भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

पृष्ठ 24, कुल 956 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 24

प्रस्तावना २१ ग्रीनका, नीतिशास्त्रकी उपपत्तिविषयक तथा इच्छास्वातंत्र्यसंबंधी सिद्धान्तभी उपनिषदोंके ज्ञानके आधारपर गीतामें आ गया है। इसकी अपेक्षा यदि गीतामें और कुछ अधिकता न होती, तोभी वह सर्वमान्य हो गयी होती। परंतु गीता इतनेहीसे संतुष्ट नहीं हुई, प्रत्युत उसने यह दिखलाया है, कि मोक्ष, भक्ति और नीति-धर्मके बीच आधिभौतिक ग्रंथकारोंको जिस विरोधका आभास होता है, वह विरोध सच्चा नहीं है, अथवा ज्ञान और कर्ममें संन्यास-मार्गियोंके मतसे समझमें जो विरोध है, वहभी ठीक नहीं है, और ब्रह्मविद्याका और भक्तिका जो मूलतत्त्व है, वही नीतिका और सत्कर्मकाभी आधार है; एवं इस बातकाभी निर्णय कर दिया है, कि ज्ञान, संन्यास, कर्म और भक्तिके समुचित मेलसे, इस लोगमें आयु बितानेके किस मार्गको मनुष्य स्वीकार करे ? इस प्रकार गीता-ग्रंथ प्रधानतासे कर्मयोगका है, और इसीलिये, "ब्रह्मविद्यान्तर्गत (कर्म-)योगशास्त्र" इस नामसे समस्त वैदिक ग्रंथोंमें उसे अग्रस्थान प्राप्त हो गया है। गीताके विषयमें जो कहा जाता है, कि "गीता सुगीता कर्तव्या किमन्यैः शास्त्रविस्तरैः" - अकेली गीताकाही पूरा पूरा अध्ययन कर लेना बस है; शेष शास्त्रोंके योयो विस्तारसे क्या करना है, यह वह झूठ नहीं है, अतएव जिन लोगोंको हिंदु धर्म और नीतिशास्त्रके मूल तत्त्वोंसे परिचय कर लेना हो, उन लोगोंसे हम सविनय किंतु आग्रहपूर्वक कहते हैं, कि सबसे पहले आप इस अपूर्व ग्रंथका अध्ययन कीजिये। इसका कारण यह है, कि क्षर-अक्षर- सृष्टिका और क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ-ज्ञानका विचार करनेवाले सांख्य, न्याय, मीमांसा, उप- निषद् और वेदान्त आदि प्राचीन शास्त्र उस समय, जितने हो सकते थे उतने, पूर्ण अवस्थामें आ चुके थे; और उसके बादही वैदिक धर्मको जो ज्ञानमूलक, भक्ति-प्रधान एवं कर्मयोग-प्रधान अंतिम स्वरूप प्राप्त हुआ, तथा वर्तमान-कालमें प्रचलित वैदिक धर्मका जो मूल है, वही गीतामें प्रतिपादित होनेके कारण हम कह सकते हैं, कि संक्षेपमे किंतु निस्संदिग्ध रीतिसे वर्तमानकालीन हिंदु धर्मके तत्त्वोंको समझा देनेवाला, गीताकी जोड़का दूसरा ग्रंथही संस्कृत साहित्यमें नहीं है। उल्लिखित वक्तव्यसे पाठक सामान्यतः समझ होये होंगे, कि गीतारहस्यके विवेचनका ढंग कैसा है। गीतापर जो शांकरभाष्य है, उसके तीसरे अध्यायके आरंभके पुरातन टीकाकारोंके अभिप्रायोंके उल्लेखमे ज्ञात होता है, कि गीतापर पहले कर्मयोग-प्रधान टीकाएँ रही होंगी। किंतु इस समय ये टीकाएं उपलब्ध नहीं हैं; अतएव यह कहनेमें कोई क्षति नहीं, कि गीताका यह कर्मयोग-प्रधान और तुलनात्मक पहलाही विवेचन है। इसमें कुछ श्लोकोंके अर्थ उन अर्थोंसे भिन्न हैं, कि जो आजकलकी टीकाओंमें पाये जाते हैं, एवं ऐसे अनेक विषयभी बतलाये गये हैं, कि जो अबतककी प्राकृत टीकाओंमें विस्तारसहित कहींभी वर्णित नहीं थे। इन विषयोंको और उनकी उपपत्तियोंको यद्यपि हमने संक्षेपमेंही बतलाया है, तथापि यथाशक्य सुस्पष्ट और सुबोध रीतिसे बतलानेके उद्योगमें हमने कोई बात