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श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

७८४ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र अमी हि त्वां सुरसंघा विशन्ति केचिद्भीताः प्रांजलयो गृणन्ति । स्वस्तीत्युक्त्वा महर्षिसिद्धसंघाः स्तुवन्ति त्वां स्तुतिभिः पुष्कलाभिः ॥२१ रुद्रादित्या वसवो ये च साध्या विश्वेऽश्विनौ मरुतश्चोष्मपाश्च । गन्धर्वयक्षासुरसिद्धसंघा वीक्षन्ते त्वां विस्मिताश्चैव सर्वे ॥ २२ ॥ रूपं महत्ते बहुवक्त्रनेत्रं महाबाहो बहुबाहूरुपादम् । बहूद॒रं बहुदंष्ट्राकरालं दृष्ट्वा लोकाः प्रव्यथितास्तथाहम् ॥ २३ ॥ नभःस्पृशं दीप्तमनेकवर्णं व्यात्ताननं दीप्तविशालनेत्रम् । दृष्ट्वा हि त्वां प्रव्यथितान्तरात्मा धृतिं न विन्दामि शमं च विष्णो ॥२४ पृथ्‍वीके बीचका यह ( सब ) अंतर और सभी दिशाएँ अकेले तुम्हींने व्याप्तकर डाली हैं; और हे महात्मन् ! तुम्हारे इस अद्भुत और उग्र रूपको देखकर त्रैलोक्य ( डरसे ) व्यथित हो रहा है। ( २१ ) यह देखो, देवताओंके ये समूह तुममें प्रवेश कर रहे हैं, ( और ) कुछ भयसे हाथ जोड़कर प्रार्थना कर रहे हैं; ( एवं ) ‘स्वस्ति, स्वस्ति' कहकर महर्षियों और सिद्धोंके समुदाय अनेक प्रकारके स्तोत्रोंसे तुम्हारी स्तुति कर रहे हैं। ( २२ ) ( ऐसेही ) रुद्र और आदित्य, वसु और साध्यगण, विश्वेदेव, ( दोनो ) अश्विनीकुमार, मरुद्गण, उष्मपा अर्थात् पितर, और गंधर्व, यक्ष, राक्षस, एवं सिद्धोंके झुंडके झुंड सर्वत विस्मित होकर तुम्हारी ओर देख रहे हैं। [ श्राद्धमें पितरोंको जो अन्न अर्पण किया जाता है, उसे वे तभीतक ग्रहण करते हैं, जब तक कि वह गरमागरम रहे, इसीसे उनको 'उष्मपा' कहते हैं ( मनु. ३. २३७ ) । मनुस्मृतिमें ( ३, ९४–२०० ) इन्हीं पितरोंके सोमसद् अग्निष्वात्त, बर्हिषद्, सोमपा, हविष्मान्, आज्यपा और सुकलिन् ये सात प्रकारके गण बतलाये हैं। आदित्य आदि देवता वैदिक हैं ( ऊपरका छठा श्लोक देखो ) । बृहदारण्यक उपनिषदमें ( ३. ९. २ ) यह वर्णन है, कि आठ वसु, ग्यारह रुद्र, बारह आदित्य और इंद्र तथा प्रजापतिको मिलाकर ३३ देवता होते हैं; और महाभारतके आदिपर्व अ. ६५ एवं ६६में तथा शांतिपर्व अ. २०८में उनके नाम और उत्पत्ति बतला गयी है। ] ( २३ ) हे महाबाहु ! तुम्हारे इस विराट् अनेक मुखोंके, अनेक आँखोंके, अनेक भुजाओंके, अनेक जंघाओंके, अनेक पैरोंके, अनेक उदरोंके, और अनेक दाढ़ोंके कारण विकराल दिखनेवाले रूपको देखकर सब लोगोंको और मुझेभी भय हो रहा है। ( २४ ) आकाशसे भिड़े हुए, प्रकाशमान्, अनेक रंगोंके, जबड़े फैलाये हुए, और बड़े चमकीले नेत्रोंसे युक्त तुमको देखकर अंतरात्मा घबड़ा गया है; इससे हे

