भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

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१८ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र मीमांसा, सांख्य, कर्मविपाक अथवा भक्ति प्रभृति शास्त्रोंके जिन अनेक वादों अथवा प्रमेयोंके आधारपर गीतामें कर्मयोगका प्रतिपादन किया गया है, और जिनका उल्लेख कभी कभी बहुतही संक्षिप्त रीतिसे पाया जाता है, उन शास्त्रीय सिद्धान्तोंका पहलेसेही ज्ञान हुए बिना गीताके विवेचनका पूर्ण रहस्य सहसा ध्यानमें नहीं जमता । इसीलिये गीतामें जो जो विषय अथवा सिद्धान्त आये हैं, उनके शास्त्रीय रीतिसे प्रकरणोंमें विभाग करके उनकी प्रमुख प्रमुख युक्तियोंसहित गीतारहस्यमें उनका पहले संक्षेपमे निरूपण किया गया है; और फिर उसीमें वर्तमान युगकी आलोचना- त्मक पद्धतिके अनुसार गीताके प्रमुख सिद्धान्तोंकी तुलना अन्यान्य धर्मोंके और तत्त्वज्ञानोंके साथ प्रसंगानुसार संक्षेपमें कर दिखलाई गई है। इस रीतिसे इस पुस्तकके पूर्वार्धमें जो गीतारहस्य नामक निबंध है, वह कर्मयोगविषयक एक छोटासा किंतु स्वतंत्र ग्रंथही कहा जा सकता है । जो हो; इस प्रकारके सामान्य निरूपणमें गीताके प्रत्येक श्लोकका पूर्ण विचार हो नहीं सकता था । अतएव अंतमें गीताके प्रत्येक श्लोकका अनुवाद दे दिया है; और उसीके साथ स्थान-स्थानपर यथेष्ट टिप्पणियाँभी इसलिये जोड़ दीं गई हैं, कि जिसमें पूर्वापर संदर्भ पाठकोंकी समझमें भली भाँति आ जाय, अथवा पुराने टीकाकारोंने अपने संप्रदायकी सिद्धिके लिये गीताके कुछ श्लोकोंकी जो खींचातानी की है, उसे पाठक समझ जायें ( गीता ३.१७-१९; ६. ३; १८. २ ); या वे सिद्धान्त सहजही ज्ञात हो जाय कि जो गीतारहस्यमें बतलाये गये हैं, और यहभी ज्ञात हो जाय, कि उनमेंसे कौनकौनसे सिद्धान्त गीताकी संवादात्मक प्रणालीके अनुसार कहाँ कहाँ किस प्रकार आये हैं ? इसमें संदेह नहीं, कि ऐसा करनेसे कुछ विचारोंकी द्विरुक्ति अवश्य हो गई है; परंतु गीतारहस्यका विवेचन गीताके अनुवादसे इसलिये पृथक् रखना पड़ा है, कि गीता-ग्रंथके तात्पर्यके विषयमें साधारण पाठकोंमें जो भ्रम फैल गया है, वह भ्रम अन्य रीतिसे पूर्णतया दूर नहीं हो सकता था; और इस पद्धतिसे पूर्व इतिहास और आधारसहित यह दिखलानेमें सुविधा हो गई है, कि वेदान्त, मीमांसा और भक्ति प्रभृतिविषयक गीताके सिद्धान्त भारत, सांख्यशास्त्र, वेदान्त-सूत्र, उपनिषद् और मीमांसा आदि मूल ग्रंथोंसे कैसे और कहाँ आये हैं ? इससे यहभी स्पष्टतया बतलाना सुगम हो गया है, कि संन्यास-मार्ग और कर्मयोग-मार्गमें क्या भेद हैं, तथा अन्यान्य धर्ममतों और तत्त्वज्ञानोंके साथ गीताकी तुलना करके व्यावहारिक कर्म-दृष्टिसे गीताके महत्त्वका योग्य निरूपण करना सरल हो गया है। यदि गीतापर अनेक प्रकारकी टीकाएँ न लिखी गई होतीं और अनेकोंने अनेक प्रकारसे गीताके तात्पर्या- र्थोंका प्रतिपादन न किया होता, तो हमें अपने ग्रंथके सिद्धान्तके लिये पोषक और आधारभूत मूल संस्कृत वचनोंके अवतरण स्थान-स्थानपर देनेकी कोई आवश्यकताही न थी । किंतु वर्तमान समय दूसरा है; और लोगोंके मनमें यह शंका हो सकती थी, कि हमने जो गीतार्थ अथवा सिद्धान्त बतलाया है, वह ठीक है या नहीं ? इसीलिये