श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१६ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र भारत, वेदान्तसूत्र, उपनिषद् और वेदान्तशास्त्रविषयक अन्यान्य संस्कृत तथा अंग्रेजी भाषाके ग्रंथोंके अध्ययनसेभी वही मत दृढ़ होता गया; और चार-पाँच स्थानोंपर इसी विषयपर व्याख्यान इस इच्छासे दिये, कि सर्वसाधारणमें उस विषयके संबंधमें उक्त मत प्रकट कर देनेसे, अधिक चर्चा होगी, एवं सत्य तत्त्वका निर्णय करनेमें औरभी सुविधा हो जायगी । इनमेंसे पहला व्याख्यान नागपुरमें जनवरी सन् १९०२ में हुआ और दूसरा सन् १९०४ ईसवीके अगस्त महीनेमें करवीर एवं संकेश्वर मठके जगद्गुरु श्रीशंकराचार्यकी उपस्थितिमें उन्हींकी आज्ञासे, संकेश्वर मठमें हुआ था, और उस समय नागपुरवाले व्याख्यानका विवरणभी समाचारपत्रोंमें प्रकाशित हुआ है । इसके अतिरिक्त जब जब समय मिल गया, तब तब इसी विचारसे, कुछ विद्वान् मित्रोंके साथ समय-समयपर वाद-विवादभी किया । इन्हीं मित्रोंमें स्वर्गीय श्रीपतिबाबा भिंगारकर थे । इनके सहवाससे भागवत संप्रदायके कुछ प्राकृत ग्रंथ देखनेमें आये, और गीतारहस्यमें वर्णित कुछ बातें तो आपके और हमारे वाद-विवादमेंही पहले निश्चित हो चुकी थीं । यह बड़े दुःखकी बात है, कि आप इस ग्रंथको देख न पाये । अस्तु; इस प्रकार यह मत निश्चित हो गया, कि गीताका प्रतिपाद्य विषय प्रवृत्ति- प्रधान है; और इसको लिखकर ग्रंथरूपमें प्रकाशित करनेका विचार कियेभी अनेक वर्ष बीत गये । वर्तमान समयमें पाये जानेवाले भाष्यों, टीकाओं या अनुवादोंमें जो गीता-तात्पर्य स्वीकृत नहीं हुआ है, केवल उसेही यदि पुस्तकरूपसे प्रकाशित कर देते, और इसका कारण न बतलाते, कि प्राचीन टीकाकारोंका निश्चित किया हुआ तात्पर्य हमें ग्राह्य क्यों नहीं है, तो बहुत संभव था, कि लोग कुछका कुछ समझने लग जाते - उनको भ्रम हो जाता; और समस्त टीकाकारोंके मतोंका संग्रह करके उनकी सकारण अपूर्णता दिखला देना, एवं अन्य धर्मों या तत्त्वज्ञानोंके साथ गीता-धर्मकी तुलना करना कोई ऐसा साधारण काम न था, जो शीघ्रतापूर्वक चटपट हो जाय। अतएव यद्यपि हमारे मित्र श्रीयुत दाजीसाहेब खरे और दादासाहेब खापर्डेने कुछ पहलेही यह प्रकाशित कर दिया था, कि हम गीतापर एक नवीन ग्रंथ शीघ्रही प्रसिद्ध करनेवाले हैं; तथापि ग्रंथ लिखनेका काम इस समझसे टलता गया, कि हमारे पास जो सामग्री है वह अभी, अपूर्ण है; जब सन् १९०८ ईसवीमें सजा देकर हम मंडाले भेज दिये गये, तब तो इस ग्रंथके लिखे जानेकी आशा बहुत कुछ घटही गई थी । किंतु कुछ समय बाद ग्रंथ लिखनेके लिये आवश्यक पुस्तकें आदि सामग्री पूनासे मँगा लेनेकी अनुमति जब सरकारकी मेहरबानीसे मिल गई, तब सन् १९१०-११ के कुछ कालमें (संवत् १९६७, कार्तिक शुक्ल १ से चैत्र कृष्ण ३० के भीतर) इस ग्रंथकी पांडु- लिपि (मसविदा) मंडालेके जेलखानेमें पहले पहल लिखी गई । और फिर समयानुसार जैसे जैसे विचार सूझते गये, वैसे वैसे उसमें काट-छांट होती गई; उस समय समग्र पुस्तकें वहाँ न होनेके कारण कई स्थानोंमें जो अपूर्णता रह गई थी, उसे वहाँसे छुटकारा हो जानेपर पूर्ण तो कर लिया गया है; परंतु अभीभी यह नही कहा