भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

पृष्ठ 22, कुल 956 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 22

प्रस्तावना १९ हमने सर्वत्र स्थलनिर्देश कर बतला दिया है, कि हमारे कथनके लिये प्रमाण क्या है, और मुख्य मुख्य स्थानोंपर तो मूल संस्कृत वचनोंकोही अनुवादसहित उद्धृत कर दिया है। इसके व्यतिरिक्त इन संस्कृत वचनोंको उद्धृत करनेका औरभी एक प्रयोजन है, वह यह, कि इनमेंसे अनेक वचन साधारण तथा वेदान्त-ग्रंथोंसे प्रमाणार्थ लिये जाते हैं; अतः पाठकोंको यहाँ उनका सहजही ज्ञान हो जायगा और उन सिद्धान्तोंको भली भांति समझभी सकेंगे। किंतु यह कब संभव है, कि वे सभी पाठक संस्कृतज्ञ हों ? इसलिये समस्त ग्रंथकी रचना इस ढंगसे की गई है, कि यदि संस्कृत न जाननेवाले पाठक संस्कृत श्लोकोंको छोड़कर केवल ग्रंथही पढ़ते चले जायें, तोभी अर्थमें कहीं भी गडबड न हो। इस कारण संस्कृत श्लोकोंका शब्दशः अनुवाद न लिखकर अनेक स्थलोंपर उनका केवल सारांश देकरही निर्वाह कर लेना पड़ा है। परंतु मूल श्लोक सदैव ऊपर रखा गया है। इसलिये इस प्रणालीसे भ्रम होनेकी कुछभी आशंका नहीं है। कहा जाता है, कि कोहनूर हीरा जब भारतवर्षसे विलायत पहुँचाया गया, तब वहाँ फिर उसके नये पहलू बनानेपर वह औरभी तेजस्वी हो गया। हीरेके लिये उप- युक्त होनेवाला यह न्याय सत्यरूपी रत्नोंके लियेभी प्रयुक्त हो सकता है। गीतामें प्रतिपादित धर्म, सत्य और अभय है सही; परंतु वह जिस समय और जिस स्वरूपमें बतलाया गया था, उस देश-काल आदि परिस्थितिमें अब बहुत अंतर हो गया है; इस कारण अब उसका तेज पहलेकी भाँति कितनोंहीकी दृष्टिमें नहीं समाता है। किसी कर्मको भला-बुरा माननेके पहले, जिस समय यह सामान्य प्रश्नही महत्त्वका समझा जाता था, कि “ कर्म करना चाहिये अथवा न करना चाहिये ”, उस समय गीता बतलाई गई है, इस कारण उसका बहुत-सा अंश अब कुछ लोगोंको अना- वश्यक प्रतीत होता है; और, उसपरभी निवृत्ति-मार्गीय टीकाकारोंकी लीपा-पोतीने तो गीताके कर्मयोगके विवेचनको आजकल बहुतेरोंके लिये दुर्बोध कर डाला है। इसके अतिरिक्त कुछ नये विद्वानोंकी यह समझ हो गई है, कि अर्वाचीन कालमें आधिभौतिक ज्ञानकी पश्चिमी देशोंमें जो बाढ़ हुई है, उस बाढ़के कारण अध्यात्म शास्त्रके आधारपर किये गये कर्मयोगके प्राचीन विवेचन वर्तमान-कालके लिये पूर्णतया उपयुक्त नहीं हो सकते; किंतु यह समझ ठीक नहीं। इस समझकी पोल खोलनेके लिये गीतारहस्यके विवेचनमें गीताके सिद्धान्तोंकी जोड़केही पश्चिमी पंडितोंके सिद्धान्तभी हमने स्थान-स्थानपर संक्षेपमें दिये हैं। वस्तुतः गीताका धर्म- अधर्म विवेचन इस तुलनासे कुछ अधिक सुदृढ नहीं हो जाता; तथापि अर्वाचीन कालकी आधिभौतिक शास्त्रोंकी अश्रुतपूर्व-वृद्धिसे जिनकी दृष्टिमें चकाचौंध लग गई है, अथवा जिन्हें आजकलकी एकदेशीय शिक्षापद्धतिके कारण आधिभौतिक अर्थात् बाह्य-दृष्टिसेही नीतिशास्त्रका विचार करनेकी आदत पड़ गई है, उन्हें इस तुलनासे इतना तो स्पष्ट ज्ञान हो जायगा, कि मोक्ष-धर्म और नीति, ये दोनों विषय