श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें७८४ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र अमी हि त्वां सुरसंघा विशन्ति केचिद्भीताः प्रांजलयो गृणन्ति । स्वस्तीत्युक्त्वा महर्षिसिद्धसंघाः स्तुवन्ति त्वां स्तुतिभिः पुष्कलाभिः ॥२१ रुद्रादित्या वसवो ये च साध्या विश्वेऽश्विनौ मरुतश्चोष्मपाश्च । गन्धर्वयक्षासुरसिद्धसंघा वीक्षन्ते त्वां विस्मिताश्चैव सर्वे ॥ २२ ॥ रूपं महत्ते बहुवक्त्रनेत्रं महाबाहो बहुबाहूरुपादम् । बहूद॒रं बहुदंष्ट्राकरालं दृष्ट्वा लोकाः प्रव्यथितास्तथाहम् ॥ २३ ॥ नभःस्पृशं दीप्तमनेकवर्णं व्यात्ताननं दीप्तविशालनेत्रम् । दृष्ट्वा हि त्वां प्रव्यथितान्तरात्मा धृतिं न विन्दामि शमं च विष्णो ॥२४ पृथ्वीके बीचका यह ( सब ) अंतर और सभी दिशाएँ अकेले तुम्हींने व्याप्तकर डाली हैं; और हे महात्मन् ! तुम्हारे इस अद्भुत और उग्र रूपको देखकर त्रैलोक्य ( डरसे ) व्यथित हो रहा है। ( २१ ) यह देखो, देवताओंके ये समूह तुममें प्रवेश कर रहे हैं, ( और ) कुछ भयसे हाथ जोड़कर प्रार्थना कर रहे हैं; ( एवं ) ‘स्वस्ति, स्वस्ति' कहकर महर्षियों और सिद्धोंके समुदाय अनेक प्रकारके स्तोत्रोंसे तुम्हारी स्तुति कर रहे हैं। ( २२ ) ( ऐसेही ) रुद्र और आदित्य, वसु और साध्यगण, विश्वेदेव, ( दोनो ) अश्विनीकुमार, मरुद्गण, उष्मपा अर्थात् पितर, और गंधर्व, यक्ष, राक्षस, एवं सिद्धोंके झुंडके झुंड सर्वत विस्मित होकर तुम्हारी ओर देख रहे हैं। [ श्राद्धमें पितरोंको जो अन्न अर्पण किया जाता है, उसे वे तभीतक ग्रहण करते हैं, जब तक कि वह गरमागरम रहे, इसीसे उनको 'उष्मपा' कहते हैं ( मनु. ३. २३७ ) । मनुस्मृतिमें ( ३, ९४–२०० ) इन्हीं पितरोंके सोमसद् अग्निष्वात्त, बर्हिषद्, सोमपा, हविष्मान्, आज्यपा और सुकलिन् ये सात प्रकारके गण बतलाये हैं। आदित्य आदि देवता वैदिक हैं ( ऊपरका छठा श्लोक देखो ) । बृहदारण्यक उपनिषदमें ( ३. ९. २ ) यह वर्णन है, कि आठ वसु, ग्यारह रुद्र, बारह आदित्य और इंद्र तथा प्रजापतिको मिलाकर ३३ देवता होते हैं; और महाभारतके आदिपर्व अ. ६५ एवं ६६में तथा शांतिपर्व अ. २०८में उनके नाम और उत्पत्ति बतला गयी है। ] ( २३ ) हे महाबाहु ! तुम्हारे इस विराट् अनेक मुखोंके, अनेक आँखोंके, अनेक भुजाओंके, अनेक जंघाओंके, अनेक पैरोंके, अनेक उदरोंके, और अनेक दाढ़ोंके कारण विकराल दिखनेवाले रूपको देखकर सब लोगोंको और मुझेभी भय हो रहा है। ( २४ ) आकाशसे भिड़े हुए, प्रकाशमान्, अनेक रंगोंके, जबड़े फैलाये हुए, और बड़े चमकीले नेत्रोंसे युक्त तुमको देखकर अंतरात्मा घबड़ा गया है; इससे हे