श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंदसवाँ अध्याय ७७९ जानकर करना क्या है ? ( संक्षेपमें बतलाये देता हूँ, कि ) मैं अपने एक ( ही ) अंशसे इस सारे जगतको व्याप्त कर रहा हूँ। | [ अंतका श्लोक पुरुषसूक्तकी इस ऋचाके आधारपर कहा गया है - | “ पादोऽस्य विश्वा भूतानि त्रिपादस्यामृतं दिवि ” ( ऋ. १०. ९०. ३ ) ; | और यह मंत्र छांदोग्य उपनिषदमेंभी ( छां. ३, १२. ६ ) है । 'अंश' शब्दके | अर्थका स्पष्टीकरण गीतारहस्यके नवें प्रकरणके अंतमें ( पृ. २४७, २४८ ) | किया गया है। प्रकट है, कि जब भगवान् अपने एकही अंशसे इस जगतमें व्याप्त | हो गये हैं, तब इसकी अपेक्षा भगवानकी पूरी महिमा बहुतही अधिक होगी ; | और उसे बतलानेके हेतुसेही अंतिम श्लोक कहा गया है। पुरुषसूक्तमें तो | स्पष्टही कह दिया है, कि “ एतावान् अस्य महिमाऽतो ज्यायांश्च पूरुषः ” | इतनी इसकी वह महिमा हुई, पुरुष तो इसकी अपेक्षा कहीं श्रेष्ठ है । ] इस प्रकार श्रीभगवानके गाये हुए - अर्थात् कहे हुए - उपनिषदमें, ब्रह्म- विद्यान्तर्गत योग अर्थात् कर्मयोगशास्त्रविषयक, श्रीकृष्ण और अर्जुनके संवादमें, विभूतियोग नामक दसवाँ अध्याय समाप्त हुआ ।