचितभी नहीं है। ऐसे बहुतेरे लोग हैं, जो नित्य नियमसे भगवद्गीताका पाठ किया करते हैं; और ऐसे लोगभी थोड़े नहीं हैं, कि इसका जो शास्त्रीय दृष्टिसे अध्ययन कर चुके हैं या कर रहे हैं। अतः ऐसे अधिकारी पुरुषोंसे हमारी एक प्रार्थना है, कि जब उनके हाथमें यह ग्रंथ पहुँचे, और यदि उन्हें इसमें उक्त प्रकारके कुछ दोष मिल जाएँ, तो वे कृपा कर हमें उनकी सूचना दे दें; जिससे हम उनका विचार करेंगे, और यदि इस ग्रंथके द्वितीय संस्करणके प्रकाशित करनेका अवसर आयेगा, तो इसमें यथा- योग्य संशोधन कर दिया जावेगा। संभव है, कुछ लोग समझें, कि हमारा कोई विशेष संप्रदाय है और उसी संप्रदायकी सिद्धिके लिये हम गीताका एक विशेष प्रकारका अर्थ कर रहे हैं। इसलिये यहाँ इतना कह देना आवश्यक है, कि यह गीतारहस्य ग्रंथ किसीभी व्यक्तिविशेष अथवा संप्रदायके उद्देश्यसे लिखा नहीं गया है। हमारी बुद्धिके अनुसार गीताके मूल संस्कृत श्लोकका जो सरल अर्थ होता है, वही हमने लिखा है। ऐसा सरल अर्थ कर देनेसे, — और आजकल संस्कृतका बहुत-कुछ प्रचार हो जानेसे बहुतेरे लोग समझ सकेंगे, कि अर्थ सरल है या नहीं, — यदि इसमें कुछ सांप्रदायिकता आ जावे, तो वह गीताकी है, हमारी नहीं। अर्जुनने भगवानसे स्पष्टही कहा था., कि “मुझे दो-चार मार्ग बतलाकर उलझनमें न डालिये, निश्चयपूर्वक ऐसा एकही मार्ग बतलाइये, कि जो श्रेयस्कर हो” (गीता ३. २; ५. १) इससे प्रकटही है, कि गीतामें किसी-न-किसी एकही विशेष मतका प्रति- पादन होना चाहिये (गीता ३. ३१); और मूल गीताकाही अर्थ करके निराग्रह- बुद्धिसे हमें देखना है, कि वह विशेष मत कौन-सा है; और हमें पहलेहीसे कोई मत स्थिर करके, गीताके अर्थकी इसलिये खींचातानी नहीं करनी है, कि उस पहलेसेही निश्चित किये हुए मतसे गीताका मेल नहीं मिलता। सारांश, गीताके वास्तविक रहस्यका, — फिर चाहे वह रहस्य किसीभी संप्रदायका अथवा पंथका हो — गीता- भक्तोंमें प्रसार करके, भगवानकेही अंतिम कथनानुसार यह ज्ञान-यज्ञ करनेके लिये हम प्रवृत्त हुए हैं; और हमें आशा है, कि इस ज्ञान-यज्ञकी अव्यंगताकी सिद्धिके लिये, ऊपर जो ज्ञानभिक्षा मांगी गई है, उसे हमारे देशबंधु और धर्मबंधु बड़े आनंदसे दे देंगे।

