भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

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पृष्ठ 26

प्रस्तावना २३

प्राचीन टीकाकारोंके प्रतिपादित गीता-तात्पर्यके और हमारे मतानुसार गीताके रहस्यमें भेद क्यों पड़ता है, उसके कारण गीतारहस्यमें विस्तारपूर्वक बतलाये बन गये हैं। परंतु यहाँ यह बतला देना आवश्यक है, कि गीताके तात्पर्यके संबंधमें यद्यपि इस प्रकार मतभेद हो, तोभी गीतापर जो अनेक भाष्य और टीकाएँ हैं, अथवा पहले या वर्तमान समयमें गीताके जो भाषानुवाद हुए हैं, उनसे हमें यह ग्रंथ लिखते समय अन्यान्य बातोंमें सदैवही प्रसंगानुसार थोड़ी-बहुत सहायता मिली है; एतदर्थ हम उन सबके अत्यंत ऋणी हैं। इसी प्रकार उन पश्चिमी पंडितोंकाभी उपकार मानना चाहिये, कि जिनके ग्रंथोंके सिद्धान्तोंका हमने स्थान-स्थानपर उल्लेख किया है। और तो क्या ! यदि इन सब ग्रंथोंकी सहायता न मिली होती, तो संदेहही है, कि यह ग्रंथ लिखा जाता या नहीं। इसीसे हमने प्रस्तावनाके आरंभमेंही साधु तुकारामका यह वाक्य लिख दिया हैं - “संतोंकी उच्छिष्ट उक्ति है मेरी बानी।” सदा सर्वदा एकसाही उपयोगी होनेवाला अर्थात् त्रिकाल- अबाधित जो ज्ञान है, उसका निरूपण करनेवाले गीता जैसे ग्रंथसे कालभेदके अनुसार मनुष्यको नवीन नवीन स्फूर्ति प्राप्त हो, तो उसमें कोई आश्चर्य नहीं है; क्योंकि ऐसे व्यापक ग्रंथका तो यह धर्मही रहता है। परंतु इतनेहीसे प्राचीन पंडितोंके वे परिश्रम व्यर्थ नहीं हो जाते, कि जो उन्होंने इन ग्रंथोंकेलिये किये हैं। पश्चिमी पंडितोंने गीताके जो अनुवाद अंग्रेजी और जर्मन प्रभृति यूरोपकी भाषाओंमें किये हैं, उनके लियेभी यही न्याय उपयुक्त होता है। ये अनुवाद प्रायः गीताकारोंके प्राचीन टीकाके आधारसे किये जाते हैं। फिरभी कुछ पश्चिमी पंडितोंने स्वतंत्र रीतिसे गीताके अर्थ करनेका उद्योग आरंभ कर दिया है। परंतु सच्चे (कर्म-) योगका तत्त्व अथवा वैदिक-धार्मिक संप्रदायोंका इतिहास भली भाँति समझ न सकनेके कारण, या बहिरंग परीक्षासेही उनकी विशेष रुचिके कारण, अथवा ऐसेही और कुछ कारणोंसे पश्चिमी पंडितोके ये विवेचन अधिकतर अपूर्ण और कुछ कुछ स्थानोंमें तो सर्वथा भ्रामक और गलत हैं। यहाँपर पश्चिमी पंडितोंके गीताविषयक ग्रंथोंका विस्तृत विचार करने अथवा उनकी जाँच करनेकी कोई आवश्यकता नहीं है। उन्होंने जो प्रमुख प्रश्न उपस्थित किये हैं, उनके संबंधमें हमारा जो वक्तव्य है, वह इस ग्रंथके परिशिष्ट-प्रकरणमें दिया गया है। किंतु यहाँ गीताविषयक उन अंग्रेजी लेखोंका उल्लेख कर देना उचित प्रतीत होता है, कि जो इन दिनों हमारे देखनेमें आये हैं। पहला लेख मि. बुक्सका है; मि. बुक्स थिऑस- फिस्ट पंथके हैं, उन्होंने अपने गीताविषयक ग्रंथमें सिद्ध किया है, कि भगवद्गीता कर्मयोग-प्रधान है; और वे अपने व्याख्यानोंमेंभी इसी मतका प्रतिपादन किया करते हैं। दूसरा लेख मद्रासके मि. एस. राधाकृष्णन्‌का है, और वह छोटे निबंधके रूपमें अमरीकाके “सार्वराष्ट्रीय नीतिशास्त्रसंबंधी त्रैमासिक”में प्रकाशित हुआ है (जुलाई १९११)। इसमें आत्मस्वातंत्र्य और नीति-धर्म, इन दो विषयोंके