भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

पृष्ठ 833, कुल 956 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 833

७८८ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र नमः पुरस्तादथ पृष्ठतस्ते नमोऽस्तु ते सर्वत एव सर्व । अनन्तवीर्यामितविक्रमस्त्वं सर्वं समाप्नोषि ततोऽसि सर्वः ॥ ४० ॥ सखेति मत्वा प्रसभं यदुक्तं हे कृष्ण हे यादव हे सखेति । अजानता महिमानं तवेदं मया प्रमादात्प्रणयेन वापि ॥ ४१ ॥ यच्चावहासार्थमसत्कृतोऽसि विहारशय्यासनभोजनेषु । एकोऽथवाप्यच्युत तत्समक्षं तत्क्षामये त्वामहमप्रमेयम् ॥ ४२ ॥ पितासि लोकस्य चराचरस्य त्वमस्य पूज्यश्च गुरुर्गरीयान् । न त्वत्समोऽस्त्यभ्यधिकः कुतोऽन्यो लोकत्रयेऽप्यप्रतिमप्रभावः ॥४३ तस्मात्प्रणम्य प्रणिधाय कायं प्रसादये त्वामहमीशमीड्यम् । पितेव पुत्रस्य सखेव सख्युः प्रियः प्रियायार्हसि देव सोढुम् ॥ ४४ ॥ । प्रजापति शब्द एकवचनान्त है, इस कारण प्रजापतिका अर्थ ब्रह्मदेवही अधिक । ग्राह्य दीख पड़ता है। इसके अतिरिक्त ब्रह्मा, मरीचि आदिके पिता अर्थात् सबके । पितामह (दादा) हैं, अतः आगेका 'प्रपितामह' (परदादा) पदभी आप-ही- । आप प्रकट होता है और उसकी सार्थकता व्यक्त हो जाती है।] (४०) हे सर्वात्मक ! तुम्हें सामनेसे नमस्कार है, पीछेसे नमस्कार है और सभी ओरसे तुमको नमस्कार है। तुम्हारा वीर्य अनंत है और तुम्हारा पराक्रम अतुल है। सबका समापन करनेवाले हो, इसलिये तुम्हीं 'सर्व' हो। । [ सामनेसे नमस्कार, पीछेसे नमस्कार, ये शब्द परमेश्वरकी सर्वव्यापकता । दिखलाते हैं। उपनिषदोंमें ब्रह्मका ऐसा वर्णन है, कि "ब्रह्मैवेदं अमृतं पुरस्तात् । ब्रह्म पश्चात् ब्रह्म दक्षिणतश्चोत्तरेण । अधश्चोर्ध्वं च प्रसृतं ब्रह्मैवेदं विश्वमिद् । वरिष्ठम्" (मुं. २. २. २११; छां. ७. २५), उसीके अनुसार भक्ति-मार्गकी यह । नमनात्मक स्तुति है।] (४१) तुम्हारी इस महिमाको बिना जाने, मित्र समझकर प्यारसे या भूलसे, 'अरे कृष्ण', 'ओ यादव' 'हे सखा' इत्यादि जो कुछ मैने अनादरसे कह डाला हो; (४२) और हे अच्युत ! आहार-विहारमें अथवा सोने-बैठनेमें, अकेलेमें या दस मनुष्योंके समक्ष, मैंने हँसी-दिल्लगीमें तुम्हारा जो अपमान किया हो, उसकेलिये मैं तुम अप्रमेय अर्थात् अनंतसे प्रार्थना करता हूँ, कि आप मुझे क्षमा करें। (४३) इस चराचर जगत्के पिता तुम्हीं हो, तुम पूज्य हो, और गुरुकेभी गुरु हो ! त्रैलोक्यभरमें तुम्हारी बराबरीका कोई नहीं है। फिर हे अतुलप्रभाव ! अधिक कहांसे होगा ? (४४) तुम स्तुत्य और समर्थ हो, इसलिये शरीर झुकाकर नमस्कार करके मैं तुमसे प्रार्थना करता हूँ, कि 'प्रसन्न हो जाओ'। जिस प्रकार पिता अपने पुत्रके, अथवा सखा अपने सखाके, अपराध क्षमा करता है, उसी प्रकार हे देव ! प्रेमी