प्रस्तावना २३

प्राचीन टीकाकारोंके प्रतिपादित गीता-तात्पर्यके और हमारे मतानुसार गीताके रहस्यमें भेद क्यों पड़ता है, उसके कारण गीतारहस्यमें विस्तारपूर्वक बतलाये बन गये हैं। परंतु यहाँ यह बतला देना आवश्यक है, कि गीताके तात्पर्यके संबंधमें यद्यपि इस प्रकार मतभेद हो, तोभी गीतापर जो अनेक भाष्य और टीकाएँ हैं, अथवा पहले या वर्तमान समयमें गीताके जो भाषानुवाद हुए हैं, उनसे हमें यह ग्रंथ लिखते समय अन्यान्य बातोंमें सदैवही प्रसंगानुसार थोड़ी-बहुत सहायता मिली है; एतदर्थ हम उन सबके अत्यंत ऋणी हैं। इसी प्रकार उन पश्चिमी पंडितोंकाभी उपकार मानना चाहिये, कि जिनके ग्रंथोंके सिद्धान्तोंका हमने स्थान-स्थानपर उल्लेख किया है। और तो क्या ! यदि इन सब ग्रंथोंकी सहायता न मिली होती, तो संदेहही है, कि यह ग्रंथ लिखा जाता या नहीं। इसीसे हमने प्रस्तावनाके आरंभमेंही साधु तुकारामका यह वाक्य लिख दिया हैं - “संतोंकी उच्छिष्ट उक्ति है मेरी बानी।” सदा सर्वदा एकसाही उपयोगी होनेवाला अर्थात् त्रिकाल- अबाधित जो ज्ञान है, उसका निरूपण करनेवाले गीता जैसे ग्रंथसे कालभेदके अनुसार मनुष्यको नवीन नवीन स्फूर्ति प्राप्त हो, तो उसमें कोई आश्चर्य नहीं है; क्योंकि ऐसे व्यापक ग्रंथका तो यह धर्मही रहता है। परंतु इतनेहीसे प्राचीन पंडितोंके वे परिश्रम व्यर्थ नहीं हो जाते, कि जो उन्होंने इन ग्रंथोंकेलिये किये हैं। पश्चिमी पंडितोंने गीताके जो अनुवाद अंग्रेजी और जर्मन प्रभृति यूरोपकी भाषाओंमें किये हैं, उनके लियेभी यही न्याय उपयुक्त होता है। ये अनुवाद प्रायः गीताकारोंके प्राचीन टीकाके आधारसे किये जाते हैं। फिरभी कुछ पश्चिमी पंडितोंने स्वतंत्र रीतिसे गीताके अर्थ करनेका उद्योग आरंभ कर दिया है। परंतु सच्चे (कर्म-) योगका तत्त्व अथवा वैदिक-धार्मिक संप्रदायोंका इतिहास भली भाँति समझ न सकनेके कारण, या बहिरंग परीक्षासेही उनकी विशेष रुचिके कारण, अथवा ऐसेही और कुछ कारणोंसे पश्चिमी पंडितोके ये विवेचन अधिकतर अपूर्ण और कुछ कुछ स्थानोंमें तो सर्वथा भ्रामक और गलत हैं। यहाँपर पश्चिमी पंडितोंके गीताविषयक ग्रंथोंका विस्तृत विचार करने अथवा उनकी जाँच करनेकी कोई आवश्यकता नहीं है। उन्होंने जो प्रमुख प्रश्न उपस्थित किये हैं, उनके संबंधमें हमारा जो वक्तव्य है, वह इस ग्रंथके परिशिष्ट-प्रकरणमें दिया गया है। किंतु यहाँ गीताविषयक उन अंग्रेजी लेखोंका उल्लेख कर देना उचित प्रतीत होता है, कि जो इन दिनों हमारे देखनेमें आये हैं। पहला लेख मि. बुक्सका है; मि. बुक्स थिऑस- फिस्ट पंथके हैं, उन्होंने अपने गीताविषयक ग्रंथमें सिद्ध किया है, कि भगवद्गीता कर्मयोग-प्रधान है; और वे अपने व्याख्यानोंमेंभी इसी मतका प्रतिपादन किया करते हैं। दूसरा लेख मद्रासके मि. एस. राधाकृष्णन्‌का है, और वह छोटे निबंधके रूपमें अमरीकाके “सार्वराष्ट्रीय नीतिशास्त्रसंबंधी त्रैमासिक”में प्रकाशित हुआ है (जुलाई १९११)। इसमें आत्मस्वातंत्र्य और नीति-धर्म, इन दो विषयोंके

