भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

पृष्ठ 832, कुल 956 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 832

ग्यारहवाँ अध्याय ७८७ अर्जुन उवाच । स्थाने हृषीकेश तव प्रकीर्त्या जगत्प्रहृष्यत्यनुरज्यते च । रक्षांसि भीतानि दिशो द्रवन्ति सर्वे नमस्यन्ति च सिद्धसंघाः ॥ ३६ ॥ कस्माच्च ते न नमेरन्महात्मन् गरीयसे ब्रह्मणोऽप्यादिकर्त्रे । अनन्त देवेश जगन्निवास त्वमक्षरं सदसत्तत्परं यत् ॥ ३७ ॥ त्वमादिदेवः पुरुषः पुराणस्त्वमस्य विश्वस्य परं निधानम् । वेत्ताऽसि वेद्यं च परं च धाम त्वया ततं विश्वमनन्तरूप ॥ ३८ ॥ वायुर्यमोऽग्निर्वरुणः शशांक प्रजापतिस्त्वं प्रपितामहश्च । नमो नमस्तेऽस्तु सहस्रकृत्वः पुनश्च भूयोऽपि नमो नमस्ते ॥ ३९ ॥ नम्र होकर फिर कहा -- अर्जुनने कहा :- ( ३६ ) हे हृषीकेश ! ( सब ) जगत् तुम्हारे ( गुण-) कीर्तनसे प्रसन्न होता है, और ( उसमें ) अनुरक्त रहता है, राक्षस तुमसे डरकर ( दशों ) दिशाओंमें भाग जाते हैं, और सिद्ध पुरुषोंके संघ तुम्हींको नमस्कार करते हैं, यह ( सब ) उचितही है । ( ३७ ) हे महात्मन् ! तुम ब्रह्म- देवकेभी आदिकारण और उससेभी श्रेष्ठ हो, तुम्हारी वंदना वे कैसे न करेंगे ? हे अनंत ! हे देव देव ! हे जगन्निवास ! सत् और असत् तुम्हीं हो, और इन दोनोंसे, परे जो अक्षर है, वहभी तुम्हीं हो । | [ गीता ७. २४; ८. २० या १५. १६ से दीख पड़ेगा, कि सत् और असत् | शब्दोंके अर्थ यहाँपर क्रमसे व्यक्त और अव्यक्त अथवा क्षर और अक्षर इन | शब्दोंके अर्थोंके समान हैं । सत् और असत्‌से परे जो तत्त्व है, वही अक्षर ब्रह्म | है, इसी कारण गीता १३. १२ में स्पष्ट वर्णन है, कि “ मैं न तो सत् हूँ, और | न असत् । ” गीतामें 'अक्षर' शब्द कभी प्रकृतिकेलिये और कभी ब्रह्मके लिये | उपयुक्त होता है । गीता ९. १९; १३. १२; और १५. १६ की टिप्पणी देखो । ] ( ३८ ) तुम आदिदेव, ( तुम ) पुरातन पुरुष, तुम्हीं इस जगत्‌के परम आधार हो; तुम ज्ञाता और ज्ञेय, तथा तुम श्रेष्ठस्थान हो; और हे अनंतरूप ! तुम्हींने ( इस ) विश्वको विस्तृत अथवा व्याप्त किया है । ( ३९ ) वायु, यम, अग्नि, वरुण, चंद्र, प्रजापति अर्थात् ब्रह्मा, और परदादाभी तुम्हीं हो । तुम्हें हजार बार नमस्कार है ! और फिरभी तुम्हींको नमस्कार है ! | [ ब्रह्मासे मरीचि आदि सात मानसपुत्र उत्पन्न हुए और मरीचिसे | कश्यप, तथा कश्यपसे सब प्रजा उत्पन्न हुई है ( महा. आदि. ६५. ११ ) ; इस- | लिये इन मरीचि आदिकोही प्रजापति कहते हैं ( शां. ३४०. ६५ ) । इसीसे | कोई कोई प्रजापति शब्दका अर्थ काश्यप आदि प्रजापति करते हैं । परंतु यहाँ