भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

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७५६ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र उच्चैःश्रवसमश्वानां विद्धि माममृतोद्भवम् । ऐरावतं गजेन्द्राणां नराणां च नराधिपम् ॥ २७ ॥ आयुधानामहं वज्रं धेनूनामस्मि कामधुक् । प्रजनश्चास्मि कन्दर्पः सर्पाणामस्मि वासुकिः ॥ २८ ॥ अनन्तश्चास्मि नागानां वरुणो यादसामहम् । पितॄणामर्यमा चास्मि यमः संयमतामहम् ॥ २९ ॥ प्रह्लादश्चास्मि दैत्यानां कालः कलयतामहम् । मृगाणां च मृगेन्द्रोऽहं वैनतेयश्च पक्षिणाम् ॥ ३० ॥ पवनः पवतामस्मि रामः शस्त्रभृतामहम् । झषाणां मकरश्चास्मि स्रोतसामस्मि जाह्नवी ॥ ३१ ॥ चित्ररथ, और सिद्धोंमें कपिल मुनि हूँ । (२७) घोड़ोंमें, अमृतमंथनके समय निकला हुआ, उच्चैःश्रवा मुझे समझ । मैं गजेंद्रोंमें ऐरावत, और मनुष्योंमें राजा हूँ । (२८) मैं आयुधोंमें वज्र, गौओमें कामधेनु, और प्रजा उत्पन्न करनेवाला काम हूँ; सर्पोंमें वासुकि मैं हूँ । (२९) नागोंमें अनंत मैं हूँ; यादस् अर्थात् जलचर प्राणियोंमें वरुण, और पितरोंमें अर्यमा मैं हूँ; मैं नियमन करनेवालोंमें यम हूँ । | [ वासुकि = सर्पोंका राजा और अनंत = 'शेष' ये अर्थ निश्चित हैं, और | अमरकोश तथा महाभारतमेंभी ये अर्थ दिये गये हैं (महा. आदि. ३५-३९ | ३९) । परंतु निश्चयपूर्वक नहीं बतलाया जा सकता, कि नाग और सर्पमें क्या | भेद है । महाभारतके अस्ति-उपाख्यानमें इन शब्दोंका प्रयोग समानार्थकही | है : तथापि जान पड़ता है, कि यहांपर सर्प और नग शब्दोंसे सर्पके साधारण | वर्गकी दो भिन्न-भिन्न जातियां विवक्षित हैं । श्रीधर-टीकामें सर्पको विषैला और | नागको विषहीन कहा है, एवं रामानुज-भाष्यमें सर्पको एक सिरवाला और | नागको अनेक सिरोंवाला कहा है । परंतु ये दोनों भेद ठीक नहीं जँचते । क्योंकि | कुछ स्थलोंपर नागोंकेही प्रमुख कुल बतलाते हुए उनमें अनंत और वासुकीको | पहले गिनाया है; और वर्णन किया है, कि दोनोंभी अनेक सिरोंवाले एवं | विषधर हैं, किंतु अनंत है अग्निवर्णका और वासुकि. है पीला ।। भागवतका | पाठ गीताके समानही है । ] (३०) दैत्योंमें प्रल्हाद मैं हूँ; मैं ग्रसनेवालोंमें काल, पशुओंमें मृगेन्द्र अर्थात् सिंह, और पक्षियोंमें गरुड हूँ । (३१) मैं वेगवानांमे वायु हूँ; मैं शस्त्रधारियोंमें राम, मछलियोंमें मगर, और नदियोंमें भागीरथी हूँ ।