२४ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र

संबंधमें गीता और कांटकी समता दिखलाई गई है। हमारे मतसे यह साम्य इससेभी कहीं अधिक व्यापक है, और कांटकी अपेक्षा ग्रीनकी नैतिक उपपत्ति गीतासे कहीं अधिक मिलती-जुलती है। परंतु इन दोनों प्रश्नोंका स्पष्टीकरण इस ग्रंथमें किया ही गया है, अतः यहां उसको दुहरानेकी आवश्यकता नहीं है। इसी प्रकार पंडित सीतानाथ तत्त्वभूषण-कर्तृक 'कृष्ण और गीता' नामक एक अंग्रेजी ग्रंथभी इन दिनों प्रकाशित हुआ है और उसमें उक्त पंडितजीके गीतापर दिये हुए बारह व्याख्यान हैं। किंतु उक्त ग्रंथोंके पाठ करनेसे कोईभी जान लेगा, कि तत्त्वभूषणजीके अथवा मि. ब्रुक्सके प्रतिपादनमें और हमारे प्रतिपादनमें बहुत अंतर है। फिरभी इन लेखोंसे ज्ञात होता है, कि गीताविषयक हमारे विचार कुछ अपूर्व नहीं हैं; और इस सुचिन्हकाभी ज्ञान होता है, कि गीताके कर्मयोगकी ओर लोगोंका ध्यान अधिकाधिक आकर्षित हो रहा है, अतएव यहाँपर हम इन सब आधुनिक लेखकोंका अभिनंदन करते हैं। यह ग्रंथ मंडालेमें लिखा तो गया था, पर लिखा गया पेन्सिलसे; और काटछाँटके अतिरिक्त इसमें औरभी कितनेही नये सुधार किये गये थे। इसलिये इसके सरकारके यहाँसे लौट आनेपर प्रेसमें देनेकेलिये इसकी नकल शुद्ध करनेकी आवश्यकता हुई; और यदि यह काम हमारेही भरोसेपर छोड़ दिया जाता, तो इसके प्रकाशित होनेमें न जाने और कितना समय लग गया होता। परंतु श्रीयुत वामन गोपाल जोशी, नारायण कृष्ण गोगटे, रामकृष्ण दत्तात्रेय पराडकर, रामकृष्ण सदाशिव पिपुटकर, अप्पाजी विष्णु कुलकर्णी प्रभृति सज्जनोंने इस काममें बड़े उत्साहसे सहायता दी; एतदर्थ उनका उपकार मानना चाहिये। इसी प्रकार श्रीयुत कृष्णाजी प्रभाकर खाडिलकरने, और विशेषतया वेदशास्त्रसंपन्न दीक्षित काशीनाथ- शास्त्री लेलेने बंबईसे यहाँ आकर, ग्रंथकी हस्तलिखित प्रतिको पढ़नेका कष्ट उठाया, एवं अनेक उपयुक्त तथा मार्मिक सूचनाएँ दी, जिसके लिये हम उनके ऋणी हैं। फिरभी स्मरण रहे, कि इस ग्रंथमें प्रतिपादित मतोंकी जिम्मेदारी सर्वथा हमारीही है। इस प्रकार ग्रंथ छापनेयोग्य तो हो गया, परंतु युद्धके कारण काग़जकी कमी होनेवाली थी। इस कमीको बंबईके स्वदेशी काग़जके पुतलीघरके मालिक मेसर्स 'डी. पदमजी और सन'ने हमारी इच्छाके अनुसार अच्छा स्वदेशी काग़ज समयपर दे करके, दूर कर दिया। इससे गीता-ग्रंथको छापनेके लिये अच्छा स्वदेशी काग़ज मिल सका। किंतु ग्रंथ अनुमानसे अधिक बढ़ गया, इससे काग़ज़की फिर कमी हुई। इस कमीकी, पूनेके 'रे पेपर मिल' के मालिकोंने पूर्ति यदि दूर न कर दी होती, तो पाठकोंको और कुछ महीनोंतक ग्रंथके प्रकाशित होनेकी प्रतीक्षा करनी पड़ती। अतः उक्त दोनों पुतलीघरोंके मालिकोंको न केवल हमही, प्रत्युत पाठकभी धन्यवाद दें। अब अंतमें प्रूफ़-संशोधनका काम रह गया; जिसे श्रीयुत रामकृष्ण दत्तात्रेय पराडकर, रामकृष्ण सदाशिव पिपुटकर और हरि रघुनाथ भागवतने स्वीकार किया।

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लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक जन्म : २३ जुलाई १८५६ ] [ मृत्यु : १ अगस्त १९२०

