श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रस्तावना सन्तों की उच्छिष्ट उक्ति है मेरी बानी । जानूँ उसका भेद भला क्या मैं अज्ञानी ॥* श्रीमद्भगवद्गीतापर अनेक संस्कृत भाष्य, टीकाएँ अथवा देशी भाषाओंमें अनुवाद या सर्वमान्य विस्तृत निरूपण हैं, फिरभी यह ग्रंथ क्यों प्रकाशित किया गया ? यद्यपि इसका कारण ग्रंथके आरंभमेंही बतलाया गया है, तथापि कुछ बातें ऐसी हैं, कि जिनका ग्रंथके प्रतिपाद्य विषयके विवेचनमें उल्लेख न हो सकता था, अतः उन बातोंको प्रकट करनेके लिये प्रस्तावनाको छोड़ और दूसरा स्थान नहीं है । इनमें सबसे पहली बात स्वयं ग्रंथकारके विषयमें है । कोई तैतालीस वर्ष हुए जब हमारा भगवद्गीतासे प्रथम परिचय हुआ था । सन् १८७२ ईसवीमें हमारे पूज्य पिताजी अंतिम रोगसे आक्रान्त हो शय्यापर पड़े हुए थे, उस समय उन्हें 'भाषा- विवृत्ति' नामक भगवद्गीताकी मराठी टीका सुनानेका काम हमें मिला था । तब, अर्थात् अपनी आयुके सोलहवें वर्षमें गीताका भावार्थ पूर्णतया समझमें न आ सकता था । फिरभी छोटी अवस्थामें मनपर जो संस्कार होते हैं, वे दृढ़ हो जाते हैं, इस कारण उस उमय भगवद्गीताके संबंधमें जो चाह उत्पन्न हो गई थी, वह स्थिर बनी रही और आगे जब संस्कृत और अंग्रेजीका अधिक अभ्यास हो गया, तब हमने गीताके संस्कृत भाष्य, अन्यान्य टीकाएँ और अनेक पंडितोंके मराठी तथा अंग्रेजीमें लिखे हुए विवेचनभी समय-समयपर पढ़े । परंतु तब मनमें शंका उत्पन्न हुई, कि जो गीता अपने स्वजनोंके साथ युद्ध करनेको बड़ा भारी कुकर्म समझकर खिन्न होने- वाले अर्जुनको युद्धमें प्रवृत्त करनेके लिये बतलाई गई है, उस गीतामें ब्रह्मज्ञानसे या भक्तिसे मोक्ष-प्राप्तिकी विधिका - निरे मोक्ष-मार्गका - विवेचन क्यों किया गया है ? यह शंका इसलिये औरभी दृढ़ होती गई, कि गीताकी किसीभी टीकामें इस विषयका योग्य उत्तर ढूँढ़े न मिला । कौन जानता है, कि हमारे समानही और लोगोंकोभी यही शंका हुई न होगी ! परंतु टीकाओंपरही निर्भर रहनेसे, टीका- कारोंका दिया हुआ उत्तर समाधानकारक न भी जँचे, तोभी उसको छोड़ और दूसरा उत्तर सूझताही नहीं है । इसीलिये जब हमने गीताकी समस्त टीकाओं और भाष्योंको लपेटकर एक ओर धर दिया और केवल गीताकेही स्वतंत्र विचार- पूर्वक अनेक पारायण किये, तब टीकाकारोंके चंगुलसे छूटे, और यह बोध हुआ, कि मूल गीता निवृत्ति-प्रधान नहीं है, वह तो कर्म-प्रधान है, और अधिक क्या कहें ! गीतामें अकेला 'योग' शब्दही 'कर्मयोग'के अर्थमें प्रयुक्त हुआ है । महा-
- साधु तुकारामके एक 'अभंग'का भाव ।