ग्यारहवाँ अध्याय ७८५ दंष्ट्राकरालानि च ते मुखानि दृष्ट्वैव कालानलसन्निभानि । दिशो न जाने न लभे च शर्म प्रसीद देवेश जगन्निवास ॥ २५ ॥ अमी च त्वां धृतराष्ट्रस्य पुत्राः सर्वे सहैवावनिपालसंघैः । भीष्मो द्रोणः सूतपुत्रस्तथासौ सहास्मदीयैरपि योधमुख्यैः ॥ २६ ॥ वक्त्राणि ते त्वरमाणा विशन्ति दंष्ट्राकरालानि भयानकानि । केचिद्विलग्ना दशनान्तरेषु सन्दृश्यन्ते चूर्णितैरुत्तमाङ्गैः ॥ २७ ॥ यथा नदीनां बहवोऽम्बुवेगाः समुद्रमेवाभिमुखा द्रवन्ति । तथा तवामी नरलोकवीरा विशन्ति वक्त्राण्यभिविज्वलन्ति ॥ २८ ॥ यथा प्रदीप्तं ज्वलनं पतंगा विशन्ति नाशाय समृद्धवेगाः । तथैव नाशाय विशन्ति लोकास्तवापि वक्त्राणि समृद्धवेगाः ॥ २९ ॥ लेलिह्यसे ग्रसमानः समन्ताल्लोकान्समग्रान्वदनैर्ज्वलद्भिः । तेजोभिरापूर्य जगत्समग्रं भासस्तवोग्राः प्रतपन्ति विष्णो ॥ ३० ॥ आख्याहि मे को भवानुग्ररूपो नमोऽस्तु ते देववर प्रसीद । विज्ञातुमिच्छामि भवन्तमाद्यं न हि प्रजानामि तव प्रवृत्तिम् ॥ ३१ ॥ विष्णो ! मेरा धीरज छूट गया और शांतिभी जाती रही ! ( २५ ) और यह अवस्था हुई है, कि दाढ़ोंसे विकराल तथा प्रलयकालीन अग्नीके समान तुम्हारे ( इन ) मुखोंको देखतेही मुझे दिशाएँ नहीं सूझतीं, और समाधानभी नहीं होता । हे जगन्निवास, देवाधिदेव ! ! प्रसन्न हो जाओ ( २६ ) यह देखो, राजाओंके झुंडसमेत धृतराष्ट्रके सब पुत्र, भीष्म, द्रोण और वह सूतपुत्र ( कर्ण ), हमारी ओरकेभी मुख्य मुख्य योद्धाओंके साथ, ( २७ ) तुम्हारी विकराल दाढ़ोंवाले इन अनेक भयंकर मुखोंमें धड़ाधड़ घुस रहे हैं; और कुछ लोग तो दांतोंमें दबकर ऐसे दिखाई दे रहे हैं, कि उनकी खोपड़ियाँ चूर हुई हैं। ( २८ ) तुम्हारे अनेक प्रज्वलित मुखोंमें मनुष्यलोकके ये वीर वैसेही घुस रहे हैं, जैसे कि नदियोंके बड़े बड़े प्रवाह समुद्रकीही ओर चले जाते हैं। ( २९ ) जलती हुई अग्निमें मरनेके लिये पतंग जिस प्रकार बड़े वेगसे कूदते हैं, वैसेही तुम्हारे- भी अनेक जबड़ोंमें मरनेके लिये ( ये ) लोग बड़े वेगसे प्रवेश कर रहे हैं। ( ३० ) हे विष्णो ! चारों ओरसे सब लोगोंको अपने प्रज्वलित मुखोंसे निगल- कर तुम जीभें चाट रहे हो ! और तुम्हारी उग्र प्रभाएँ तेजसे समूचे जगतको व्याप्तकर ( चारों ओर ) चमक रही हैं। ( ३१ ) मुझे बतलाओ, कि इस उग्र रूपको धारण करनेवाले तुम कौन हो ? हे देव देवश्रेष्ठ ! तुम्हें नमस्कार करता गी. र. ५०

७८६ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र श्रीभगवानुवाच । §§ कालोऽस्मि लोकक्षयकृत्प्रवृद्धो लोकान्समाहर्तुमिह प्रवृत्तः । ऋतेऽपि त्वां न भविष्यन्ति सर्वे येऽवस्थिताः प्रत्यनीकेषु योधाः ॥ ३२ ॥ तस्मात्त्वमुत्तिष्ठ यशो लभस्व जित्वा शत्रून्भुंक्ष्व राज्यं समृद्धम् । मयैवैते निहताः पूर्वमेव निमित्तमात्रं भव सव्यसाचिन् ॥ ३३ ॥ द्रोणं च भीष्मं च जयद्रथं च कर्णं तथान्यानपि योधवीरान् । मया हतांस्त्वं जहि मा व्यथिष्ठा युध्यस्व जेतासि रणे सपत्नान् ॥ ३४ ॥ संजय उवाच । §§ एतच्छ्रुत्वा वचनं केशवस्य कृतांजलिर्वेपमानः किरीटी । नमस्कृत्वा भूय एवाह कृष्णं सगद्गदं भीतभीतः प्रणम्य ॥ ३५ ॥ हूँ ! प्रसन्न हो जाओ ! मैं जानना चाहता हूँ, कि तुम आदि पुरुष कौन हो ? क्योंकि मैं तुम्हारी इस करनीको ( बिलकुल ) नहीं जानता । श्रीभगवानने कहा :- ( ३२ ) मैं लोकोंका क्षय करनेवाला और बढ़ा हुआ 'काल' हूँ; लोगोंका संहार करने यहाँ आया हूँ । तू न हो, तोभी, अर्थात् तू कुछ करे, तोभी, सेनाओंमें खड़े हुए ये सब योद्धा नष्ट होनेवाले (मरनेवाले) हैं; (३३) अतएव तू उठ, यश प्राप्त कर, और शत्रुओंको जीत करके समृद्ध राज्यका उपभोग कर । मैंने उन्हें पहलेही मार डाला है; ( इसलिये अब ) हे सव्यसाची (अर्जुन) ! तू केवल निमित्तके लिये ( आगे ) हो ! ( ३४ ) मैं द्रोण, भीष्म, जयद्रथ और कर्ण तथा ऐसेही अन्यान्य वीर योद्धाओंको ( पहलेही ) मार चुका हूँ; उन्हें तू मार । घबड़ाना नहीं ! युद्ध कर ! युद्धमें तू शत्रुओंको जीतेगा । | [ सारांश, जब श्रीकृष्ण संधिके लिये गये थे, तब दुर्योधनको मेलकी | कोईभी बात सुनते न देख भीष्मने श्रीकृष्णसे केवल शब्दोंमें कहा था, कि | 'कालपक्वमिदं मन्ये सर्वं क्षत्रं जनार्दन' ( सभा. उ. १२७. ३२ ) - ये सब | क्षत्रिय कालपक्व हो गये हैं; उसी कथनका यह प्रत्यक्ष दृश्य श्रीकृष्णने अपने | विश्वरूपसे अर्जुनको दिखला दिया है ( ऊपरके २६-३१ श्लोक देखो ) कर्म- | विपाक-प्रक्रियाका यह सिद्धान्तभी ३३वें श्लोकमें आ गया है, कि दुष्ट मनुष्य | अपने कर्मोसेही मरते हैं, उनको मारनेवाला तो सिर्फ निमित्त है, इसलिये | मारनेवालेको उसका दोष नहीं लगता । ] संजयने कहा :- ( ३५ ) केशवके इस भाषणको सुनकर अर्जुन अन्यन्त भय- भीत हो गया, गला रुँधकर, काँपते हुए, हाथ जोड़ नमस्कार करके उसने श्रीकृष्णसे

ग्यारहवाँ अध्याय ७८७ अर्जुन उवाच । स्थाने हृषीकेश तव प्रकीर्त्या जगत्प्रहृष्यत्यनुरज्यते च । रक्षांसि भीतानि दिशो द्रवन्ति सर्वे नमस्यन्ति च सिद्धसंघाः ॥ ३६ ॥ कस्माच्च ते न नमेरन्महात्मन् गरीयसे ब्रह्मणोऽप्यादिकर्त्रे । अनन्त देवेश जगन्निवास त्वमक्षरं सदसत्तत्परं यत् ॥ ३७ ॥ त्वमादिदेवः पुरुषः पुराणस्त्वमस्य विश्वस्य परं निधानम् । वेत्ताऽसि वेद्यं च परं च धाम त्वया ततं विश्वमनन्तरूप ॥ ३८ ॥ वायुर्यमोऽग्निर्वरुणः शशांक प्रजापतिस्त्वं प्रपितामहश्च । नमो नमस्तेऽस्तु सहस्रकृत्वः पुनश्च भूयोऽपि नमो नमस्ते ॥ ३९ ॥ नम्र होकर फिर कहा -- अर्जुनने कहा :- ( ३६ ) हे हृषीकेश ! ( सब ) जगत् तुम्हारे ( गुण-) कीर्तनसे प्रसन्न होता है, और ( उसमें ) अनुरक्त रहता है, राक्षस तुमसे डरकर ( दशों ) दिशाओंमें भाग जाते हैं, और सिद्ध पुरुषोंके संघ तुम्हींको नमस्कार करते हैं, यह ( सब ) उचितही है । ( ३७ ) हे महात्मन् ! तुम ब्रह्म- देवकेभी आदिकारण और उससेभी श्रेष्ठ हो, तुम्हारी वंदना वे कैसे न करेंगे ? हे अनंत ! हे देव देव ! हे जगन्निवास ! सत् और असत् तुम्हीं हो, और इन दोनोंसे, परे जो अक्षर है, वहभी तुम्हीं हो । | [ गीता ७. २४; ८. २० या १५. १६ से दीख पड़ेगा, कि सत् और असत् | शब्दोंके अर्थ यहाँपर क्रमसे व्यक्त और अव्यक्त अथवा क्षर और अक्षर इन | शब्दोंके अर्थोंके समान हैं । सत् और असत्‌से परे जो तत्त्व है, वही अक्षर ब्रह्म | है, इसी कारण गीता १३. १२ में स्पष्ट वर्णन है, कि “ मैं न तो सत् हूँ, और | न असत् । ” गीतामें 'अक्षर' शब्द कभी प्रकृतिकेलिये और कभी ब्रह्मके लिये | उपयुक्त होता है । गीता ९. १९; १३. १२; और १५. १६ की टिप्पणी देखो । ] ( ३८ ) तुम आदिदेव, ( तुम ) पुरातन पुरुष, तुम्हीं इस जगत्‌के परम आधार हो; तुम ज्ञाता और ज्ञेय, तथा तुम श्रेष्ठस्थान हो; और हे अनंतरूप ! तुम्हींने ( इस ) विश्वको विस्तृत अथवा व्याप्त किया है । ( ३९ ) वायु, यम, अग्नि, वरुण, चंद्र, प्रजापति अर्थात् ब्रह्मा, और परदादाभी तुम्हीं हो । तुम्हें हजार बार नमस्कार है ! और फिरभी तुम्हींको नमस्कार है ! | [ ब्रह्मासे मरीचि आदि सात मानसपुत्र उत्पन्न हुए और मरीचिसे | कश्यप, तथा कश्यपसे सब प्रजा उत्पन्न हुई है ( महा. आदि. ६५. ११ ) ; इस- | लिये इन मरीचि आदिकोही प्रजापति कहते हैं ( शां. ३४०. ६५ ) । इसीसे | कोई कोई प्रजापति शब्दका अर्थ काश्यप आदि प्रजापति करते हैं । परंतु यहाँ

७८८ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र नमः पुरस्तादथ पृष्ठतस्ते नमोऽस्तु ते सर्वत एव सर्व । अनन्तवीर्यामितविक्रमस्त्वं सर्वं समाप्नोषि ततोऽसि सर्वः ॥ ४० ॥ सखेति मत्वा प्रसभं यदुक्तं हे कृष्ण हे यादव हे सखेति । अजानता महिमानं तवेदं मया प्रमादात्प्रणयेन वापि ॥ ४१ ॥ यच्चावहासार्थमसत्कृतोऽसि विहारशय्यासनभोजनेषु । एकोऽथवाप्यच्युत तत्समक्षं तत्क्षामये त्वामहमप्रमेयम् ॥ ४२ ॥ पितासि लोकस्य चराचरस्य त्वमस्य पूज्यश्च गुरुर्गरीयान् । न त्वत्समोऽस्त्यभ्यधिकः कुतोऽन्यो लोकत्रयेऽप्यप्रतिमप्रभावः ॥४३ तस्मात्प्रणम्य प्रणिधाय कायं प्रसादये त्वामहमीशमीड्यम् । पितेव पुत्रस्य सखेव सख्युः प्रियः प्रियायार्हसि देव सोढुम् ॥ ४४ ॥ । प्रजापति शब्द एकवचनान्त है, इस कारण प्रजापतिका अर्थ ब्रह्मदेवही अधिक । ग्राह्य दीख पड़ता है। इसके अतिरिक्त ब्रह्मा, मरीचि आदिके पिता अर्थात् सबके । पितामह (दादा) हैं, अतः आगेका 'प्रपितामह' (परदादा) पदभी आप-ही- । आप प्रकट होता है और उसकी सार्थकता व्यक्त हो जाती है।] (४०) हे सर्वात्मक ! तुम्हें सामनेसे नमस्कार है, पीछेसे नमस्कार है और सभी ओरसे तुमको नमस्कार है। तुम्हारा वीर्य अनंत है और तुम्हारा पराक्रम अतुल है। सबका समापन करनेवाले हो, इसलिये तुम्हीं 'सर्व' हो। । [ सामनेसे नमस्कार, पीछेसे नमस्कार, ये शब्द परमेश्वरकी सर्वव्यापकता । दिखलाते हैं। उपनिषदोंमें ब्रह्मका ऐसा वर्णन है, कि "ब्रह्मैवेदं अमृतं पुरस्तात् । ब्रह्म पश्चात् ब्रह्म दक्षिणतश्चोत्तरेण । अधश्चोर्ध्वं च प्रसृतं ब्रह्मैवेदं विश्वमिद् । वरिष्ठम्" (मुं. २. २. २११; छां. ७. २५), उसीके अनुसार भक्ति-मार्गकी यह । नमनात्मक स्तुति है।] (४१) तुम्हारी इस महिमाको बिना जाने, मित्र समझकर प्यारसे या भूलसे, 'अरे कृष्ण', 'ओ यादव' 'हे सखा' इत्यादि जो कुछ मैने अनादरसे कह डाला हो; (४२) और हे अच्युत ! आहार-विहारमें अथवा सोने-बैठनेमें, अकेलेमें या दस मनुष्योंके समक्ष, मैंने हँसी-दिल्लगीमें तुम्हारा जो अपमान किया हो, उसकेलिये मैं तुम अप्रमेय अर्थात् अनंतसे प्रार्थना करता हूँ, कि आप मुझे क्षमा करें। (४३) इस चराचर जगत्के पिता तुम्हीं हो, तुम पूज्य हो, और गुरुकेभी गुरु हो ! त्रैलोक्यभरमें तुम्हारी बराबरीका कोई नहीं है। फिर हे अतुलप्रभाव ! अधिक कहांसे होगा ? (४४) तुम स्तुत्य और समर्थ हो, इसलिये शरीर झुकाकर नमस्कार करके मैं तुमसे प्रार्थना करता हूँ, कि 'प्रसन्न हो जाओ'। जिस प्रकार पिता अपने पुत्रके, अथवा सखा अपने सखाके, अपराध क्षमा करता है, उसी प्रकार हे देव ! प्रेमी

