भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

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७७८ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र द्यूतं छलयतामस्मि तेजस्तेजस्विनामहम् । जयोऽस्मि व्यवसायोऽस्मि सत्त्वं सत्त्ववतामहम् ॥ ३६ ॥ वृष्णीनां वासुदेवोऽस्मि पाण्डवानां धनंजयः । मुनीनामप्यहं व्यासः कवीनामुशना कविः ॥ ३७ ॥ दण्डो दमयतामस्मि नीतिरस्मि जिगीषताम् । मौनं चैवास्मि गुह्यानां ज्ञानं ज्ञानवतामहम् ॥ ३८ ॥ यच्चापि सर्वभूतानां बीजं तदहमर्जुन । न तदस्ति विना यत्स्यान्मया भूतं चराचरम् ॥ ३९ ॥ नान्तोऽस्ति मम दिव्यानां विभूतीनां परंतप । एष तूद्देशतः प्रोक्तो विभूतेर्विस्तरो मया ॥ ४० ॥ § § यद्यद्विभूतिमत्सत्त्वं श्रीमदूर्जितमेव वा । तत्तदेवावगच्छ त्वं मम तेजोंऽशसम्भवम् ॥ ४१ ॥ अथवा बहुनैतेन किं ज्ञातेन तवार्जुन । विष्टभ्याहमिदं कृत्स्नमेकांशेन स्थितो जगत् ॥ ४२ ॥ इति श्रीमद्भगवद्गीतासु उपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुन-संवादे विभूतियोगो नाम दशमोऽध्यायः ॥१०॥ । और उसीसे आगे मार्गशीर्ष महीनेकोभी श्रेष्ठता मिली होगी । इस विषयको । यहाँ विस्तारके भयसे अधिक बढ़ाना उचित नहीं है । ] ( ३६ ) मैं छलियोँका द्यूत हूँ; तेजस्वियोंका तेज, ( विजयशाली पुरुषोंकी ) विजय, ( निश्चयी पुरुषोंका ) निश्चय और, सत्त्वशीलोंका सत्त्व मैं हूँ । ( ३७ ) मैं यादवोंमें वासुदेव, पांडवोंमें धनंजय, मुनियोंमें व्यास, और कवियोंमें शुक्राचार्य कवि हूँ । ( ३८ ) मैं शासन करनेवालोंका दंड, जयकी इच्छा करनेवालोंकी नीति, और गुह्योंमें मौनभी हूँ । ज्ञानियोंका ज्ञान मैं हूँ । ( ३९ ) इसी प्रकार हे अर्जुन ! सब भूतोंका जो कुछ बीज है, वह मैं हूँ; ऐसा कोई चर-अचर भूत नहीं है, जो मुझे छोड़े हो । ( ४० ) हे परंतप ! मेरी दिव्य विभूतियोंका अंत नहीं है । विभूतियोंका यह विस्तार मैने ( केवल ) दिग्दर्शनार्थ बतलाया है । । [ इस प्रकार मुख्य मुख्य विभूतियाँ बतलाकर, अब इस प्रकरणका । उपसंहार करते हैं :- ] ( ४१ ) जो जो वस्तु वैभव, लक्ष्मी, या प्रभावसे युक्त है, उसको तू मेरे तेजके अंशसे उपजी हुई समझ । ( ४२ ) अथवा हे अर्जुन ! तुझे इस सबको