श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
परिशिष्ट: गीता रचनाकाल, श्लोक अन्वय व सटीक अनुवाद
७५६ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र उच्चैःश्रवसमश्वानां विद्धि माममृतोद्भवम् । ऐरावतं गजेन्द्राणां नराणां च नराधिपम् ॥ २७ ॥ आयुधानामहं वज्रं धेनूनामस्मि कामधुक् । प्रजनश्चास्मि कन्दर्पः सर्पाणामस्मि वासुकिः ॥ २८ ॥ अनन्तश्चास्मि नागानां वरुणो यादसामहम् । पितॄणामर्यमा चास्मि यमः संयमतामहम् ॥ २९ ॥ प्रह्लादश्चास्मि दैत्यानां कालः कलयतामहम् । मृगाणां च मृगेन्द्रोऽहं वैनतेयश्च पक्षिणाम् ॥ ३० ॥ पवनः पवतामस्मि रामः शस्त्रभृतामहम् । झषाणां मकरश्चास्मि स्रोतसामस्मि जाह्नवी ॥ ३१ ॥ चित्ररथ, और सिद्धोंमें कपिल मुनि हूँ । (२७) घोड़ोंमें, अमृतमंथनके समय निकला हुआ, उच्चैःश्रवा मुझे समझ । मैं गजेंद्रोंमें ऐरावत, और मनुष्योंमें राजा हूँ । (२८) मैं आयुधोंमें वज्र, गौओमें कामधेनु, और प्रजा उत्पन्न करनेवाला काम हूँ; सर्पोंमें वासुकि मैं हूँ । (२९) नागोंमें अनंत मैं हूँ; यादस् अर्थात् जलचर प्राणियोंमें वरुण, और पितरोंमें अर्यमा मैं हूँ; मैं नियमन करनेवालोंमें यम हूँ । | [ वासुकि = सर्पोंका राजा और अनंत = 'शेष' ये अर्थ निश्चित हैं, और | अमरकोश तथा महाभारतमेंभी ये अर्थ दिये गये हैं (महा. आदि. ३५-३९ | ३९) । परंतु निश्चयपूर्वक नहीं बतलाया जा सकता, कि नाग और सर्पमें क्या | भेद है । महाभारतके अस्ति-उपाख्यानमें इन शब्दोंका प्रयोग समानार्थकही | है : तथापि जान पड़ता है, कि यहांपर सर्प और नग शब्दोंसे सर्पके साधारण | वर्गकी दो भिन्न-भिन्न जातियां विवक्षित हैं । श्रीधर-टीकामें सर्पको विषैला और | नागको विषहीन कहा है, एवं रामानुज-भाष्यमें सर्पको एक सिरवाला और | नागको अनेक सिरोंवाला कहा है । परंतु ये दोनों भेद ठीक नहीं जँचते । क्योंकि | कुछ स्थलोंपर नागोंकेही प्रमुख कुल बतलाते हुए उनमें अनंत और वासुकीको | पहले गिनाया है; और वर्णन किया है, कि दोनोंभी अनेक सिरोंवाले एवं | विषधर हैं, किंतु अनंत है अग्निवर्णका और वासुकि. है पीला ।। भागवतका | पाठ गीताके समानही है । ] (३०) दैत्योंमें प्रल्हाद मैं हूँ; मैं ग्रसनेवालोंमें काल, पशुओंमें मृगेन्द्र अर्थात् सिंह, और पक्षियोंमें गरुड हूँ । (३१) मैं वेगवानांमे वायु हूँ; मैं शस्त्रधारियोंमें राम, मछलियोंमें मगर, और नदियोंमें भागीरथी हूँ ।
दसवाँ अध्याय ७७७ सर्गाणामादिरन्तश्च मध्यं चैवाहमर्जुन । अध्यात्मविद्या विद्यानां वादः प्रवदतामहम् ॥ ३२ ॥ अक्षराणामकारोऽस्मि द्वन्द्वः सामासिकस्य च । अहमेवाक्षयः कालो धाताऽहं विश्वतोमुखः ॥ ३३ ॥ मृत्युः सर्वहरश्चाहमुद्भवश्च भविष्यताम् । कीर्तिः श्रीर्वाक्च नारीणां स्मृतिर्मेधा धृतिः क्षमा ॥ ३४ ॥ बृहत्साम तथा साम्नां गायत्री छन्दसामहम् । मासानां मार्गशीर्षोऽहमृतूनां कुसुमाकरः ॥ ३५ ॥ (३२) हे अर्जुन ! सृष्टिमात्रका आदि, अन्त और मध्यभी मैं हूँ; विद्याओंमें अध्यात्मविद्या, और वाद करनेवालोंका वाद मैं हूँ। । [ पीछे २० वें श्लोकमें बतला दिया है, कि सचेतन भूतोंका आदि, मध्य । और अंत मैं हूँ; तथा अब कहते हैं, कि सब चराचर सृष्टिका आदि, मध्य और । अंत मैं हूँ; यही भेद है । ] (३३) मैं अक्षरोंमें अकार, और समासोंमें (उभयपदप्रधान) द्वंद्व हूँ; (निमेष, मुहूर्त आदि) अक्षय काल मैंही हूँ और सर्वतोमुख अर्थात् चारों ओरसे मुखोंवाला धाता याने ब्रह्मा मैं हूँ; (३४) सबको क्षय करनेवाली मृत्यु, और आगे जन्म लेनेवालोंका उत्पत्तिस्थान मैं हूँ; स्त्रियोंमें कीर्ति, श्री और वाणी, स्मृति, मेधा, धृति, तथा क्षमा मैं हूँ। । [ कीर्ति, श्री, वाणी इत्यादि शब्दोंसेही देवियाँ, विवक्षित हैं। महाभारतमें । (आदि. ६६. १३, १४) वर्णन है, कि इनमेंसे वाणी और क्षमाको छोड़ । शेष पाँच और दूसरी पाँच (पुष्टि, श्रद्धा, क्रिया, लज्जा और मति) दोनों । मिलकर कुल दशों दक्षकी कन्याएँ हैं, और धर्मके साथ ब्याही जानेके कारण । उन्हें धर्मपत्नी कहते हैं।] (३५) साम अर्थात् गानेके योग्य वैदिक स्तोत्रोंमें बृहत्साम, (और) छंदोंमें गायत्री छंद मैं हूँ; महीनोंमें मार्गशीर्ष और ऋतुओंमें वसंत मैं हूँ। । [महीनोंमें मार्गशीर्षको प्रथम स्थान इसलिये दिया गया है, कि उन । दिनोंमें बारह महीनोंको मार्गशीर्षसेही गिननेकी रीति थी। जैसे कि आजकल । चैत्रसे है (मभा. अनु. १०६, १०९; एवं वाल्मीकिरामायण ३. १६) । । भागवत ११. १६. २७ मेंभी ऐसाही उल्लेख है। हमने अपने 'ओरायन' ग्रंथमें । लिखा है, कि मृगशीर्ष नक्षत्रको अग्रहायणी अथवा वर्षारंभका नक्षत्र कहते थे; । जब मृगादि नक्षत्रगणनाका प्रचार था, तब मृगनक्षत्रको प्रथम अग्रस्थान मिला।
७७८ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र द्यूतं छलयतामस्मि तेजस्तेजस्विनामहम् । जयोऽस्मि व्यवसायोऽस्मि सत्त्वं सत्त्ववतामहम् ॥ ३६ ॥ वृष्णीनां वासुदेवोऽस्मि पाण्डवानां धनंजयः । मुनीनामप्यहं व्यासः कवीनामुशना कविः ॥ ३७ ॥ दण्डो दमयतामस्मि नीतिरस्मि जिगीषताम् । मौनं चैवास्मि गुह्यानां ज्ञानं ज्ञानवतामहम् ॥ ३८ ॥ यच्चापि सर्वभूतानां बीजं तदहमर्जुन । न तदस्ति विना यत्स्यान्मया भूतं चराचरम् ॥ ३९ ॥ नान्तोऽस्ति मम दिव्यानां विभूतीनां परंतप । एष तूद्देशतः प्रोक्तो विभूतेर्विस्तरो मया ॥ ४० ॥ § § यद्यद्विभूतिमत्सत्त्वं श्रीमदूर्जितमेव वा । तत्तदेवावगच्छ त्वं मम तेजोंऽशसम्भवम् ॥ ४१ ॥ अथवा बहुनैतेन किं ज्ञातेन तवार्जुन । विष्टभ्याहमिदं कृत्स्नमेकांशेन स्थितो जगत् ॥ ४२ ॥ इति श्रीमद्भगवद्गीतासु उपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुन-संवादे विभूतियोगो नाम दशमोऽध्यायः ॥१०॥ । और उसीसे आगे मार्गशीर्ष महीनेकोभी श्रेष्ठता मिली होगी । इस विषयको । यहाँ विस्तारके भयसे अधिक बढ़ाना उचित नहीं है । ] ( ३६ ) मैं छलियोँका द्यूत हूँ; तेजस्वियोंका तेज, ( विजयशाली पुरुषोंकी ) विजय, ( निश्चयी पुरुषोंका ) निश्चय और, सत्त्वशीलोंका सत्त्व मैं हूँ । ( ३७ ) मैं यादवोंमें वासुदेव, पांडवोंमें धनंजय, मुनियोंमें व्यास, और कवियोंमें शुक्राचार्य कवि हूँ । ( ३८ ) मैं शासन करनेवालोंका दंड, जयकी इच्छा करनेवालोंकी नीति, और गुह्योंमें मौनभी हूँ । ज्ञानियोंका ज्ञान मैं हूँ । ( ३९ ) इसी प्रकार हे अर्जुन ! सब भूतोंका जो कुछ बीज है, वह मैं हूँ; ऐसा कोई चर-अचर भूत नहीं है, जो मुझे छोड़े हो । ( ४० ) हे परंतप ! मेरी दिव्य विभूतियोंका अंत नहीं है । विभूतियोंका यह विस्तार मैने ( केवल ) दिग्दर्शनार्थ बतलाया है । । [ इस प्रकार मुख्य मुख्य विभूतियाँ बतलाकर, अब इस प्रकरणका । उपसंहार करते हैं :- ] ( ४१ ) जो जो वस्तु वैभव, लक्ष्मी, या प्रभावसे युक्त है, उसको तू मेरे तेजके अंशसे उपजी हुई समझ । ( ४२ ) अथवा हे अर्जुन ! तुझे इस सबको
दसवाँ अध्याय ७७९ जानकर करना क्या है ? ( संक्षेपमें बतलाये देता हूँ, कि ) मैं अपने एक ( ही ) अंशसे इस सारे जगतको व्याप्त कर रहा हूँ। | [ अंतका श्लोक पुरुषसूक्तकी इस ऋचाके आधारपर कहा गया है - | “ पादोऽस्य विश्वा भूतानि त्रिपादस्यामृतं दिवि ” ( ऋ. १०. ९०. ३ ) ; | और यह मंत्र छांदोग्य उपनिषदमेंभी ( छां. ३, १२. ६ ) है । 'अंश' शब्दके | अर्थका स्पष्टीकरण गीतारहस्यके नवें प्रकरणके अंतमें ( पृ. २४७, २४८ ) | किया गया है। प्रकट है, कि जब भगवान् अपने एकही अंशसे इस जगतमें व्याप्त | हो गये हैं, तब इसकी अपेक्षा भगवानकी पूरी महिमा बहुतही अधिक होगी ; | और उसे बतलानेके हेतुसेही अंतिम श्लोक कहा गया है। पुरुषसूक्तमें तो | स्पष्टही कह दिया है, कि “ एतावान् अस्य महिमाऽतो ज्यायांश्च पूरुषः ” | इतनी इसकी वह महिमा हुई, पुरुष तो इसकी अपेक्षा कहीं श्रेष्ठ है । ] इस प्रकार श्रीभगवानके गाये हुए - अर्थात् कहे हुए - उपनिषदमें, ब्रह्म- विद्यान्तर्गत योग अर्थात् कर्मयोगशास्त्रविषयक, श्रीकृष्ण और अर्जुनके संवादमें, विभूतियोग नामक दसवाँ अध्याय समाप्त हुआ ।
७८० गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र एकादशोऽध्यायः। अर्जुन उवाच । मदनुग्रहाय परमं गुह्यमध्यात्मसंज्ञितम् । यत्त्वयोक्तं वचस्तेन मोहोऽयं विगतो मम ॥ १ ॥ भवाप्ययौ हि भूतानां श्रुतौ विस्तरशो मया । त्वत्तः कमलपत्राक्ष माहात्म्यमपि चाव्ययम् ॥ २ ॥ एवमेतद्यथात्थ त्वमात्मानं परमेश्वर । द्रष्टुमिच्छामि ते रूपमैश्वरं पुरुषोत्तम ॥ ३ ॥ मन्यसे यदि तच्छक्यं मया द्रष्टुमिति प्रभो । योगेश्वर ततो मे त्वं दर्शयात्मानमव्ययम् ॥ ४ ॥ ग्यारहवाँ अध्याय [ जब पिछले अध्यायमें भगवानने अपनी विभूतियोंका वर्णन किया, तब उसे सुनकर अर्जुनको परमेश्वरका वह विश्वरूप देखनेकी इच्छा हुई । भगवानने उसे जिस विश्वरूपका दर्शन कराया, उसका वर्णन इस अध्यायमें है। यह वर्णन इतना सरस है, कि गीताके उत्तम भागोंमें इसकी गिनती होती है और अन्यान्य गीताओंकी रचना करनेवालोंने इसीका अनुकरण किया है। अर्जुन प्रथम पूछता है, कि :- ] अर्जुनने कहा :-( १ ) मुझपर अनुग्रह करनेके लिये तुमने अध्यात्मसंज्ञक जो परम गुप्त बात बतलायी, उससे मेरा यह मोह जाता रहा । ( २ ) इसी प्रकार हे कमलपत्राक्ष ! भूतोंकी उत्पत्ति, लय और, ( तुम्हारा ) अक्षय माहात्म्यभी मैंने तुमसे विस्तारसहित सुन लिया । ( ३ ) अब, हे परमेश्वर ! तुमने अपना जैसा वर्णन किया है, हे पुरुषोत्तम ! मैं तुम्हारे उस प्रकारके ईश्वरी स्वरूपको ( प्रत्यक्ष ) देखना चाहता हूँ । ( ४ ) हे प्रभो ! यदि तुम समझते हो, कि उस प्रकारका रूप मैं देख सकता हूँ, तो हे योगेश्वर ! तुम अपना अव्यय स्वरूप मुझे दिखलाओ ! [ सातवें अध्यायमें ज्ञानविज्ञानके निरूपण आरंभकर सातवें और आठवेंमें परमेश्वरके अक्षर अथवा अव्यक्त रूपका, तथा नवें एवं दसवेंमें अनेक व्यक्त रूपोंका जो ज्ञान बतलाया है, उसीही अर्जुनने पहले श्लोकमें 'अध्यात्म' कहा है । एक अव्यक्तसे अनेक व्यक्त पदार्थोंके निर्मित होनेका जो वर्णन सातवें ( ७. ४-१२ ), आठवें ( ८. १६-२१ ), और नवें ( ९. ४-८ ) अध्यायोंमें
ग्यारहवाँ अध्याय ७८१ श्रीभगवानुवाच । § § पश्य मे पार्थ रूपाणि शतशोऽथ सहस्रशः । नानाविधानि दिव्यानि नानावर्णाकृतीनि च ॥ ५ ॥ पश्यादित्यान्वसून्रुद्रानश्विनौ मरुतस्तथा । बहून्यदृष्टपूर्वाणि पश्याश्चर्याणि भारत ॥ ६ ॥ इहैकस्थं जगत्कृत्स्नं पश्याद्य सचराचरम् । मम देहे गुडाकेश यच्चान्यद्द्रष्टुमिच्छसि ॥ ७ ॥ । है, वही “ भूतोंकी उत्पत्ति और लय ” इन शब्दोंसे दूसरे श्लोकमें अभिप्रेत है । । तीसरे श्लोकके दोनों अर्धांशोंको दो भिन्न-भिन्न वाक्य मानकर कुछ लोग उनका । ऐसा अर्थ करते हैं, कि “ हे परमेश्वर ! तुमने अपना जैसा ( स्वरूप-वर्णन किया, । वह सत्य है ( अर्थात् मैं समझ गया ) ; अब हे पुरुषोत्तम ! ” मैं तुम्हारे ईश्वरी । स्वरूपको देखना चाहता हूँ ।” ( गीता १०. १४ ) । परंतु दोनों पंक्तियोंको । मिलाकर एकही वाक्य मानना ठीक जान पड़ता है; और परमार्थप्रपा टीकामें । ऐसा कियाभी गया है। चौथे श्लोकमें जो 'योगेश्वर' शब्द है, उसका अर्थ । ( योगियोंका नही ) ईश्वर है ( १८. ७५ ) । योगका अर्थ ( गीता ७. २५; । ९. ५ ) अव्यक्त रूपसे व्यक्त सृष्टि निर्माण करनेकी सामर्थ्य अथवा युक्ति । पहले की जा चुकी है; अब उस सामर्थ्यसेही विश्वरूप दिखलाना है, इस कारण । यहाँ 'योगेश्वर' संबोधनका प्रयोग सहेतुक है । ] श्रीभगवानने कहा :- ( ५ ) हे पार्थ ! मेरे अनेक प्रकारके, अनेक रंगोंके और आकारोंके ( इन ) सैकड़ो अथवा हजारो दिव्य रूपोंको देख । ( ६ ) ये देख, ( बारह ) आदित्य, ( आठ ), वसु, ( ग्यारह ) रुद्र, ( दो ) अश्विनीकुमार और ( उनचास ) मरुद्गण ! हे भारत ! ये अनेक आश्चर्य देख, कि जो पहले कभी न देखे होंगे । । [ नारायणीय धर्ममें नारदको जो विश्वरूप दिखलाया गया है, उसमें यह । विशेष वर्णन है, कि बाईं ओर बारह आदित्य, सन्मुख आठ वसु, दाहिनी ओर । ग्यारह रुद्र और पिछली ओर दो अश्विनीकुमार थे ( शां. ३३९. ५०-५२ ) । । परंतु यही वर्णन सर्वत्र विवक्षित नही दिखाई देता ( मभा. उ. १३० ) । । आदित्य, वसु, रुद्र, अश्विनीकुमार और मरुद्गण ये वैदिक देवता हैं; और । महाभारतमें ( शां. २०८. २३, २४ ) देवताओंके चातुर्वर्ण्यका भेद यों बतलाया । है, कि इनमेंसे आदित्य क्षत्रिय हैं, मरुद्गण वैश्य हैं, और अश्विनीकुमार रुद्र । हैं, शतपथब्राह्मण १४. ४. २.. २३ ) । ] ( ७ ) हे गुडाकेश ! मेरी ( इस ) देहमें सब चर-अचर जगतको आज यहाँपर
७८२ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र न तु मां शक्यसे द्रष्टुमनेनैव स्वचक्षुषा । दिव्यं ददामि ते चक्षुः पश्य मे योगमैश्वरम् ॥ ८ ॥ संजय उवाच । § § एवमुक्त्वा ततो राजन् महायोगेश्वरो हरिः । दर्शयामास पार्थाय परमं रूपमैश्वरम् ॥ ९ ॥ अनेकवक्त्रनयनमनेकाद्भुतदर्शनम् । अनेकदिव्याभरणं दिव्यानेकोद्यतायुधम् ॥ १० ॥ दिव्यमाल्याम्बरधरं दिव्यगन्धानुलेपनम् । सर्वाश्चर्यमयं देवमनन्तं विश्वतोमुखम् ॥ ११ ॥ दिवि सूर्यसहस्रस्य भवेद्युगपदुत्थिता । यदि भाः सदृशी सा स्याद्भासस्तस्य महात्मनः ॥ १२ ॥ तत्रैकस्थं जगत्कृत्स्नं प्रविभक्तमनेकधा । अपश्यद्देवदेवस्य शरीरे पाण्डवस्तदा ॥ १३ ॥ ततः स विस्मयाविष्टो हृष्टरोमा धनंजयः । प्रणम्य शिरसा देवं कृतांजलिरभाषत ॥ १४ ॥ एकत्रित देख ले, और दूसराभी जो कुछ तुझ देखनेकी लालसा हो, उसेभी उसमें देख ले ! (८) परंतु तू अपनी इसी दृष्टिसे मुझे देख न सकेगा, तुझे मैं दिव्य दृष्टि देता हूं; (उससे) मेरे इस ईश्वरी योग अर्थात् योगसामर्थ्यको देख । संजयने कहा :-(९) हे राजा धृतराष्ट्र ! इस प्रकार कह करके फिर योगोंके बड़े ईश्वर हरिने अर्जुनको (अपना) श्रेष्ठ ईश्वरी रूप अर्थात् विश्वरूप दिखलाया । (१०) उसके अर्थात् उस विश्वरूपके अनेक मुख और नेत्र थे और उसमें अनेक अद्भुत दृश्य दीख पड़ते थे; (और) उसपर अनेक प्रकारके दिव्य अलंकार थे और उसमें नाना प्रकारके दिव्य आयुध सज्जत थे । (११) उस अनंत, सर्वतोमुख और सब आश्चर्योंसे भरे हुए देवताके दिव्य सुगंधित उबटन लगा हुआ था, और वह दिव्य पुष्प एवं वस्त्र धारण किये हुए था । (१२) यदि आकाशमें एक हजार सूर्योंकी प्रभा एकसाथ हो, तो वह उस महात्माकी क्रांतिके समान (कुछ कुछ) दीख पड़े ! (१३) तब अर्जुनको देवधिदेवके इस शरीरमें नाना प्रकारसे बँटा हुआ सारा जगत् एकत्रित दिखाई दिया । (१४) फिर आश्चर्यसे चकित होकर उसके शरीरपर रोमांच खड़े हो
ग्यारहवाँ अध्याय ७८३ अर्जुन उवाच । §§ पश्यामि देवांस्तव देव देहे सर्वांस्तथा भूतविशेषसंघान् । ब्रह्माणमीशं कमलासनस्थमृषींश्च सर्वानुरगांश्च दिव्यान् ॥ १५ ॥ अनेकबाहूदरवक्त्रनेत्रं पश्यामि त्वां सर्वतोऽनन्तरूपम् । नान्तं न मध्यं न पुनस्तवादिं पश्यामि विश्वेश्वर विश्वरूप ॥ १६ ॥ किरीटिनं गदिनं चक्रिणं च तेजोरारिं सर्वतो दीप्तिमन्तम् । पश्यामि त्वां दुर्निरीक्ष्यं समन्ताद्दीप्तानलार्कद्युतिमप्रमेयम् ॥ १७ ॥ त्वमक्षरं परमं वेदितव्यं त्वमस्य विश्वस्य परं निधानम् । त्वमव्ययः शाश्वतधर्मगोप्ता सनातनस्त्वं पुरुषो मतो मे ॥ १८ ॥ अनादिमध्यान्तमनन्तवीर्यमनन्तबाहुं शशिसूर्यनेत्रम् । पश्यामि त्वां दीप्तहुताशवक्त्रं स्वतेजसा विश्वमिदं तपन्तम् ॥ १९ ॥ द्यावापृथिव्योरिदमन्तरं हि व्याप्तं त्वयैकेन दिशश्च सर्वाः । दृष्ट्वाद्भुतं रूपमुग्रं तवेदं लोकत्रयं प्रव्यथितं महात्मन् ॥ २० ॥ आये; और मस्तक नमाकर नमस्कार करके एवं हाथ जोड़कर उस अर्जुनने देवतासे कहा :- अर्जुनने कहा :- ( १५ ) हे देव ! तुम्हारी इस देहमें सब देवताओंको और नाना प्रकारके प्राणियोंके समुदायोंको, ऐसेही कमलासनपर बैठे हुए ( सब देवताओंके ) स्वामी ब्रह्मदेवको, सब ऋषियोंको, और ( वासुकि प्रभृति ) सब दिव्य सर्पोंकोभी मैं देख रहा हूँ । ( १६ ) अनेक बाहु, अनेक उदर, अनेक मुख और अनेक नेत्रधारी, अनंतरूपी तुम्हींको मैं चारों ओर देखता हूँ; परंतु हे विश्वेश्वर विश्वरूप ! तुम्हारा न तो अंत, न मध्य या न आदिभी मुझे ( कहीं ) दीख पड़ता है । ( १७ ) किरीट, गदा और चक्र धारण करनेवाले, चारों ओर प्रभा फैलाये हुए; तेजःपुंज, दमकते हुए अग्नि और सूर्यके समान देदीप्यमान्, आँखोंसे देखनेमेंभी अशक्य और अपरंपार ( भरे हुए ) तुम्हीं मुझे जहाँ-तहाँ दीख पड़ते हो । ( १८ ) तुम्हीं अंतिम ज्ञेय अक्षर ( ब्रह्म ), तुम्हीं इस विश्वके अंतिम आधार, तुम्हीं अव्यय और तुम्हीं शाश्वत धर्मके रक्षक हो, और मुझे सनातन पुरुष तुम्हीं जान पड़ते हो । ( १९ ) मैं देख रहा हूँ, कि जिसके न आदि है, न मध्य या न अंत, अनंत जिसके बाहु हैं, चंद्र और सूर्य जिसके नेत्र हैं, प्रज्वलित अग्नि जिसका मुख है, ऐसे अनंत शक्तिमान् तुम्हीं अपने तेजसे इस समस्त जगतको तपा रहे हो । ( २० ) क्योंकि आकाश और