ग्यारहवाँ अध्याय ७८९ अदृष्टपूर्वं हृषितोऽस्मि दृष्ट्वा भयेन च प्रव्यथितं मनो मे । तदेव मे दर्शय देव रूपं प्रसीद देवेश जगन्निवास ॥ ४५ ॥ किरीटिनं गदिनं चक्रहस्तमिच्छामि त्वां द्रष्टुमहं तथैव । तेनैव रूपेण चतुर्भुजेन सहस्रबाहो भव विश्वमूर्ते ॥ ४६ ॥ आपको प्रियके अर्थात् अपने प्रेमपात्रके (अर्थात् मेरे सब) अपराध क्षमा करने चाहिये । | [ कुछ लोग “प्रियः प्रियायार्हसि” इन शब्दोंका “प्रिय पुरुष जिस | प्रकार अपनी प्रिय स्त्रीके' ऐसा अर्थ करते हैं। परंतु हमारे मतमें यह ठीक | नहीं है। क्योंकि व्याकरणकी रीतिसे 'प्रियायार्हसि'के प्रियायाः + अर्हसि अथवा | प्रियायै + अर्हसि ऐसे पद नहीं किये जा सकते, और उपमाद्योतक 'इव' शब्दभी | इस श्लोकमें दो बारही आया है। “अतः प्रियः प्रियायार्हसि” को तीसरी उपमा | न समझकर उपमेय माननाही अधिक प्रशस्त है। 'पुत्रके' (पुत्रस्य), 'सखाके' | (सख्युः), इन दोनों उपमानात्मक षष्ठ्यन्त शब्दोंके समान आदि उपमेयमेंभी | 'प्रियस्य' (प्रियके) यह षष्ठ्यन्त पद होता, तो बहुत अच्छा होता। परंतु अब | 'स्थितस्य गतिश्चिन्तनीया' इस न्यायके अनुसार यहाँ व्यवहार करना चाहिये। | हमारी समझमें यह बात बिलकुल युक्तिसंगत नहीं दीख पड़ती, कि 'प्रियस्य' | इस षष्ठ्यन्त पुलिंग, पदके अभावमें, व्याकरणके विरुद्ध 'प्रियायाः' यह षष्ठ्यन्त | स्त्रीलिंगका पद किया जावे, और जब वह अर्जुनके लिये लागू न हो सके तब, | 'इव' शब्दको अध्याहार मानकर प्रियः प्रियायाः"- प्रेमी अपनी प्यारी स्त्रीके- | ऐसी तीसरी उपमा मानी जावे, और वहभी शृंगारिक अतएव अप्रासंगिक हो। | इसके सिवा एक और बात है, कि पुत्रस्य सख्युः, प्रियायाः, इन तीनों पदोंके | उपमानमें चले जानेसे उपमेयमें षष्ठ्यन्त पद बिलकुलही नहीं रह जाता, और | 'मे' अथवा 'मम' पदका फिरभी अध्याहार करना पड़ता है; एवं इतनी माथा- | पच्ची करनेपर उपमान और उपमेयमें जैसे तैसे विभक्तिकी समता हो गई, | तोभी दोनोंमें लिंगकी विषमताका नया दोष बनाही रहता है। दूसरे पक्षमें - | अर्थात् प्रियाय + अर्हसि ऐसे व्याकरणकी रीतिसे शुद्ध और सरल पद किये जावें, | तो उपमेयमें - जहाँ षष्ठी होनी चाहिये, वहाँ 'प्रियाय' यह चतुर्थी आती है, - | बस; इतनाही दोष रहता है और यह दोषभी विशेष महत्त्वका नहीं है। क्योकि | षष्ठीका अर्थ यहाँ चतुर्थीका-सा है और अन्यत्रभी कई बार ऐसा होता है। पर- | मार्थप्रपा टीकामें इस श्लोकका अर्थ वैसाही है, जैसा कि हमने किया है।] (४५) कभी न देखे हुए रूपको देखकर मुझे हर्ष हुआ है और भयसे मेरा मन व्याकुलभी हो गया है। हे जगन्निवास, देवाधिदेव ! प्रसन्न हो जाओ ! और हे देव ! अपना वह पहलेका स्वरूप दिखलाओ। (४६) मैं पहलेके समानही किरीट और गदा धारण

