भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

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पृष्ठ 822

दसवाँ अध्याय ७७७ सर्गाणामादिरन्तश्च मध्यं चैवाहमर्जुन । अध्यात्मविद्या विद्यानां वादः प्रवदतामहम् ॥ ३२ ॥ अक्षराणामकारोऽस्मि द्वन्द्वः सामासिकस्य च । अहमेवाक्षयः कालो धाताऽहं विश्वतोमुखः ॥ ३३ ॥ मृत्युः सर्वहरश्चाहमुद्भवश्च भविष्यताम् । कीर्तिः श्रीर्वाक्च नारीणां स्मृतिर्मेधा धृतिः क्षमा ॥ ३४ ॥ बृहत्साम तथा साम्नां गायत्री छन्दसामहम् । मासानां मार्गशीर्षोऽहमृतूनां कुसुमाकरः ॥ ३५ ॥ (३२) हे अर्जुन ! सृष्टिमात्रका आदि, अन्त और मध्यभी मैं हूँ; विद्याओंमें अध्यात्मविद्या, और वाद करनेवालोंका वाद मैं हूँ। । [ पीछे २० वें श्लोकमें बतला दिया है, कि सचेतन भूतोंका आदि, मध्य । और अंत मैं हूँ; तथा अब कहते हैं, कि सब चराचर सृष्टिका आदि, मध्य और । अंत मैं हूँ; यही भेद है । ] (३३) मैं अक्षरोंमें अकार, और समासोंमें (उभयपदप्रधान) द्वंद्व हूँ; (निमेष, मुहूर्त आदि) अक्षय काल मैंही हूँ और सर्वतोमुख अर्थात् चारों ओरसे मुखोंवाला धाता याने ब्रह्मा मैं हूँ; (३४) सबको क्षय करनेवाली मृत्यु, और आगे जन्म लेनेवालोंका उत्पत्तिस्थान मैं हूँ; स्त्रियोंमें कीर्ति, श्री और वाणी, स्मृति, मेधा, धृति, तथा क्षमा मैं हूँ। । [ कीर्ति, श्री, वाणी इत्यादि शब्दोंसेही देवियाँ, विवक्षित हैं। महाभारतमें । (आदि. ६६. १३, १४) वर्णन है, कि इनमेंसे वाणी और क्षमाको छोड़ । शेष पाँच और दूसरी पाँच (पुष्टि, श्रद्धा, क्रिया, लज्जा और मति) दोनों । मिलकर कुल दशों दक्षकी कन्याएँ हैं, और धर्मके साथ ब्याही जानेके कारण । उन्हें धर्मपत्नी कहते हैं।] (३५) साम अर्थात् गानेके योग्य वैदिक स्तोत्रोंमें बृहत्साम, (और) छंदोंमें गायत्री छंद मैं हूँ; महीनोंमें मार्गशीर्ष और ऋतुओंमें वसंत मैं हूँ। । [महीनोंमें मार्गशीर्षको प्रथम स्थान इसलिये दिया गया है, कि उन । दिनोंमें बारह महीनोंको मार्गशीर्षसेही गिननेकी रीति थी। जैसे कि आजकल । चैत्रसे है (मभा. अनु. १०६, १०९; एवं वाल्मीकिरामायण ३. १६) । । भागवत ११. १६. २७ मेंभी ऐसाही उल्लेख है। हमने अपने 'ओरायन' ग्रंथमें । लिखा है, कि मृगशीर्ष नक्षत्रको अग्रहायणी अथवा वर्षारंभका नक्षत्र कहते थे; । जब मृगादि नक्षत्रगणनाका प्रचार था, तब मृगनक्षत्रको प्रथम अग्रस्थान मिला।