भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

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पृष्ठ 825

७८० गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र एकादशोऽध्यायः। अर्जुन उवाच । मदनुग्रहाय परमं गुह्यमध्यात्मसंज्ञितम् । यत्त्वयोक्तं वचस्तेन मोहोऽयं विगतो मम ॥ १ ॥ भवाप्ययौ हि भूतानां श्रुतौ विस्तरशो मया । त्वत्तः कमलपत्राक्ष माहात्म्यमपि चाव्ययम् ॥ २ ॥ एवमेतद्यथात्थ त्वमात्मानं परमेश्वर । द्रष्टुमिच्छामि ते रूपमैश्वरं पुरुषोत्तम ॥ ३ ॥ मन्यसे यदि तच्छक्यं मया द्रष्टुमिति प्रभो । योगेश्वर ततो मे त्वं दर्शयात्मानमव्ययम् ॥ ४ ॥ ग्यारहवाँ अध्याय [ जब पिछले अध्यायमें भगवानने अपनी विभूतियोंका वर्णन किया, तब उसे सुनकर अर्जुनको परमेश्वरका वह विश्वरूप देखनेकी इच्छा हुई । भगवानने उसे जिस विश्वरूपका दर्शन कराया, उसका वर्णन इस अध्यायमें है। यह वर्णन इतना सरस है, कि गीताके उत्तम भागोंमें इसकी गिनती होती है और अन्यान्य गीताओंकी रचना करनेवालोंने इसीका अनुकरण किया है। अर्जुन प्रथम पूछता है, कि :- ] अर्जुनने कहा :-( १ ) मुझपर अनुग्रह करनेके लिये तुमने अध्यात्मसंज्ञक जो परम गुप्त बात बतलायी, उससे मेरा यह मोह जाता रहा । ( २ ) इसी प्रकार हे कमलपत्राक्ष ! भूतोंकी उत्पत्ति, लय और, ( तुम्हारा ) अक्षय माहात्म्यभी मैंने तुमसे विस्तारसहित सुन लिया । ( ३ ) अब, हे परमेश्वर ! तुमने अपना जैसा वर्णन किया है, हे पुरुषोत्तम ! मैं तुम्हारे उस प्रकारके ईश्वरी स्वरूपको ( प्रत्यक्ष ) देखना चाहता हूँ । ( ४ ) हे प्रभो ! यदि तुम समझते हो, कि उस प्रकारका रूप मैं देख सकता हूँ, तो हे योगेश्वर ! तुम अपना अव्यय स्वरूप मुझे दिखलाओ ! [ सातवें अध्यायमें ज्ञानविज्ञानके निरूपण आरंभकर सातवें और आठवेंमें परमेश्वरके अक्षर अथवा अव्यक्त रूपका, तथा नवें एवं दसवेंमें अनेक व्यक्त रूपोंका जो ज्ञान बतलाया है, उसीही अर्जुनने पहले श्लोकमें 'अध्यात्म' कहा है । एक अव्यक्तसे अनेक व्यक्त पदार्थोंके निर्मित होनेका जो वर्णन सातवें ( ७. ४-१२ ), आठवें ( ८. १६-२१ ), और नवें ( ९. ४-८ ) अध्यायोंमें