भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

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७८६ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र श्रीभगवानुवाच । §§ कालोऽस्मि लोकक्षयकृत्प्रवृद्धो लोकान्समाहर्तुमिह प्रवृत्तः । ऋतेऽपि त्वां न भविष्यन्ति सर्वे येऽवस्थिताः प्रत्यनीकेषु योधाः ॥ ३२ ॥ तस्मात्त्वमुत्तिष्ठ यशो लभस्व जित्वा शत्रून्भुंक्ष्व राज्यं समृद्धम् । मयैवैते निहताः पूर्वमेव निमित्तमात्रं भव सव्यसाचिन् ॥ ३३ ॥ द्रोणं च भीष्मं च जयद्रथं च कर्णं तथान्यानपि योधवीरान् । मया हतांस्त्वं जहि मा व्यथिष्ठा युध्यस्व जेतासि रणे सपत्नान् ॥ ३४ ॥ संजय उवाच । §§ एतच्छ्रुत्वा वचनं केशवस्य कृतांजलिर्वेपमानः किरीटी । नमस्कृत्वा भूय एवाह कृष्णं सगद्गदं भीतभीतः प्रणम्य ॥ ३५ ॥ हूँ ! प्रसन्न हो जाओ ! मैं जानना चाहता हूँ, कि तुम आदि पुरुष कौन हो ? क्योंकि मैं तुम्हारी इस करनीको ( बिलकुल ) नहीं जानता । श्रीभगवानने कहा :- ( ३२ ) मैं लोकोंका क्षय करनेवाला और बढ़ा हुआ 'काल' हूँ; लोगोंका संहार करने यहाँ आया हूँ । तू न हो, तोभी, अर्थात् तू कुछ करे, तोभी, सेनाओंमें खड़े हुए ये सब योद्धा नष्ट होनेवाले (मरनेवाले) हैं; (३३) अतएव तू उठ, यश प्राप्त कर, और शत्रुओंको जीत करके समृद्ध राज्यका उपभोग कर । मैंने उन्हें पहलेही मार डाला है; ( इसलिये अब ) हे सव्यसाची (अर्जुन) ! तू केवल निमित्तके लिये ( आगे ) हो ! ( ३४ ) मैं द्रोण, भीष्म, जयद्रथ और कर्ण तथा ऐसेही अन्यान्य वीर योद्धाओंको ( पहलेही ) मार चुका हूँ; उन्हें तू मार । घबड़ाना नहीं ! युद्ध कर ! युद्धमें तू शत्रुओंको जीतेगा । | [ सारांश, जब श्रीकृष्ण संधिके लिये गये थे, तब दुर्योधनको मेलकी | कोईभी बात सुनते न देख भीष्मने श्रीकृष्णसे केवल शब्दोंमें कहा था, कि | 'कालपक्वमिदं मन्ये सर्वं क्षत्रं जनार्दन' ( सभा. उ. १२७. ३२ ) - ये सब | क्षत्रिय कालपक्व हो गये हैं; उसी कथनका यह प्रत्यक्ष दृश्य श्रीकृष्णने अपने | विश्वरूपसे अर्जुनको दिखला दिया है ( ऊपरके २६-३१ श्लोक देखो ) कर्म- | विपाक-प्रक्रियाका यह सिद्धान्तभी ३३वें श्लोकमें आ गया है, कि दुष्ट मनुष्य | अपने कर्मोसेही मरते हैं, उनको मारनेवाला तो सिर्फ निमित्त है, इसलिये | मारनेवालेको उसका दोष नहीं लगता । ] संजयने कहा :- ( ३५ ) केशवके इस भाषणको सुनकर अर्जुन अन्यन्त भय- भीत हो गया, गला रुँधकर, काँपते हुए, हाथ जोड़ नमस्कार करके उसने श्रीकृष्णसे