श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२२ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र उठा नहीं रखी है; और ऐसा करनेमें यद्यपि कहीं कहीं द्विरुक्ति हो गई है, तोभी हमने उसकी कोई परवाह नहीं की; और जिन शब्दोंके अर्थ अबतक भाषामें प्रचलित नहीं हो पाये हैं उनके पर्याय शब्द उनके साथ-ही-साथ अनेक स्थलोंपर दे दिये हैं; इसके अतिरिक्त इस विषयके प्रमुख सिद्धान्त सारांशरूपसे स्थान-स्थानपर, उपपादनसे पृथककर दिखला दिये गये हैं। फिरभी शास्त्रीय और गहन विषयोंका थोड़े शब्दोंमें विचार करना सदैव कठिन है, और इन विषयोंकी हिंदी परि- भाषाभी अभी स्थिर नहीं हो पाई है; अतः हम जानते हैं, कि भ्रमसे, दृष्टिदोषसे, अथवा अन्यान्य कारणोंसे, हमारे इस नये ढंगके विवेचनमें कठिनाई, दुर्बोधता, अपूर्णता अथवा अन्य दोषभी रह गये होंगे। परंतु भगवद्गीता पाठकोंसे अपरिचितभी नहीं है। ऐसे बहुतेरे लोग हैं, जो नित्य नियमसे भगवद्गीताका पाठ किया करते हैं; और ऐसे लोगभी थोड़े नहीं हैं, कि इसका जो शास्त्रीय दृष्टिसे अध्ययन कर चुके हैं या कर रहे हैं। अतः ऐसे अधिकारी पुरुषोंसे हमारी एक प्रार्थना है, कि जब उनके हाथमें यह ग्रंथ पहुँचे, और यदि उन्हें इसमें उक्त प्रकारके कुछ दोष मिल जाएँ, तो वे कृपा कर हमें उनकी सूचना दे दें; जिससे हम उनका विचार करेंगे, और यदि इस ग्रंथके द्वितीय संस्करणके प्रकाशित करनेका अवसर आयेगा, तो इसमें यथा- योग्य संशोधन कर दिया जावेगा। संभव है, कुछ लोग समझें, कि हमारा कोई विशेष संप्रदाय है और उसी संप्रदायकी सिद्धिके लिये हम गीताका एक विशेष प्रकारका अर्थ कर रहे हैं। इसलिये यहाँ इतना कह देना आवश्यक है, कि यह गीतारहस्य ग्रंथ किसीभी व्यक्तिविशेष अथवा संप्रदायके उद्देश्यसे लिखा नहीं गया है। हमारी बुद्धिके अनुसार गीताके मूल संस्कृत श्लोकका जो सरल अर्थ होता है, वही हमने लिखा है। ऐसा सरल अर्थ कर देनेसे, — और आजकल संस्कृतका बहुत-कुछ प्रचार हो जानेसे बहुतेरे लोग समझ सकेंगे, कि अर्थ सरल है या नहीं, — यदि इसमें कुछ सांप्रदायिकता आ जावे, तो वह गीताकी है, हमारी नहीं। अर्जुनने भगवानसे स्पष्टही कहा था., कि “मुझे दो-चार मार्ग बतलाकर उलझनमें न डालिये, निश्चयपूर्वक ऐसा एकही मार्ग बतलाइये, कि जो श्रेयस्कर हो” (गीता ३. २; ५. १) इससे प्रकटही है, कि गीतामें किसी-न-किसी एकही विशेष मतका प्रति- पादन होना चाहिये (गीता ३. ३१); और मूल गीताकाही अर्थ करके निराग्रह- बुद्धिसे हमें देखना है, कि वह विशेष मत कौन-सा है; और हमें पहलेहीसे कोई मत स्थिर करके, गीताके अर्थकी इसलिये खींचातानी नहीं करनी है, कि उस पहलेसेही निश्चित किये हुए मतसे गीताका मेल नहीं मिलता। सारांश, गीताके वास्तविक रहस्यका, — फिर चाहे वह रहस्य किसीभी संप्रदायका अथवा पंथका हो — गीता- भक्तोंमें प्रसार करके, भगवानकेही अंतिम कथनानुसार यह ज्ञान-यज्ञ करनेके लिये हम प्रवृत्त हुए हैं; और हमें आशा है, कि इस ज्ञान-यज्ञकी अव्यंगताकी सिद्धिके लिये, ऊपर जो ज्ञानभिक्षा मांगी गई है, उसे हमारे देशबंधु और धर्मबंधु बड़े आनंदसे दे देंगे।