भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

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पृष्ठ 27

२४ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र

संबंधमें गीता और कांटकी समता दिखलाई गई है। हमारे मतसे यह साम्य इससेभी कहीं अधिक व्यापक है, और कांटकी अपेक्षा ग्रीनकी नैतिक उपपत्ति गीतासे कहीं अधिक मिलती-जुलती है। परंतु इन दोनों प्रश्नोंका स्पष्टीकरण इस ग्रंथमें किया ही गया है, अतः यहां उसको दुहरानेकी आवश्यकता नहीं है। इसी प्रकार पंडित सीतानाथ तत्त्वभूषण-कर्तृक 'कृष्ण और गीता' नामक एक अंग्रेजी ग्रंथभी इन दिनों प्रकाशित हुआ है और उसमें उक्त पंडितजीके गीतापर दिये हुए बारह व्याख्यान हैं। किंतु उक्त ग्रंथोंके पाठ करनेसे कोईभी जान लेगा, कि तत्त्वभूषणजीके अथवा मि. ब्रुक्सके प्रतिपादनमें और हमारे प्रतिपादनमें बहुत अंतर है। फिरभी इन लेखोंसे ज्ञात होता है, कि गीताविषयक हमारे विचार कुछ अपूर्व नहीं हैं; और इस सुचिन्हकाभी ज्ञान होता है, कि गीताके कर्मयोगकी ओर लोगोंका ध्यान अधिकाधिक आकर्षित हो रहा है, अतएव यहाँपर हम इन सब आधुनिक लेखकोंका अभिनंदन करते हैं। यह ग्रंथ मंडालेमें लिखा तो गया था, पर लिखा गया पेन्सिलसे; और काटछाँटके अतिरिक्त इसमें औरभी कितनेही नये सुधार किये गये थे। इसलिये इसके सरकारके यहाँसे लौट आनेपर प्रेसमें देनेकेलिये इसकी नकल शुद्ध करनेकी आवश्यकता हुई; और यदि यह काम हमारेही भरोसेपर छोड़ दिया जाता, तो इसके प्रकाशित होनेमें न जाने और कितना समय लग गया होता। परंतु श्रीयुत वामन गोपाल जोशी, नारायण कृष्ण गोगटे, रामकृष्ण दत्तात्रेय पराडकर, रामकृष्ण सदाशिव पिपुटकर, अप्पाजी विष्णु कुलकर्णी प्रभृति सज्जनोंने इस काममें बड़े उत्साहसे सहायता दी; एतदर्थ उनका उपकार मानना चाहिये। इसी प्रकार श्रीयुत कृष्णाजी प्रभाकर खाडिलकरने, और विशेषतया वेदशास्त्रसंपन्न दीक्षित काशीनाथ- शास्त्री लेलेने बंबईसे यहाँ आकर, ग्रंथकी हस्तलिखित प्रतिको पढ़नेका कष्ट उठाया, एवं अनेक उपयुक्त तथा मार्मिक सूचनाएँ दी, जिसके लिये हम उनके ऋणी हैं। फिरभी स्मरण रहे, कि इस ग्रंथमें प्रतिपादित मतोंकी जिम्मेदारी सर्वथा हमारीही है। इस प्रकार ग्रंथ छापनेयोग्य तो हो गया, परंतु युद्धके कारण काग़जकी कमी होनेवाली थी। इस कमीको बंबईके स्वदेशी काग़जके पुतलीघरके मालिक मेसर्स 'डी. पदमजी और सन'ने हमारी इच्छाके अनुसार अच्छा स्वदेशी काग़ज समयपर दे करके, दूर कर दिया। इससे गीता-ग्रंथको छापनेके लिये अच्छा स्वदेशी काग़ज मिल सका। किंतु ग्रंथ अनुमानसे अधिक बढ़ गया, इससे काग़ज़की फिर कमी हुई। इस कमीकी, पूनेके 'रे पेपर मिल' के मालिकोंने पूर्ति यदि दूर न कर दी होती, तो पाठकोंको और कुछ महीनोंतक ग्रंथके प्रकाशित होनेकी प्रतीक्षा करनी पड़ती। अतः उक्त दोनों पुतलीघरोंके मालिकोंको न केवल हमही, प्रत्युत पाठकभी धन्यवाद दें। अब अंतमें प्रूफ़-संशोधनका काम रह गया; जिसे श्रीयुत रामकृष्ण दत्तात्रेय पराडकर, रामकृष्ण सदाशिव पिपुटकर और हरि रघुनाथ भागवतने स्वीकार किया।