७८४ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र अमी हि त्वां सुरसंघा विशन्ति केचिद्भीताः प्रांजलयो गृणन्ति । स्वस्तीत्युक्त्वा महर्षिसिद्धसंघाः स्तुवन्ति त्वां स्तुतिभिः पुष्कलाभिः ॥२१ रुद्रादित्या वसवो ये च साध्या विश्वेऽश्विनौ मरुतश्चोष्मपाश्च । गन्धर्वयक्षासुरसिद्धसंघा वीक्षन्ते त्वां विस्मिताश्चैव सर्वे ॥ २२ ॥ रूपं महत्ते बहुवक्त्रनेत्रं महाबाहो बहुबाहूरुपादम् । बहूद॒रं बहुदंष्ट्राकरालं दृष्ट्वा लोकाः प्रव्यथितास्तथाहम् ॥ २३ ॥ नभःस्पृशं दीप्तमनेकवर्णं व्यात्ताननं दीप्तविशालनेत्रम् । दृष्ट्वा हि त्वां प्रव्यथितान्तरात्मा धृतिं न विन्दामि शमं च विष्णो ॥२४ पृथ्वीके बीचका यह ( सब ) अंतर और सभी दिशाएँ अकेले तुम्हींने व्याप्तकर डाली हैं; और हे महात्मन् ! तुम्हारे इस अद्भुत और उग्र रूपको देखकर त्रैलोक्य ( डरसे ) व्यथित हो रहा है। ( २१ ) यह देखो, देवताओंके ये समूह तुममें प्रवेश कर रहे हैं, ( और ) कुछ भयसे हाथ जोड़कर प्रार्थना कर रहे हैं; ( एवं ) ‘स्वस्ति, स्वस्ति' कहकर महर्षियों और सिद्धोंके समुदाय अनेक प्रकारके स्तोत्रोंसे तुम्हारी स्तुति कर रहे हैं। ( २२ ) ( ऐसेही ) रुद्र और आदित्य, वसु और साध्यगण, विश्वेदेव, ( दोनो ) अश्विनीकुमार, मरुद्गण, उष्मपा अर्थात् पितर, और गंधर्व, यक्ष, राक्षस, एवं सिद्धोंके झुंडके झुंड सर्वत विस्मित होकर तुम्हारी ओर देख रहे हैं। [ श्राद्धमें पितरोंको जो अन्न अर्पण किया जाता है, उसे वे तभीतक ग्रहण करते हैं, जब तक कि वह गरमागरम रहे, इसीसे उनको 'उष्मपा' कहते हैं ( मनु. ३. २३७ ) । मनुस्मृतिमें ( ३, ९४–२०० ) इन्हीं पितरोंके सोमसद् अग्निष्वात्त, बर्हिषद्, सोमपा, हविष्मान्, आज्यपा और सुकलिन् ये सात प्रकारके गण बतलाये हैं। आदित्य आदि देवता वैदिक हैं ( ऊपरका छठा श्लोक देखो ) । बृहदारण्यक उपनिषदमें ( ३. ९. २ ) यह वर्णन है, कि आठ वसु, ग्यारह रुद्र, बारह आदित्य और इंद्र तथा प्रजापतिको मिलाकर ३३ देवता होते हैं; और महाभारतके आदिपर्व अ. ६५ एवं ६६में तथा शांतिपर्व अ. २०८में उनके नाम और उत्पत्ति बतला गयी है। ] ( २३ ) हे महाबाहु ! तुम्हारे इस विराट् अनेक मुखोंके, अनेक आँखोंके, अनेक भुजाओंके, अनेक जंघाओंके, अनेक पैरोंके, अनेक उदरोंके, और अनेक दाढ़ोंके कारण विकराल दिखनेवाले रूपको देखकर सब लोगोंको और मुझेभी भय हो रहा है। ( २४ ) आकाशसे भिड़े हुए, प्रकाशमान्, अनेक रंगोंके, जबड़े फैलाये हुए, और बड़े चमकीले नेत्रोंसे युक्त तुमको देखकर अंतरात्मा घबड़ा गया है; इससे हे
ग्यारहवाँ अध्याय ७८५ दंष्ट्राकरालानि च ते मुखानि दृष्ट्वैव कालानलसन्निभानि । दिशो न जाने न लभे च शर्म प्रसीद देवेश जगन्निवास ॥ २५ ॥ अमी च त्वां धृतराष्ट्रस्य पुत्राः सर्वे सहैवावनिपालसंघैः । भीष्मो द्रोणः सूतपुत्रस्तथासौ सहास्मदीयैरपि योधमुख्यैः ॥ २६ ॥ वक्त्राणि ते त्वरमाणा विशन्ति दंष्ट्राकरालानि भयानकानि । केचिद्विलग्ना दशनान्तरेषु सन्दृश्यन्ते चूर्णितैरुत्तमाङ्गैः ॥ २७ ॥ यथा नदीनां बहवोऽम्बुवेगाः समुद्रमेवाभिमुखा द्रवन्ति । तथा तवामी नरलोकवीरा विशन्ति वक्त्राण्यभिविज्वलन्ति ॥ २८ ॥ यथा प्रदीप्तं ज्वलनं पतंगा विशन्ति नाशाय समृद्धवेगाः । तथैव नाशाय विशन्ति लोकास्तवापि वक्त्राणि समृद्धवेगाः ॥ २९ ॥ लेलिह्यसे ग्रसमानः समन्ताल्लोकान्समग्रान्वदनैर्ज्वलद्भिः । तेजोभिरापूर्य जगत्समग्रं भासस्तवोग्राः प्रतपन्ति विष्णो ॥ ३० ॥ आख्याहि मे को भवानुग्ररूपो नमोऽस्तु ते देववर प्रसीद । विज्ञातुमिच्छामि भवन्तमाद्यं न हि प्रजानामि तव प्रवृत्तिम् ॥ ३१ ॥ विष्णो ! मेरा धीरज छूट गया और शांतिभी जाती रही ! ( २५ ) और यह अवस्था हुई है, कि दाढ़ोंसे विकराल तथा प्रलयकालीन अग्नीके समान तुम्हारे ( इन ) मुखोंको देखतेही मुझे दिशाएँ नहीं सूझतीं, और समाधानभी नहीं होता । हे जगन्निवास, देवाधिदेव ! ! प्रसन्न हो जाओ ( २६ ) यह देखो, राजाओंके झुंडसमेत धृतराष्ट्रके सब पुत्र, भीष्म, द्रोण और वह सूतपुत्र ( कर्ण ), हमारी ओरकेभी मुख्य मुख्य योद्धाओंके साथ, ( २७ ) तुम्हारी विकराल दाढ़ोंवाले इन अनेक भयंकर मुखोंमें धड़ाधड़ घुस रहे हैं; और कुछ लोग तो दांतोंमें दबकर ऐसे दिखाई दे रहे हैं, कि उनकी खोपड़ियाँ चूर हुई हैं। ( २८ ) तुम्हारे अनेक प्रज्वलित मुखोंमें मनुष्यलोकके ये वीर वैसेही घुस रहे हैं, जैसे कि नदियोंके बड़े बड़े प्रवाह समुद्रकीही ओर चले जाते हैं। ( २९ ) जलती हुई अग्निमें मरनेके लिये पतंग जिस प्रकार बड़े वेगसे कूदते हैं, वैसेही तुम्हारे- भी अनेक जबड़ोंमें मरनेके लिये ( ये ) लोग बड़े वेगसे प्रवेश कर रहे हैं। ( ३० ) हे विष्णो ! चारों ओरसे सब लोगोंको अपने प्रज्वलित मुखोंसे निगल- कर तुम जीभें चाट रहे हो ! और तुम्हारी उग्र प्रभाएँ तेजसे समूचे जगतको व्याप्तकर ( चारों ओर ) चमक रही हैं। ( ३१ ) मुझे बतलाओ, कि इस उग्र रूपको धारण करनेवाले तुम कौन हो ? हे देव देवश्रेष्ठ ! तुम्हें नमस्कार करता गी. र. ५०
