भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

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पृष्ठ 820

दसवाँ अध्याय ७७५ रुद्राणां शंकरश्चास्मि वित्तेशो यक्षरक्षसाम् । वसूनां पावकश्चास्मि मेरुः शिखरिणामहम् ॥ २३ ॥ पुरोधसां च मुख्यं मां विद्धि पार्थ बृहस्पतिम् । सेनानीनामहं स्कन्दः सरसामस्मि सागरः ॥ २४ ॥ महर्षीणां भृगुरहं गिरामस्म्येकमक्षरम् । यज्ञानां जपयज्ञोऽस्मि स्थावराणां हिमालयः ॥ २५ ॥ अश्वत्थः सर्ववृक्षाणां देवर्षीणां च नारदः । गन्धर्वाणां चित्ररथः सिद्धानां कपिलो मुनिः ॥ २६ ॥ | उपपत्ति लगानेके लिये इतनी दूर जानेकी आवश्यकता नहीं है। भक्ति-मार्गमें | परमेश्वरकी गानयुक्त स्तुतिको सदैव प्रधानता दी जाती है। उदाहरणार्थ | नारायणीय धर्ममें नारदने भगवान्‌का वर्णन किया है, कि "वेदेषु सपुराणेषु | सांगोपांगेषु गीयसे" (मभा. शां. ३३४. २३), और वसु राजा ‘ ‘जप्यं | जगौ” - जप्य गाता था (शां. ३३७. २७;, ३४२. ७०, ८१)- इस प्रकार 'गै' | धातुकाही प्रयोग फिर किया गया है। अतएव भक्ति-प्रधान धर्ममें, यज्ञयाग आदि | क्रियात्मक वेदोंकी अपेक्षा, गान-प्रधान वेद अर्थात् सामवेदको अधिक महत्त्व | दिया गया हो, तो उसमें कोई आश्चर्य नहीं; और “मैं वेदोंमें सामवेद हूँ” | इस कथनका हमारे मतमें सीधा और सहज कारण यही है।] (२३) (ग्यारह) रुद्रोंमें शंकर मैं हूँ; यक्ष और राक्षसोंमें कुबेर मैं हूँ; (आठ) वसुओंमें पावक मैं हूँ; (और सात) पर्वतोंमें मेरु मैं हूँ। (२४) हे पार्थ! पुरोहितोंमें मुख्य, बृहस्पति मुझको समझ। मैं सेनानायकोंमें स्कंद (कार्तिकेय), और जलाशयोंमें समुद्र हूँ। (२५) महर्षियोंमें भृगु हूँ; वाणीमें एकाक्षर अर्थात् ॐकार मैं हूँ। यज्ञोंमें जप-यज्ञ मैं हूँ; स्थावर अर्थात् स्थिर पदार्थोंमें हिमालय मैं हूँ। | [ 'यज्ञोंमें जप-यज्ञ मैं हूँ' यह वाक्य महत्त्वका है। अनुगीतामें (मभा. | अश्व. ४४. ८) कहा है, कि “यज्ञानां हुतमुत्तमम्” अर्थात् यज्ञोंमें (अग्निमें) | हवि समर्पण करके सिद्ध होनेवाला यज्ञ उत्तम है; और वैदिक कर्मकांडवालोंका | वही मत है। पर भक्ति-मार्गमें हविर्यज्ञकी अपेक्षा नाम-यज्ञ या जप-यज्ञका | विशेष महत्त्व है, इसीसे गीतामें “यज्ञानां जपयज्ञोऽस्मि" कहा है। मनुनेभी | एक स्थानपर (मनु. २.८७) कहा है, कि “और कुछ करे या न करे, | केवल जपसेही ब्राह्मण सिद्धि पाता है।" भागवतमें "यज्ञानां ब्रह्मयज्ञोऽहं" | पाठ है।] (२६) मैं सब वृक्षोंमें अश्वत्थ अर्थात् पीपल, और देवर्षियोंमें मैं नारद हूँ; गंधर्वोंमें