भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

पृष्ठ 830, कुल 956 में से

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पृष्ठ 830

ग्यारहवाँ अध्याय ७८५ दंष्ट्राकरालानि च ते मुखानि दृष्ट्वैव कालानलसन्निभानि । दिशो न जाने न लभे च शर्म प्रसीद देवेश जगन्निवास ॥ २५ ॥ अमी च त्वां धृतराष्ट्रस्य पुत्राः सर्वे सहैवावनिपालसंघैः । भीष्मो द्रोणः सूतपुत्रस्तथासौ सहास्मदीयैरपि योधमुख्यैः ॥ २६ ॥ वक्त्राणि ते त्वरमाणा विशन्ति दंष्ट्राकरालानि भयानकानि । केचिद्विलग्ना दशनान्तरेषु सन्दृश्यन्ते चूर्णितैरुत्तमाङ्गैः ॥ २७ ॥ यथा नदीनां बहवोऽम्बुवेगाः समुद्रमेवाभिमुखा द्रवन्ति । तथा तवामी नरलोकवीरा विशन्ति वक्त्राण्यभिविज्वलन्ति ॥ २८ ॥ यथा प्रदीप्तं ज्वलनं पतंगा विशन्ति नाशाय समृद्धवेगाः । तथैव नाशाय विशन्ति लोकास्तवापि वक्त्राणि समृद्धवेगाः ॥ २९ ॥ लेलिह्यसे ग्रसमानः समन्ताल्लोकान्समग्रान्वदनैर्ज्वलद्भिः । तेजोभिरापूर्य जगत्समग्रं भासस्तवोग्राः प्रतपन्ति विष्णो ॥ ३० ॥ आख्याहि मे को भवानुग्ररूपो नमोऽस्तु ते देववर प्रसीद । विज्ञातुमिच्छामि भवन्तमाद्यं न हि प्रजानामि तव प्रवृत्तिम् ॥ ३१ ॥ विष्णो ! मेरा धीरज छूट गया और शांतिभी जाती रही ! ( २५ ) और यह अवस्था हुई है, कि दाढ़ोंसे विकराल तथा प्रलयकालीन अग्नीके समान तुम्हारे ( इन ) मुखोंको देखतेही मुझे दिशाएँ नहीं सूझतीं, और समाधानभी नहीं होता । हे जगन्निवास, देवाधिदेव ! ! प्रसन्न हो जाओ ( २६ ) यह देखो, राजाओंके झुंडसमेत धृतराष्ट्रके सब पुत्र, भीष्म, द्रोण और वह सूतपुत्र ( कर्ण ), हमारी ओरकेभी मुख्य मुख्य योद्धाओंके साथ, ( २७ ) तुम्हारी विकराल दाढ़ोंवाले इन अनेक भयंकर मुखोंमें धड़ाधड़ घुस रहे हैं; और कुछ लोग तो दांतोंमें दबकर ऐसे दिखाई दे रहे हैं, कि उनकी खोपड़ियाँ चूर हुई हैं। ( २८ ) तुम्हारे अनेक प्रज्वलित मुखोंमें मनुष्यलोकके ये वीर वैसेही घुस रहे हैं, जैसे कि नदियोंके बड़े बड़े प्रवाह समुद्रकीही ओर चले जाते हैं। ( २९ ) जलती हुई अग्निमें मरनेके लिये पतंग जिस प्रकार बड़े वेगसे कूदते हैं, वैसेही तुम्हारे- भी अनेक जबड़ोंमें मरनेके लिये ( ये ) लोग बड़े वेगसे प्रवेश कर रहे हैं। ( ३० ) हे विष्णो ! चारों ओरसे सब लोगोंको अपने प्रज्वलित मुखोंसे निगल- कर तुम जीभें चाट रहे हो ! और तुम्हारी उग्र प्रभाएँ तेजसे समूचे जगतको व्याप्तकर ( चारों ओर ) चमक रही हैं। ( ३१ ) मुझे बतलाओ, कि इस उग्र रूपको धारण करनेवाले तुम कौन हो ? हे देव देवश्रेष्ठ ! तुम्हें नमस्कार करता गी. र. ५०

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