७८६ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र श्रीभगवानुवाच । §§ कालोऽस्मि लोकक्षयकृत्प्रवृद्धो लोकान्समाहर्तुमिह प्रवृत्तः । ऋतेऽपि त्वां न भविष्यन्ति सर्वे येऽवस्थिताः प्रत्यनीकेषु योधाः ॥ ३२ ॥ तस्मात्त्वमुत्तिष्ठ यशो लभस्व जित्वा शत्रून्भुंक्ष्व राज्यं समृद्धम् । मयैवैते निहताः पूर्वमेव निमित्तमात्रं भव सव्यसाचिन् ॥ ३३ ॥ द्रोणं च भीष्मं च जयद्रथं च कर्णं तथान्यानपि योधवीरान् । मया हतांस्त्वं जहि मा व्यथिष्ठा युध्यस्व जेतासि रणे सपत्नान् ॥ ३४ ॥ संजय उवाच । §§ एतच्छ्रुत्वा वचनं केशवस्य कृतांजलिर्वेपमानः किरीटी । नमस्कृत्वा भूय एवाह कृष्णं सगद्गदं भीतभीतः प्रणम्य ॥ ३५ ॥ हूँ ! प्रसन्न हो जाओ ! मैं जानना चाहता हूँ, कि तुम आदि पुरुष कौन हो ? क्योंकि मैं तुम्हारी इस करनीको ( बिलकुल ) नहीं जानता । श्रीभगवानने कहा :- ( ३२ ) मैं लोकोंका क्षय करनेवाला और बढ़ा हुआ 'काल' हूँ; लोगोंका संहार करने यहाँ आया हूँ । तू न हो, तोभी, अर्थात् तू कुछ करे, तोभी, सेनाओंमें खड़े हुए ये सब योद्धा नष्ट होनेवाले (मरनेवाले) हैं; (३३) अतएव तू उठ, यश प्राप्त कर, और शत्रुओंको जीत करके समृद्ध राज्यका उपभोग कर । मैंने उन्हें पहलेही मार डाला है; ( इसलिये अब ) हे सव्यसाची (अर्जुन) ! तू केवल निमित्तके लिये ( आगे ) हो ! ( ३४ ) मैं द्रोण, भीष्म, जयद्रथ और कर्ण तथा ऐसेही अन्यान्य वीर योद्धाओंको ( पहलेही ) मार चुका हूँ; उन्हें तू मार । घबड़ाना नहीं ! युद्ध कर ! युद्धमें तू शत्रुओंको जीतेगा । | [ सारांश, जब श्रीकृष्ण संधिके लिये गये थे, तब दुर्योधनको मेलकी | कोईभी बात सुनते न देख भीष्मने श्रीकृष्णसे केवल शब्दोंमें कहा था, कि | 'कालपक्वमिदं मन्ये सर्वं क्षत्रं जनार्दन' ( सभा. उ. १२७. ३२ ) - ये सब | क्षत्रिय कालपक्व हो गये हैं; उसी कथनका यह प्रत्यक्ष दृश्य श्रीकृष्णने अपने | विश्वरूपसे अर्जुनको दिखला दिया है ( ऊपरके २६-३१ श्लोक देखो ) कर्म- | विपाक-प्रक्रियाका यह सिद्धान्तभी ३३वें श्लोकमें आ गया है, कि दुष्ट मनुष्य | अपने कर्मोसेही मरते हैं, उनको मारनेवाला तो सिर्फ निमित्त है, इसलिये | मारनेवालेको उसका दोष नहीं लगता । ] संजयने कहा :- ( ३५ ) केशवके इस भाषणको सुनकर अर्जुन अन्यन्त भय- भीत हो गया, गला रुँधकर, काँपते हुए, हाथ जोड़ नमस्कार करके उसने श्रीकृष्णसे
ग्यारहवाँ अध्याय ७८७ अर्जुन उवाच । स्थाने हृषीकेश तव प्रकीर्त्या जगत्प्रहृष्यत्यनुरज्यते च । रक्षांसि भीतानि दिशो द्रवन्ति सर्वे नमस्यन्ति च सिद्धसंघाः ॥ ३६ ॥ कस्माच्च ते न नमेरन्महात्मन् गरीयसे ब्रह्मणोऽप्यादिकर्त्रे । अनन्त देवेश जगन्निवास त्वमक्षरं सदसत्तत्परं यत् ॥ ३७ ॥ त्वमादिदेवः पुरुषः पुराणस्त्वमस्य विश्वस्य परं निधानम् । वेत्ताऽसि वेद्यं च परं च धाम त्वया ततं विश्वमनन्तरूप ॥ ३८ ॥ वायुर्यमोऽग्निर्वरुणः शशांक प्रजापतिस्त्वं प्रपितामहश्च । नमो नमस्तेऽस्तु सहस्रकृत्वः पुनश्च भूयोऽपि नमो नमस्ते ॥ ३९ ॥ नम्र होकर फिर कहा -- अर्जुनने कहा :- ( ३६ ) हे हृषीकेश ! ( सब ) जगत् तुम्हारे ( गुण-) कीर्तनसे प्रसन्न होता है, और ( उसमें ) अनुरक्त रहता है, राक्षस तुमसे डरकर ( दशों ) दिशाओंमें भाग जाते हैं, और सिद्ध पुरुषोंके संघ तुम्हींको नमस्कार करते हैं, यह ( सब ) उचितही है । ( ३७ ) हे महात्मन् ! तुम ब्रह्म- देवकेभी आदिकारण और उससेभी श्रेष्ठ हो, तुम्हारी वंदना वे कैसे न करेंगे ? हे अनंत ! हे देव देव ! हे जगन्निवास ! सत् और असत् तुम्हीं हो, और इन दोनोंसे, परे जो अक्षर है, वहभी तुम्हीं हो । | [ गीता ७. २४; ८. २० या १५. १६ से दीख पड़ेगा, कि सत् और असत् | शब्दोंके अर्थ यहाँपर क्रमसे व्यक्त और अव्यक्त अथवा क्षर और अक्षर इन | शब्दोंके अर्थोंके समान हैं । सत् और असत्से परे जो तत्त्व है, वही अक्षर ब्रह्म | है, इसी कारण गीता १३. १२ में स्पष्ट वर्णन है, कि “ मैं न तो सत् हूँ, और | न असत् । ” गीतामें 'अक्षर' शब्द कभी प्रकृतिकेलिये और कभी ब्रह्मके लिये | उपयुक्त होता है । गीता ९. १९; १३. १२; और १५. १६ की टिप्पणी देखो । ] ( ३८ ) तुम आदिदेव, ( तुम ) पुरातन पुरुष, तुम्हीं इस जगत्के परम आधार हो; तुम ज्ञाता और ज्ञेय, तथा तुम श्रेष्ठस्थान हो; और हे अनंतरूप ! तुम्हींने ( इस ) विश्वको विस्तृत अथवा व्याप्त किया है । ( ३९ ) वायु, यम, अग्नि, वरुण, चंद्र, प्रजापति अर्थात् ब्रह्मा, और परदादाभी तुम्हीं हो । तुम्हें हजार बार नमस्कार है ! और फिरभी तुम्हींको नमस्कार है ! | [ ब्रह्मासे मरीचि आदि सात मानसपुत्र उत्पन्न हुए और मरीचिसे | कश्यप, तथा कश्यपसे सब प्रजा उत्पन्न हुई है ( महा. आदि. ६५. ११ ) ; इस- | लिये इन मरीचि आदिकोही प्रजापति कहते हैं ( शां. ३४०. ६५ ) । इसीसे | कोई कोई प्रजापति शब्दका अर्थ काश्यप आदि प्रजापति करते हैं । परंतु यहाँ
७८८ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र नमः पुरस्तादथ पृष्ठतस्ते नमोऽस्तु ते सर्वत एव सर्व । अनन्तवीर्यामितविक्रमस्त्वं सर्वं समाप्नोषि ततोऽसि सर्वः ॥ ४० ॥ सखेति मत्वा प्रसभं यदुक्तं हे कृष्ण हे यादव हे सखेति । अजानता महिमानं तवेदं मया प्रमादात्प्रणयेन वापि ॥ ४१ ॥ यच्चावहासार्थमसत्कृतोऽसि विहारशय्यासनभोजनेषु । एकोऽथवाप्यच्युत तत्समक्षं तत्क्षामये त्वामहमप्रमेयम् ॥ ४२ ॥ पितासि लोकस्य चराचरस्य त्वमस्य पूज्यश्च गुरुर्गरीयान् । न त्वत्समोऽस्त्यभ्यधिकः कुतोऽन्यो लोकत्रयेऽप्यप्रतिमप्रभावः ॥४३ तस्मात्प्रणम्य प्रणिधाय कायं प्रसादये त्वामहमीशमीड्यम् । पितेव पुत्रस्य सखेव सख्युः प्रियः प्रियायार्हसि देव सोढुम् ॥ ४४ ॥ । प्रजापति शब्द एकवचनान्त है, इस कारण प्रजापतिका अर्थ ब्रह्मदेवही अधिक । ग्राह्य दीख पड़ता है। इसके अतिरिक्त ब्रह्मा, मरीचि आदिके पिता अर्थात् सबके । पितामह (दादा) हैं, अतः आगेका 'प्रपितामह' (परदादा) पदभी आप-ही- । आप प्रकट होता है और उसकी सार्थकता व्यक्त हो जाती है।] (४०) हे सर्वात्मक ! तुम्हें सामनेसे नमस्कार है, पीछेसे नमस्कार है और सभी ओरसे तुमको नमस्कार है। तुम्हारा वीर्य अनंत है और तुम्हारा पराक्रम अतुल है। सबका समापन करनेवाले हो, इसलिये तुम्हीं 'सर्व' हो। । [ सामनेसे नमस्कार, पीछेसे नमस्कार, ये शब्द परमेश्वरकी सर्वव्यापकता । दिखलाते हैं। उपनिषदोंमें ब्रह्मका ऐसा वर्णन है, कि "ब्रह्मैवेदं अमृतं पुरस्तात् । ब्रह्म पश्चात् ब्रह्म दक्षिणतश्चोत्तरेण । अधश्चोर्ध्वं च प्रसृतं ब्रह्मैवेदं विश्वमिद् । वरिष्ठम्" (मुं. २. २. २११; छां. ७. २५), उसीके अनुसार भक्ति-मार्गकी यह । नमनात्मक स्तुति है।] (४१) तुम्हारी इस महिमाको बिना जाने, मित्र समझकर प्यारसे या भूलसे, 'अरे कृष्ण', 'ओ यादव' 'हे सखा' इत्यादि जो कुछ मैने अनादरसे कह डाला हो; (४२) और हे अच्युत ! आहार-विहारमें अथवा सोने-बैठनेमें, अकेलेमें या दस मनुष्योंके समक्ष, मैंने हँसी-दिल्लगीमें तुम्हारा जो अपमान किया हो, उसकेलिये मैं तुम अप्रमेय अर्थात् अनंतसे प्रार्थना करता हूँ, कि आप मुझे क्षमा करें। (४३) इस चराचर जगत्के पिता तुम्हीं हो, तुम पूज्य हो, और गुरुकेभी गुरु हो ! त्रैलोक्यभरमें तुम्हारी बराबरीका कोई नहीं है। फिर हे अतुलप्रभाव ! अधिक कहांसे होगा ? (४४) तुम स्तुत्य और समर्थ हो, इसलिये शरीर झुकाकर नमस्कार करके मैं तुमसे प्रार्थना करता हूँ, कि 'प्रसन्न हो जाओ'। जिस प्रकार पिता अपने पुत्रके, अथवा सखा अपने सखाके, अपराध क्षमा करता है, उसी प्रकार हे देव ! प्रेमी
ग्यारहवाँ अध्याय ७८९ अदृष्टपूर्वं हृषितोऽस्मि दृष्ट्वा भयेन च प्रव्यथितं मनो मे । तदेव मे दर्शय देव रूपं प्रसीद देवेश जगन्निवास ॥ ४५ ॥ किरीटिनं गदिनं चक्रहस्तमिच्छामि त्वां द्रष्टुमहं तथैव । तेनैव रूपेण चतुर्भुजेन सहस्रबाहो भव विश्वमूर्ते ॥ ४६ ॥ आपको प्रियके अर्थात् अपने प्रेमपात्रके (अर्थात् मेरे सब) अपराध क्षमा करने चाहिये । | [ कुछ लोग “प्रियः प्रियायार्हसि” इन शब्दोंका “प्रिय पुरुष जिस | प्रकार अपनी प्रिय स्त्रीके' ऐसा अर्थ करते हैं। परंतु हमारे मतमें यह ठीक | नहीं है। क्योंकि व्याकरणकी रीतिसे 'प्रियायार्हसि'के प्रियायाः + अर्हसि अथवा | प्रियायै + अर्हसि ऐसे पद नहीं किये जा सकते, और उपमाद्योतक 'इव' शब्दभी | इस श्लोकमें दो बारही आया है। “अतः प्रियः प्रियायार्हसि” को तीसरी उपमा | न समझकर उपमेय माननाही अधिक प्रशस्त है। 'पुत्रके' (पुत्रस्य), 'सखाके' | (सख्युः), इन दोनों उपमानात्मक षष्ठ्यन्त शब्दोंके समान आदि उपमेयमेंभी | 'प्रियस्य' (प्रियके) यह षष्ठ्यन्त पद होता, तो बहुत अच्छा होता। परंतु अब | 'स्थितस्य गतिश्चिन्तनीया' इस न्यायके अनुसार यहाँ व्यवहार करना चाहिये। | हमारी समझमें यह बात बिलकुल युक्तिसंगत नहीं दीख पड़ती, कि 'प्रियस्य' | इस षष्ठ्यन्त पुलिंग, पदके अभावमें, व्याकरणके विरुद्ध 'प्रियायाः' यह षष्ठ्यन्त | स्त्रीलिंगका पद किया जावे, और जब वह अर्जुनके लिये लागू न हो सके तब, | 'इव' शब्दको अध्याहार मानकर प्रियः प्रियायाः"- प्रेमी अपनी प्यारी स्त्रीके- | ऐसी तीसरी उपमा मानी जावे, और वहभी शृंगारिक अतएव अप्रासंगिक हो। | इसके सिवा एक और बात है, कि पुत्रस्य सख्युः, प्रियायाः, इन तीनों पदोंके | उपमानमें चले जानेसे उपमेयमें षष्ठ्यन्त पद बिलकुलही नहीं रह जाता, और | 'मे' अथवा 'मम' पदका फिरभी अध्याहार करना पड़ता है; एवं इतनी माथा- | पच्ची करनेपर उपमान और उपमेयमें जैसे तैसे विभक्तिकी समता हो गई, | तोभी दोनोंमें लिंगकी विषमताका नया दोष बनाही रहता है। दूसरे पक्षमें - | अर्थात् प्रियाय + अर्हसि ऐसे व्याकरणकी रीतिसे शुद्ध और सरल पद किये जावें, | तो उपमेयमें - जहाँ षष्ठी होनी चाहिये, वहाँ 'प्रियाय' यह चतुर्थी आती है, - | बस; इतनाही दोष रहता है और यह दोषभी विशेष महत्त्वका नहीं है। क्योकि | षष्ठीका अर्थ यहाँ चतुर्थीका-सा है और अन्यत्रभी कई बार ऐसा होता है। पर- | मार्थप्रपा टीकामें इस श्लोकका अर्थ वैसाही है, जैसा कि हमने किया है।] (४५) कभी न देखे हुए रूपको देखकर मुझे हर्ष हुआ है और भयसे मेरा मन व्याकुलभी हो गया है। हे जगन्निवास, देवाधिदेव ! प्रसन्न हो जाओ ! और हे देव ! अपना वह पहलेका स्वरूप दिखलाओ। (४६) मैं पहलेके समानही किरीट और गदा धारण
७९० गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र श्रीभगवानुवाच । मया प्रसन्नेन तवार्जुनेदं रूपं परं दर्शितमात्मयोगात् । तेजोमयं विश्वमनन्तमाद्यं यन्मे त्वदन्येन न दृष्टपूर्वम् ॥ ४७ ॥ न वेदयज्ञाध्ययनैर्न दानैर्न च क्रियाभिर्न तपोभिरुग्रैः । एवंरूपः शक्य अहं नृलोके द्रष्टुं त्वदन्येन कुरुप्रवीर ॥ ४८ ॥ मा ते व्यथा मा च विमूढभावो दृष्ट्वा रूपं घोरमीदृङ्ममेदम् । व्यपेतभीः प्रीतमनाः पुनस्त्वं तदेव मे रूपमिदं प्रपश्य ॥ ४९ ॥ संजय उवाच । इत्यर्जुनं वासुदेवस्तथोक्त्वा स्वकं रूपं दर्शयामास भूयः । आश्वासयामास च भीतमेनं भूत्वा पुनः सौम्यवपुर्महात्मा ॥ ५० ॥ करनेवाले, हाथमें चक्र लिये हुए तुमको देखना चाहता हूँ; (अतएव) हे सहस्रबाहु, विश्वमूर्त्ति ! उसी चतुर्भुज रूपसे प्रकट हो जाओ। श्रीभगवानने कहा :- (४७) हे अर्जुन ! (तुझपर) प्रसन्न होकर यह तेजोमय, अनन, आद्य, और परम विश्वरूप अपनी योग-सामर्थ्यसे मैंने तुझे दिखलाया है; इसे तेरे सिवा और किसीने पहले नहीं देखा है। (४८) हे कुरुवीरश्रेष्ठ ! मनुष्यलोकमें मेरा इस प्रकारका स्वरूप कोईभी वेदसे, यज्ञोंसे, स्वाध्यायसे, दानसे, कर्मोंसे, अथवा उग्र तपसे नहीं देख सकता, कि जिसे तू ने देखा है। (४९) मेरे ऐसे घोर रूपको देखकर अपने चित्तमें व्यथा न होने दे, और मूढभी मत हो जा। डर छोड़कर संतुष्ट मनसे मेरे उसी स्वरूपको फिर देख ले। संजयने कहा :- (५०) इस प्रकार भाषण करके वासुदेवने अर्जुनको फिर अपना (पहलेका) स्वरूप दिखलाया; और फिर सौम्य रूप धारण करके उस महात्माने डरे हुए अर्जुनको धीरज बँधाया। [ गीताके द्वितीय अध्यायके ५ वें से ८ वें, २० वें, २२ वें, २९ वें और ३० वें श्लोक, आठवे अध्यायके ९ वें, १० वें, ११ वें और २८ वें श्लोक, नवें अध्यायके २० और २१ वें श्लोक, पन्द्रहवें अध्यायके २ रे से ५ वें और १५ वें श्लोकका छंद विश्वरूपवर्णनके उक्त ३६ श्लोकोंके छंदके समानही है; अर्थात् इसके प्रत्येक चरणमें ग्यारह अक्षर हैं। परंतु उनमें गणोंका कोई एक नियम नहीं है, इससे कालिदास प्रभृतिके काव्योंके इंद्रवज्रा, उपेंद्रवज्रा, उपजाति, दोधक, शालिनी आदि छंदोंकी चाल पर ये श्लोक नहीं कहे जा सकते। अर्थात् यह वृत्तरचना आर्ष याने वेदसंहिताके त्रिष्टुप् वृत्तके नमूनेपर की गई है; इस
