श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२० गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र आधिभौतिक ज्ञानके परे है; और वे यहभी जान जाएँगे, कि इसीसे प्राचीन-कालमें हमारे शास्त्रकारोंने इस विषयमें जो सिद्धान्त स्थिर किये हैं, उनके आगे मानवी ज्ञानकी गति अबतक नहीं पहुँच पाई है; यही नहीं, किंतु पश्चिमी देशोंमेंभी अध्यात्म-दृष्टिसे इन प्रश्नोंका विचार अभीतक हो रहा है, और इन आध्यात्मिक ग्रंथकारोंके विचार गीताशास्त्रके सिद्धान्तोंसे कुछ अधिक भिन्न नहीं हैं। गीता- रहस्यके भिन्न भिन्न प्रकरणोंमें जो तुलनात्मक विवेचन है, उससे यह बात स्पष्ट हो जायगी। परंतु यह विषय अत्यंत व्यापक है, इस कारण पश्चिमी पंडितोंके मतोंका जो सारांश विभिन्न स्थलोंपर हमने दे दिया है, उसके संबंधमें यहाँ इतना बतला देना आवश्यक है, कि गीतार्थको प्रतिपादन करनाही हमारा मुख्य काम है, अतएव गीताके सिद्धान्तोंको प्रमाण मानकर पश्चिमी मतोंका अनुवाद हमने केवल यही दिखलानेके लिये किया है कि इन सिद्धान्तोंसे पश्चिमी नीतिशास्त्रज्ञों अथवा पंडितोंके सिद्धान्तोंका यहाँ तक मेल है; और यह काम हमने इस ढंगसे किया है, कि जिससे सामान्य पाठकोंको उनका अर्थ समझनेमें कोई कठिनाई न हो। अब यह निर्विवाद है, कि इन दोनोंके बीच जो सूक्ष्म भेद हैं-और वे हैं भी बहुतही, अथवा इन सिद्धान्तोंके जो पूर्ण उपपादन या विस्तार हैं, उन्हें जाननेके लिये मूल पश्चिमी ग्रंथही देखने चाहिये। पश्चिमी विद्वान् कहते हैं, कि कर्म-अकर्मविवेक अथवा नीतिशास्त्रपर पहला नियमबद्ध ग्रंथ यूनानी तत्त्ववेत्ता अरिस्टाटलने लिखा है। परंतु हमारा मत है, कि अरिस्टाटलसेभी पहले, उनकी अपेक्षा अधिक व्यापक और तात्त्विक-दृष्टिसे, इन प्रश्नोंका विचार महाभारत एवं गीतामें हो चुका था, तथा अध्यात्म-दृष्टिसे गीतामें जिस नीतितत्त्वका प्रतिपादन किया गया है, उससे भिन्न कोई और नीतितत्त्व अबतक नहीं निकला है। "संन्यासियोंके समान रहकर तत्त्वज्ञानके विचारमें शांतिसे आयु बिताना अच्छा है, अथवा अनेक प्रकारकी राजकीय उथल-पुथल करना भला है"-इस विषयका जो स्पष्टीकरण अरिस्टाटलने किया है, वह गीतामें है; और साक्रेटीज़के इस मतकाभी गीतामें एक प्रकारसे समा- वेश हो गया है, कि "मनुष्य जो कुछ पाप करता है, वह अज्ञानसेही करता है।" क्योंकि गीताका तो यही सिद्धान्त है, कि ब्रह्मज्ञानसे बुद्धिकेसम हो जानेपर, फिर मनुष्यसे कोईभी पाप हो नहीं सकता। एपिक्यूरियन और स्टोइक पंथोंके यूनानी पंडितोंका यह कथनभी गीताको ग्राह्य है, कि पूर्ण अवस्थामें पहुँचे हुए परम ज्ञानी पुरुषका व्यवहारही नीति-दृष्टिसे सबके लिये आदर्शके समान प्रमाण है; और इन पंथवालोंने परम ज्ञानी पुरुषका जो वर्णन किया है, वह गीताके स्थितप्रज्ञके वर्णनके समानही है। इसी प्रकार मिल, स्पेन्सर, और कांट प्रभृति आधिभौतिकवादियोंका यह जो कथन है, कि नीतिकी पराकाष्ठा अथवा कसौटी यही है, कि प्रत्येक मनुष्यको सारी मानव-जातिके हितार्थ उद्योग करना चाहिये, उसकाभी गीतामें वर्णित स्थित- प्रज्ञके 'सर्वभूतहिते रतः' इस बाह्य लक्षणमें समावेश हो गया है, एवं, कांट और