भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

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पृष्ठ 20

प्रस्तावना १७ जा सकता, कि यह ग्रंथ सर्वांशमें पूर्ण हो गया। क्योंकि मोक्ष और नीति-धर्मके तत्त्व गहन तो हैंही; साथही उनके संबंधमें अनेक प्राचीन और अर्वाचीन पंडितोंने इतना विस्तृत विवेचन किया है, कि व्यर्थ फैलावसे बचकर यह निर्णय करना कई बार कठिन हो जाता है, कि उसमेंसे इस छोटे-से ग्रंथमें किन किन बातोंका समावेश किया जावे ? परंतु अब हमारी स्थिति महाराष्ट्रके कविकी इस उक्तिके अनुसार हो गई है:- यम-सेना की विमल ध्वजा अब 'जरा' दृष्टिमें आती है। करती हुई युद्ध रोगोंसे देह हारती जाती है ॥* और हमारे सांसारिक साथीभी पहलेही चल बसे हैं। अतएव अब इस ग्रंथको यह समझकर प्रसिद्ध कर दिया है, कि हमें जो बातें मालूम हो गई है और जिन विचारोंको हमने सोचा है, वे सब लोगोंकोभी ज्ञात हों जाएँ; फिर कोई-न-कोई 'समानधर्मा' अभी या आगे उत्पन्न होकर उन्हें पूर्ण करही लेगा। आरंभमेंही यह कह देना आवश्यक है, कि यद्यपि हमें यह मत मान्य नहीं है, कि सांसारिक कर्मोंको गौण अथवा त्याज्य मानकर, ब्रह्मज्ञान और भक्ति प्रभृति निरे निवृत्ति-प्रधान मोक्ष-मार्गकाही निरूपण गीतामें है; तथापि हम यहभी नहीं कहते, कि मोक्ष-प्राप्ति-मार्गका विवेचन भगवद्गीतामें बिलकुलही नहीं है। हमनेभी इस ग्रंथमें स्पष्ट दिखला दिया है, कि गीताशास्त्रके अनुसार इस जगत्में प्रत्येक मनुष्यका पहला कर्तव्य यही है, कि वह परमेश्वरके शुद्ध स्वरूपका ज्ञान प्राप्त करके उसके द्वारा अपनी बुद्धिको, जितनी हो सके उतनी, निर्मल और पवित्र कर ले, परंतु यह गीताका मुख्य विषय नहीं है। युद्धके आरंभमें अर्जुन इस कर्तव्य- मोहमें फँसा था, कि, कि युद्ध करना क्षत्रियका धर्म भलेही हो, परंतु विपरीत पक्षमें कुलक्षय आदि घोर पातक होनेसे जो युद्ध मोक्ष-प्राप्तिरूप आत्म-कल्याणका नाशकर डालेगा, उस युद्धको करना चाहिये अथवा नहीं। अतएव हमारा यह अभिप्राय है, कि उस मोहको दूर करनेके लिये शुद्ध वेदान्तशास्त्रके आधारपर कर्म-अकर्मका और साथही साथ मोक्षके उपायोंकाभी पूर्ण विवेचन कर, इस प्रकार निश्चय किया गया है, कि एक तो कर्म कभी छूटतेही नहीं है; और दूसरे, उनको छोड़नाभी नहीं चाहिये; एवं गीतामें उस युक्तिका, अर्थात् ज्ञानमूलक और भक्ति-प्रधान- कर्मयोगकाही प्रतिपादन किया गया है, कि जिससे कर्म करनेपर कोईभी पाप नहीं लगता तथा अंतमें उसीसे मोक्षभी मिल जाता है। कर्म-अकर्मके या धर्म-अधर्मके इस विवेचनकोही वर्तमानकालीन निरे आधिभौतिक पंडित नीतिशास्त्र कहते हैं। सामान्य पद्धतिके अनुसार गीताके श्लोकोंके क्रमसे टीका लिखकरभी यह दिखलाया जा सकता था, कि यह विवेचन गीतामें किस प्रकार किया गया है; परंतु वेदान्त,

  • महाराष्ट्र-कविवर्य मोरोपंतकी 'केका'का भाव। गी. र. २ *