ग्यारहवाँ अध्याय ७९१ अर्जुन उवाच । दृष्ट्वेदं मानुषं रूपं तव सौम्यं जनार्दन । इदानीमस्मि संवृत्तः सचेताः प्रकृतिं गतः ॥ ५१ ॥ श्रीभगवानुवाच । § § सुदुर्दर्शमिदं रूपं दृष्टवानसि यन्मम । देवा अप्यस्य रूपस्य नित्यं दर्शनकांक्षिणः ॥ ५२ ॥ नाहं वेदैर्न तपसा न दानेन न चेज्यया । शक्य एवंविधो द्रष्टुं दृष्टवानसि मां यथा ॥ ५३ ॥ भक्त्या त्वनन्यया शक्य अहमेवंविधोऽर्जुन । ज्ञातुं द्रष्टुं च तत्त्वेन प्रवेष्टुं च परंतप ॥ ५४ ॥ §§ मत्कर्मकृन्मत्परमो मद्भक्तः संगवर्जितः । निर्वैरः सर्वभूतेषु यः स मामेति पाण्डव ॥ ५५ ॥ इति श्रीमद्भगवद्गीतासु उपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे विश्वरूपदर्शनं नाम एकादशोऽध्यायः ॥ ११ ॥ । कारण यह सिद्धान्त औरभी सुदृढ हो जाता है, कि गीता बहुत प्राचीन होगी । । गीतारहस्य परिशिष्ट प्रकरण पृ. ५१७ देखो । ] अर्जुनने कहा :- (५१) हे जनार्दन ! तुम्हारे इस सौम्य और मनुष्यदेहधारी रूपको देखकर अब मन ठिकाने आ गया और मैं पहलेकी भांति सावधान हो गया हूँ । श्रीभगवानने कहा :- (५२) मेरे जिस रूपको तूने देखा है, उसका दर्शन मिलना बहुत कठिन है । देवताभी इस रूपको देखनेकी सदैव इच्छा किये रहते हैं । (५३) जैसा तूने मुझे देखा है, वैसा मुझे वेदोंसे, तपसे, दानसे, अथवा यज्ञसेभी (कोई) देख नहीं सकता । (५४) हे अर्जुन ! केवल अनन्यभक्तिसेही इस प्रकार मेरा ज्ञान होना, मुझे देखना, और हे परंतप ! मुझमें तत्त्वसे प्रवेश करना संभव है । । [ भक्ति करनेसे परमेश्वरका पहले ज्ञान होता है, और फिर अंतमें । परमेश्वरके साथ उसका तादात्म्य हो जाता है; यही सिद्धान्त पहले ४. २९ । श्लोकमें और आगे १८. ५५ श्लोकमें फिर आया है और उसका स्पष्टीकरण । हमने गीतारहस्यके तेरहवें प्रकरणमें ( पृ. ४२८-४२९ ) किया है । अब अर्जुनको । पूरी गीताके अर्थका सार संक्षेपमें बतलाते हैं :- ] (५५) हे पांडव ! जो इस बुद्धिसे कर्म करता है, कि सब कर्म मेरे अर्थात्
७९२ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र परमेश्वरके हैं, जो मत्परायण और संगविरहित है, और जो सब प्राणियोंके विषयमें निर्वैर है, वह मेरा भक्त मुझमें मिल जाता है। । [ उक्त श्लोकका आशय यह है, कि जगत्के सब व्यवहार भगवद्भक्तको । परमेश्वरार्पण-बुद्धिसे करने चाहिये ( ऊपर ३३ वाँ श्लोक देखो )। अर्थात् । उसे सारे व्यवहार इस निरभिमान-बुद्धिसे करने चाहिये, कि जगत्के सभी कर्म । परमेश्वरके हैं और सच्चा कर्ता और करानेवाला वही है; किंतु हमें निमित्त । बनाकर वह ये कर्म हमसे करवा रहा है; ऐसा करनेसे वे कर्म शांति अथवा । मोक्ष-प्राप्तिमें बाधक नहीं होते। शांकरभाष्यमेंभी यही कहा है, कि उक्त श्लोकमें । पूरे गीताशास्त्रका तात्पर्य आ गया है। इससे प्रकट है, कि गीताका भक्ति-मार्ग । यह नहीं कहता, कि आरामसे 'राम राम' जपा करो; प्रत्युत उसका कथन । है, कि उत्कट भक्तिके साथ-ही-साथ उत्साहसे सब निष्काम कर्म करते रहो। । संन्यासमार्गवाले कहते हैं, कि 'निर्वैर'का अर्थ निष्क्रिय है, परंतु वह अर्थ यहाँ । विवक्षित नहीं है, इसी बातको प्रकट करनेके लिये उसके साथ 'मत्कर्मकृत्' । अर्थात् "सब कर्मोंको परमेश्वरके ( अपने नहीं ) समझकर परमेश्वरार्पण-बुद्धिसे । उन्हें करनेवाला" विशेषण लगाया गया है। इस विषयका विस्तृत विचार गीता- । रहस्यके बारहवें प्रकरणमें (पृ. ३९४-४०१) किया है।] इस प्रकार श्रीभगवानके गाये हुए - अर्थात् कहे हुए - उपनिषद्में, ब्रह्म- विद्यान्तर्गत योग - अथवा कर्मयोग - शास्त्रविषयक, श्रीकृष्ण और अर्जुनके संवादमें, विश्वरूपदर्शनयोग नामक ग्यारहवाँ अध्याय समाप्त हुआ।
बारहवाँ अध्याय ७९३ द्वादशोऽध्यायः। अर्जुन उवाच। एवं सततयुक्ता ये भक्तास्त्वां पर्युपासते। ये चाप्यक्षरमव्यक्तं तेषां के योगवित्तमाः ॥ १ ॥ श्रीभगवानुवाच। § § मय्यावेश्य मनो ये मां नित्ययुक्ता उपासते। श्रद्धया परयोपेतास्ते मे युक्ततमा मताः ॥ २ ॥ बारहवाँ अध्याय [ कर्मयोगकी सिद्धिके लिये सातवें अध्यायमें ज्ञान-विज्ञानके निरूपणका आरंभ कर आठवेंमें अक्षर, अनिर्देश्य और अव्यक्त ब्रह्मका स्वरूप बतलाया है; और फिर नवें अध्यायमें भक्तिरूप प्रत्यक्ष राजमार्गके निरूपणका प्रारंभ करके दसवें और ग्यारहवेंमें तदंतर्गत 'विभूतिवर्णन' एवं 'विश्वरूपदर्शन' इन दो उपाख्यानोंका वर्णन किया है, और ग्यारहवें अध्यायके अंतमें साररूपसे अर्जुनको उपदेश किया है, कि भक्तिसे एवं निःसंग-बुद्धिसे समस्त कर्म करते रहो। अब इसपर अर्जुनका प्रश्न है, कि कर्मयोगकी सिद्धिके लिये सातवें और आठवें अध्यायोंमें क्षर-अक्षर- विचारपूर्वक परमेश्वरके अव्यक्त रूपकोही श्रेष्ठ सिद्ध करके अव्यक्तकी अथवा अक्षरकी उपासना (७. १९, २४; ८, २१) बतलाई है, और उपदेश किया है, कि युक्तचित्तसे युद्ध कर (८. ७); एवं नवें अध्यायमें व्यक्त-उपासनारूप प्रत्यक्ष धर्म बतलाकर कहा है, कि परमेश्वरार्पण-बुद्धिसे सभी कर्म करने चाहिये (९. २७, ३४; ११. ५५); तो अब इन दोनोंमें श्रेष्ठ मार्ग कौन-सा है; इस प्रश्नमें व्यक्तोपासनाका अर्थ भक्ति है। परंतु यहाँ भक्तिसे भिन्न भिन्न अनेक उपास्योंका अर्थ विवक्षित नहीं है, उपास्य अथवा प्रतीक कोईभी हो; उसमें एकही सर्वव्यापी परमेश्वरकी भावना रखकर जो भक्ति की जाती है, वही सच्ची व्यक्त उपासना है, और इस अध्यायमें वही उद्दिष्ट है।] अर्जुनने कहा :- (१) इस प्रकार सदा युक्त अर्थात् योगयुक्त हो कर जो भक्त तुम्हारी उपासना करते हैं; और जो अव्यक्त अक्षर अर्थात् ब्रह्मकी उपासना करते हैं, उनमें उत्तम (कर्म-) योगवेत्ता कौन हैं? श्रीभगवानने कहा :- (२) मुझमें मन लगाकर सदा युक्तचित्त हो करके, परम श्रद्धासे जो मेरी उपासना करते हैं, वे मेरे मतमें सबसे उत्तम युक्त अर्थात् योगी