उसमेंभी स्थान-स्थानपर अन्यान्य ग्रंथोंका जो उल्लेख हैं, उनको मूल ग्रंथोंसे ठीक ठीक जाँचने, एवं यदि कहीं कोई व्यंग रह गया हो, तो उसे दिखलानेका काम श्रीयुत हरि रघुनाथ भागवतने अकेलेही किया है। तात्पर्य यह है, कि बिना इन लोगोंकी सहायताके इस ग्रंथको हम इतनी शीघ्रतासे प्रकाशित न कर पाते। अतएव हम इन सबको हृदयसे धन्यवाद देते हैं। अब रही छपाई, चित्रशाला छापाखानेके स्वत्वाधिकारीने इस ग्रंथको सावधानीपूर्वक और शीघ्रतासे छाप देना स्वीकारकर तदनुसार इस कामको पूर्ण कर दिया; इस निमित्त अंतमें उनकाभी उपकार मानना आवश्यक है। खेतमें फसल हो जानेपरभी फसलसे अन्न तैयार करके भोजन करने- वालोंके मुंहमें पहुँचनेतक, जिस प्रकार अनेक लोगोंकी सहायता अपेक्षित रहती है, वैसीही कुछ अंशोंमें ग्रंथकारकी - कमसे कम हमारी तो स्थिति है। अतएव उक्त रीतिसे जिन लोगोंने हमारी सहायता की है, - फिर चाहे उनके नाम यहाँ आये हों अथवा नभी आये हों, - उन सबको फिर एक बार धन्यवाद देकर हम इस प्रस्तावनाको समाप्त करते हैं। प्रस्तावना समाप्त हो गई। अब जिस विषयके विचारमें आजतक बहुतेरे वर्ष बीत गये हैं और जिसके नित्य सहवास एवं चिंतनसे मनको समाधान होकर आनंद होता गया, वह विषय आज ग्रंथके रूपमें हमसे पृथक् होनेवाला है, इसलिये यद्यपि दुख होता है, तथापि ये विचार - सध गये तो व्याजसहित, अन्यथा कमसे कम ज्यों-के-त्यों - अगली पीढ़ीके लोगोंको देनेके लियेही हमें प्राप्त हुए थे; अतएव वैदिक धर्मके राजगुह्यके इस पारसको कठोपनिषद्के "उत्तिष्ठत! जाग्रत! प्राप्य वरान्निबोधत!" (कठ. ३. १४) - उठो! जागो! और (भगवानके दिये हुए) इस वरदानको समझ लो! इस मंत्रसे हम होनहार पाठकोंको प्रेमोदपूर्वक सौंपते हैं। इसीमें कर्म-अकर्मका सारा बीज है; और स्वयं भगवानकाही निश्चय- पूर्वक यह आश्वासन है, कि सृष्टिके इस नियमपर ध्यान देकर कि इस धर्मका स्वल्प आचरणभी बड़े-बड़े संकटोंसे बचाता है। इससे अधिक और क्या चाहिये! बिना किये कुछभी होता नहीं है; तुमको बस केवल "निष्काम बुद्धिसे कर्म करते रहना चाहिये" निरी स्वार्थपरायण-बुद्धिसे गृहस्ती चलाते चलाने जो लोग हारकर थक गये हों, उनका समय बितानेके लिये, अथवा संसारको छोड़ देनेकी तैयारीके लियेभी, गीता नहीं कही गई है, गीताशास्त्रकी प्रवृत्ति प्रत्युत इसलिये हुई है, कि वह और तात्त्विक दृष्टिसे इस बातका उपदेश करे, कि मोक्ष-दृष्टिसे संसारके कर्मही किस प्रकार किये जावें, संसारमें मनुष्यमात्रका सच्चा कर्तव्य क्या है, अतः अंतमें हमारी यही बिनती है, कि प्रत्येक मनुष्य पूर्व अवस्थामेंही - चढ़ती हुई उम्रमें ही - गृहस्थाश्रमके, अथवा, संसारके, इस प्राचीन शास्त्रको, जितनी जल्दी हो सके उतनी जल्दी समझे बिना न रहे। पूना, अधिक वैशाख बाळ गंगाधर टिळक संवत् १९७२ वि.

गीतारहस्यकी अनुक्रमणिका मुखपृष्ठ . . . . . . . . . . . . . . . १ समर्पण . . . . . . . . . . . . . . . ३ गीतारहस्यके भिन्न भिन्न संस्करण . . . . . . . . . ४-५ दो महापुरुषोंके अभिप्राय . . . . . . . . . . . . ६-७ प्रकाशकोंका निवेदन . . . . . . . . . . . . . . . ८-११ अनुवादककी भूमिका . . . . . . . . . . . . . . . १२-१४ प्रस्तावना . . . . . . . . . . . . . . . १५-२५ गीतारहस्यकी अनुक्रमणिका . . . . . . . . . . . . २६ गीतारहस्यके प्रत्येक प्रकरणके विषयोंकी अनुक्रमणिका . . . २७-३६ गीतारहस्यके संक्षिप्त चिन्होंका ब्योरा, इत्यादि . . . . . . ३७-३९ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र . . . . . . . . . १-५०९ गीताकी बहिरंगपरीक्षा . . . . . . . . . . . . ५१०-५९५ गीताके अनुवादका उपोद्घात । . . . . . . . . . ५९६-६०० गीताके अध्यायोंकी श्लोकशः विषयानुक्रमणिका . . . . . . ६०१-६०८ श्रीमद्भगवद्गीता – मूल श्लोक, अनुवाद और टिप्पणियां . . . ६०९-८७७ गीताके श्लोकोंकी सूचि . . . . . . . . . . . . ८७८-८८८ ग्रंथों-ग्रंथकारों, व्यक्तिनिर्देशों तथा व्याख्याओंकी सूचि . . . . . . ८८९-९०६ हिंदुधर्मग्रंथोंका संक्षिप्त परिचय . . . . . . . . . . . . ९०७-९०८