७९४ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र ये त्वक्षरमनिर्देश्यमव्यक्तं पर्युपासते । सर्वत्रगमचिन्त्यं च कूटस्थमचलं ध्रु व म् ॥ ३ ॥ सन्नियम्येन्द्रियग्रामं सर्वत्र समबुद्धयः । ते प्राप्नुवन्ति मामेव सर्वभूतहिते रताः ॥ ४ ॥ क्लेशोऽधिकतरस्तेषामव्यक्तासक्तचेतसाम् । अव्यक्ता हि गतिर्दुःखं देहवद्भिरवाप्यते ॥ ५ ॥ ये तु सर्वाणि कर्माणि मयि संन्यस्य मत्पराः । अनन्येनैव योगेन मां ध्यायन्त उपासते ॥ ६ ॥ तेषामहं समुद्धर्ता मृत्युसंसारसागरात् । भवामि न चिरात्पार्थ मय्यावेशितचेतसाम् ॥ ७ ॥ मय्येव मन आधत्स्व मयि बुद्धिं निवेशय । निवसिष्यसि मय्येव अत ऊर्ध्वं न संशयः ॥ ८ ॥ हैं (३) परंतु जो अनिर्देश्य अर्थात् सबके मूलमें रहनेवाले अचल, प्रत्यक्ष न दिखलाये जानेवाले, अव्यक्त, सर्वव्यापी, अचिंत्य और कूटस्थ अर्थात् नित्य अक्षर अर्थात् ब्रह्मकी उपासना (४) सब इंद्रियोंको रोककर सर्वत्र सम-बुद्धि रखते हुए करते हैं, वे सब भूतोंके हितमें निमग्न (लोगभी) मुझेही पाते हैं; (५) (तथापि) उनका चित्त अव्यक्तमें आसक्त रहनेके कारण उनको अधिक क्लेश होते हैं। क्योंकि (व्यक्त देहधारी मनुष्योंको ) अव्यक्त उपासनाका मार्ग कष्टसे सिद्ध होता है। (६) परंतु जो मुझमें सब कर्मोंका संन्यास अर्थात् अर्पण करके मत्परायण होते हुए अनन्य- योगसे मेरा ध्यान कर मुझे भजते हैं, (७) हे पार्थ ! मुझमें चित्त लगानेवाले उन लोगोंका, मैं इस मृत्युमय संसार-सागरसे बिना विलंब किये, उद्धार कर देता हूँ। (८) (अतएव) मुझमेंही मन लगा, मुझमें बुद्धिको स्थिर कर । जिससे तू आगे निःसंदेह मुझमेंही निवास करेगा । | [ इसमें भक्तिमार्गकी श्रेष्ठताका प्रतिपादन है । दूसरे श्लोकमें पहले | यह सिद्धान्त किया है, कि भगवद्भक्त उत्तम योगी है, फिर तीसरे श्लोकमें | पक्षांतर-बोधक 'तु' अव्ययका प्रयोग कर, उसमें और चौथे श्लोकमें कहा है, कि | अव्यक्तकी उपासना करनेवालेभी मुझेही पाते हैं। परंतु इसके सत्य होनेपर- | भी पांचवें श्लोकमें यह बतलाया है, कि अव्यक्त-उपासकोका मार्ग अधिक | क्लेशदायक होता है; छठे और सातवें श्लोकमें वर्णन किया है, कि अव्यक्तकी | अपेक्षा व्यक्तकी उपासना सुलभ होती है; और अंतमें आठवें श्लोकमें उसके
बारहवाँ अध्याय ७९५ § § अथ चित्तं समाधातुं न शक्नोषि मयि स्थिरम् । अभ्यासयोगेन ततो मामिच्छाप्तुं धनंजय ॥ ९ ॥ अभ्यासेऽप्यसमर्थोऽसि मत्कर्मपरमो भव । मदर्थमपि कर्माणि कुर्वन्सिद्धिमवाप्स्यसि ॥ १० ॥ अथैतदप्यशक्तोऽसि कर्तुं मद्योगमाश्रितः । सर्वकर्मफलत्यागं ततः कुरु यतात्मवान् ॥ ११ ॥ श्रेयो हि ज्ञानमभ्यासाज्ज्ञानाद्ध्यानं विशिष्यते । ध्यानात्कर्मफलत्यागस्त्यागाच्छान्तिरनन्तरम् ॥ १२ ॥ | अनुसार व्यवहार करनेका अर्जुनको उपदेश किया है । सारांश, ग्यारहवें अध्या- | यके अंतमें (गीता ११. ५५) जो उपदेश कर चुके हैं, यहाँ अर्जुनके प्रश्न करनेपर | उसीको दृढ कर दिया है । भक्ति-मार्गमें सुलभता क्या है ? - इसका विस्तारपूर्वक | विचार गीतारहस्यके तेरहवें प्रकरणमें कर चुके हैं, इस कारण यहाँ हम उसकी | पुनरुक्ति नहीं करते । इतनाही कह देते हैं, कि अव्यक्तकी उपासना कष्टमय | होनेपरभी मोक्षदायकही है; और भक्ति-मार्गवालोंको स्मरण रखना चाहिये, | कि भक्ति-मार्गमेंभी कर्मोंको न छोड़कर उन्हेंही ईश्वरार्पणपूर्वक अवश्य करना | पड़ता है। और इसी हेतुसे छठे श्लोकमें ही सब कर्मोंका संन्यास करके 'मुझमें | ये शब्द रखे गये हैं। इसका स्पष्ट अर्थ यह है, कि भक्ति-मार्गमेंभी कर्मोंको | स्वरूपतः न छोड़ें, किंतु परमेश्वरमें उन्हें, अर्थात् उनके फलोंको, अर्पण कर दें। | इससे प्रकट होता है, कि भगवानने इस अध्यायके अंतमें जिस भक्तिमान् | पुरुषको अपना प्यारा बतलाया है, उसेभी इसी अर्थात् निष्काम कर्मयोग-मार्ग- | काही समझना चाहिये, स्वरूपतः कर्म-संन्यासीको नहीं। इस प्रकार भक्ति-मार्गकी | श्रेष्ठता और सुलभता बतला कर अब परमेश्वरकी ऐसी भक्ति करनेके उपाय | अथवा साधन बतलाते हुए उनके तारतम्यकाभी अंतमें स्पष्टीकरण करते हैं :- ] (९) अब (इस प्रकार) मुझमें भली भाँति चित्तको स्थिर करते तुझसे न बन पड़े, तो हे धनंजय ! अभ्यासकी सहायतासे अर्थात् बार-बार प्रयत्न करके मेरी प्राप्ति कर लेनेकी आशा रख । (१०) यदि अभ्यास करनेमेंभी तू असमर्थ हो, तो मदर्थ अर्थात् मेरी प्राप्तिके अर्थ (शास्त्रोंमें बतलाये हुए ज्ञान-ध्यान-भजन-पूजा- पाठ आदि) कर्म करता जा; मदर्थ (ये) कर्म करनेसेभी तू सिद्धि पावेगा । (११) परंतु यदि इसके करनेमेंभी तू असमर्थ हो, तो मद्योग अर्थात् मदर्पणपूर्वक योग, याने कर्मयोगका आश्रय करके यतात्मा होकर अर्थात् धीरे धीरे चित्तको रोकता हुआ, (अंतमें) सब कर्मोंके फलोंका त्याग कर दे । (१२) क्योंकि अभ्यासकी अपेक्षा ज्ञान