७९० गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र श्रीभगवानुवाच । मया प्रसन्नेन तवार्जुनेदं रूपं परं दर्शितमात्मयोगात् । तेजोमयं विश्वमनन्तमाद्यं यन्मे त्वदन्येन न दृष्टपूर्वम् ॥ ४७ ॥ न वेदयज्ञाध्ययनैर्न दानैर्न च क्रियाभिर्न तपोभिरुग्रैः । एवंरूपः शक्य अहं नृलोके द्रष्टुं त्वदन्येन कुरुप्रवीर ॥ ४८ ॥ मा ते व्यथा मा च विमूढभावो दृष्ट्वा रूपं घोरमीदृङ्ममेदम् । व्यपेतभीः प्रीतमनाः पुनस्त्वं तदेव मे रूपमिदं प्रपश्य ॥ ४९ ॥ संजय उवाच । इत्यर्जुनं वासुदेवस्तथोक्त्वा स्वकं रूपं दर्शयामास भूयः । आश्वासयामास च भीतमेनं भूत्वा पुनः सौम्यवपुर्महात्मा ॥ ५० ॥ करनेवाले, हाथमें चक्र लिये हुए तुमको देखना चाहता हूँ; (अतएव) हे सहस्रबाहु, विश्वमूर्त्ति ! उसी चतुर्भुज रूपसे प्रकट हो जाओ। श्रीभगवानने कहा :- (४७) हे अर्जुन ! (तुझपर) प्रसन्न होकर यह तेजोमय, अनन, आद्य, और परम विश्वरूप अपनी योग-सामर्थ्यसे मैंने तुझे दिखलाया है; इसे तेरे सिवा और किसीने पहले नहीं देखा है। (४८) हे कुरुवीरश्रेष्ठ ! मनुष्यलोकमें मेरा इस प्रकारका स्वरूप कोईभी वेदसे, यज्ञोंसे, स्वाध्यायसे, दानसे, कर्मोंसे, अथवा उग्र तपसे नहीं देख सकता, कि जिसे तू ने देखा है। (४९) मेरे ऐसे घोर रूपको देखकर अपने चित्तमें व्यथा न होने दे, और मूढभी मत हो जा। डर छोड़कर संतुष्ट मनसे मेरे उसी स्वरूपको फिर देख ले। संजयने कहा :- (५०) इस प्रकार भाषण करके वासुदेवने अर्जुनको फिर अपना (पहलेका) स्वरूप दिखलाया; और फिर सौम्य रूप धारण करके उस महात्माने डरे हुए अर्जुनको धीरज बँधाया। [ गीताके द्वितीय अध्यायके ५ वें से ८ वें, २० वें, २२ वें, २९ वें और ३० वें श्लोक, आठवे अध्यायके ९ वें, १० वें, ११ वें और २८ वें श्लोक, नवें अध्यायके २० और २१ वें श्लोक, पन्द्रहवें अध्यायके २ रे से ५ वें और १५ वें श्लोकका छंद विश्वरूपवर्णनके उक्त ३६ श्लोकोंके छंदके समानही है; अर्थात् इसके प्रत्येक चरणमें ग्यारह अक्षर हैं। परंतु उनमें गणोंका कोई एक नियम नहीं है, इससे कालिदास प्रभृतिके काव्योंके इंद्रवज्रा, उपेंद्रवज्रा, उपजाति, दोधक, शालिनी आदि छंदोंकी चाल पर ये श्लोक नहीं कहे जा सकते। अर्थात् यह वृत्तरचना आर्ष याने वेदसंहिताके त्रिष्टुप् वृत्तके नमूनेपर की गई है; इस

ग्यारहवाँ अध्याय ७९१ अर्जुन उवाच । दृष्ट्वेदं मानुषं रूपं तव सौम्यं जनार्दन । इदानीमस्मि संवृत्तः सचेताः प्रकृतिं गतः ॥ ५१ ॥ श्रीभगवानुवाच । § § सुदुर्दर्शमिदं रूपं दृष्टवानसि यन्मम । देवा अप्यस्य रूपस्य नित्यं दर्शनकांक्षिणः ॥ ५२ ॥ नाहं वेदैर्न तपसा न दानेन न चेज्यया । शक्य एवंविधो द्रष्टुं दृष्टवानसि मां यथा ॥ ५३ ॥ भक्त्या त्वनन्यया शक्य अहमेवंविधोऽर्जुन । ज्ञातुं द्रष्टुं च तत्त्वेन प्रवेष्टुं च परंतप ॥ ५४ ॥ §§ मत्कर्मकृन्मत्परमो मद्भक्तः संगवर्जितः । निर्वैरः सर्वभूतेषु यः स मामेति पाण्डव ॥ ५५ ॥ इति श्रीमद्भगवद्गीतासु उपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे विश्वरूपदर्शनं नाम एकादशोऽध्यायः ॥ ११ ॥ । कारण यह सिद्धान्त औरभी सुदृढ हो जाता है, कि गीता बहुत प्राचीन होगी । । गीतारहस्य परिशिष्ट प्रकरण पृ. ५१७ देखो । ] अर्जुनने कहा :- (५१) हे जनार्दन ! तुम्हारे इस सौम्य और मनुष्यदेहधारी रूपको देखकर अब मन ठिकाने आ गया और मैं पहलेकी भांति सावधान हो गया हूँ । श्रीभगवानने कहा :- (५२) मेरे जिस रूपको तूने देखा है, उसका दर्शन मिलना बहुत कठिन है । देवताभी इस रूपको देखनेकी सदैव इच्छा किये रहते हैं । (५३) जैसा तूने मुझे देखा है, वैसा मुझे वेदोंसे, तपसे, दानसे, अथवा यज्ञसेभी (कोई) देख नहीं सकता । (५४) हे अर्जुन ! केवल अनन्यभक्तिसेही इस प्रकार मेरा ज्ञान होना, मुझे देखना, और हे परंतप ! मुझमें तत्त्वसे प्रवेश करना संभव है । । [ भक्ति करनेसे परमेश्वरका पहले ज्ञान होता है, और फिर अंतमें । परमेश्वरके साथ उसका तादात्म्य हो जाता है; यही सिद्धान्त पहले ४. २९ । श्लोकमें और आगे १८. ५५ श्लोकमें फिर आया है और उसका स्पष्टीकरण । हमने गीतारहस्यके तेरहवें प्रकरणमें ( पृ. ४२८-४२९ ) किया है । अब अर्जुनको । पूरी गीताके अर्थका सार संक्षेपमें बतलाते हैं :- ] (५५) हे पांडव ! जो इस बुद्धिसे कर्म करता है, कि सब कर्म मेरे अर्थात्

७९२ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र परमेश्वरके हैं, जो मत्परायण और संगविरहित है, और जो सब प्राणियोंके विषयमें निर्वैर है, वह मेरा भक्त मुझमें मिल जाता है। । [ उक्त श्लोकका आशय यह है, कि जगत्के सब व्यवहार भगवद्भक्तको । परमेश्वरार्पण-बुद्धिसे करने चाहिये ( ऊपर ३३ वाँ श्लोक देखो )। अर्थात् । उसे सारे व्यवहार इस निरभिमान-बुद्धिसे करने चाहिये, कि जगत्के सभी कर्म । परमेश्वरके हैं और सच्चा कर्ता और करानेवाला वही है; किंतु हमें निमित्त । बनाकर वह ये कर्म हमसे करवा रहा है; ऐसा करनेसे वे कर्म शांति अथवा । मोक्ष-प्राप्तिमें बाधक नहीं होते। शांकरभाष्यमेंभी यही कहा है, कि उक्त श्लोकमें । पूरे गीताशास्त्रका तात्पर्य आ गया है। इससे प्रकट है, कि गीताका भक्ति-मार्ग । यह नहीं कहता, कि आरामसे 'राम राम' जपा करो; प्रत्युत उसका कथन । है, कि उत्कट भक्तिके साथ-ही-साथ उत्साहसे सब निष्काम कर्म करते रहो। । संन्यासमार्गवाले कहते हैं, कि 'निर्वैर'का अर्थ निष्क्रिय है, परंतु वह अर्थ यहाँ । विवक्षित नहीं है, इसी बातको प्रकट करनेके लिये उसके साथ 'मत्कर्मकृत्' । अर्थात् "सब कर्मोंको परमेश्वरके ( अपने नहीं ) समझकर परमेश्वरार्पण-बुद्धिसे । उन्हें करनेवाला" विशेषण लगाया गया है। इस विषयका विस्तृत विचार गीता- । रहस्यके बारहवें प्रकरणमें (पृ. ३९४-४०१) किया है।] इस प्रकार श्रीभगवानके गाये हुए - अर्थात् कहे हुए - उपनिषद्में, ब्रह्म- विद्यान्तर्गत योग - अथवा कर्मयोग - शास्त्रविषयक, श्रीकृष्ण और अर्जुनके संवादमें, विश्वरूपदर्शनयोग नामक ग्यारहवाँ अध्याय समाप्त हुआ।

बारहवाँ अध्याय ७९३ द्वादशोऽध्यायः। अर्जुन उवाच। एवं सततयुक्ता ये भक्तास्त्वां पर्युपासते। ये चाप्यक्षरमव्यक्तं तेषां के योगवित्तमाः ॥ १ ॥ श्रीभगवानुवाच। § § मय्यावेश्य मनो ये मां नित्ययुक्ता उपासते। श्रद्धया परयोपेतास्ते मे युक्ततमा मताः ॥ २ ॥ बारहवाँ अध्याय [ कर्मयोगकी सिद्धिके लिये सातवें अध्यायमें ज्ञान-विज्ञानके निरूपणका आरंभ कर आठवेंमें अक्षर, अनिर्देश्य और अव्यक्त ब्रह्मका स्वरूप बतलाया है; और फिर नवें अध्यायमें भक्तिरूप प्रत्यक्ष राजमार्गके निरूपणका प्रारंभ करके दसवें और ग्यारहवेंमें तदंतर्गत 'विभूतिवर्णन' एवं 'विश्वरूपदर्शन' इन दो उपाख्यानोंका वर्णन किया है, और ग्यारहवें अध्यायके अंतमें साररूपसे अर्जुनको उपदेश किया है, कि भक्तिसे एवं निःसंग-बुद्धिसे समस्त कर्म करते रहो। अब इसपर अर्जुनका प्रश्न है, कि कर्मयोगकी सिद्धिके लिये सातवें और आठवें अध्यायोंमें क्षर-अक्षर- विचारपूर्वक परमेश्वरके अव्यक्त रूपकोही श्रेष्ठ सिद्ध करके अव्यक्तकी अथवा अक्षरकी उपासना (७. १९, २४; ८, २१) बतलाई है, और उपदेश किया है, कि युक्तचित्तसे युद्ध कर (८. ७); एवं नवें अध्यायमें व्यक्त-उपासनारूप प्रत्यक्ष धर्म बतलाकर कहा है, कि परमेश्वरार्पण-बुद्धिसे सभी कर्म करने चाहिये (९. २७, ३४; ११. ५५); तो अब इन दोनोंमें श्रेष्ठ मार्ग कौन-सा है; इस प्रश्नमें व्यक्तोपासनाका अर्थ भक्ति है। परंतु यहाँ भक्तिसे भिन्न भिन्न अनेक उपास्योंका अर्थ विवक्षित नहीं है, उपास्य अथवा प्रतीक कोईभी हो; उसमें एकही सर्वव्यापी परमेश्वरकी भावना रखकर जो भक्ति की जाती है, वही सच्ची व्यक्त उपासना है, और इस अध्यायमें वही उद्दिष्ट है।] अर्जुनने कहा :- (१) इस प्रकार सदा युक्त अर्थात् योगयुक्त हो कर जो भक्त तुम्हारी उपासना करते हैं; और जो अव्यक्त अक्षर अर्थात् ब्रह्मकी उपासना करते हैं, उनमें उत्तम (कर्म-) योगवेत्ता कौन हैं? श्रीभगवानने कहा :- (२) मुझमें मन लगाकर सदा युक्तचित्त हो करके, परम श्रद्धासे जो मेरी उपासना करते हैं, वे मेरे मतमें सबसे उत्तम युक्त अर्थात् योगी

७९४ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र ये त्वक्षरमनिर्देश्यमव्यक्तं पर्युपासते । सर्वत्रगमचिन्त्यं च कूटस्थमचलं ध्रु व म् ॥ ३ ॥ सन्नियम्येन्द्रियग्रामं सर्वत्र समबुद्धयः । ते प्राप्नुवन्ति मामेव सर्वभूतहिते रताः ॥ ४ ॥ क्लेशोऽधिकतरस्तेषामव्यक्तासक्तचेतसाम् । अव्यक्ता हि गतिर्दुःखं देहवद्भिरवाप्यते ॥ ५ ॥ ये तु सर्वाणि कर्माणि मयि संन्यस्य मत्पराः । अनन्येनैव योगेन मां ध्यायन्त उपासते ॥ ६ ॥ तेषामहं समुद्धर्ता मृत्युसंसारसागरात् । भवामि न चिरात्पार्थ मय्यावेशितचेतसाम् ॥ ७ ॥ मय्येव मन आधत्स्व मयि बुद्धिं निवेशय । निवसिष्यसि मय्येव अत ऊर्ध्वं न संशयः ॥ ८ ॥ हैं (३) परंतु जो अनिर्देश्य अर्थात् सबके मूलमें रहनेवाले अचल, प्रत्यक्ष न दिखलाये जानेवाले, अव्यक्त, सर्वव्यापी, अचिंत्य और कूटस्थ अर्थात् नित्य अक्षर अर्थात् ब्रह्मकी उपासना (४) सब इंद्रियोंको रोककर सर्वत्र सम-बुद्धि रखते हुए करते हैं, वे सब भूतोंके हितमें निमग्न (लोगभी) मुझेही पाते हैं; (५) (तथापि) उनका चित्त अव्यक्तमें आसक्त रहनेके कारण उनको अधिक क्लेश होते हैं। क्योंकि (व्यक्त देहधारी मनुष्योंको ) अव्यक्त उपासनाका मार्ग कष्टसे सिद्ध होता है। (६) परंतु जो मुझमें सब कर्मोंका संन्यास अर्थात् अर्पण करके मत्परायण होते हुए अनन्य- योगसे मेरा ध्यान कर मुझे भजते हैं, (७) हे पार्थ ! मुझमें चित्त लगानेवाले उन लोगोंका, मैं इस मृत्युमय संसार-सागरसे बिना विलंब किये, उद्धार कर देता हूँ। (८) (अतएव) मुझमेंही मन लगा, मुझमें बुद्धिको स्थिर कर । जिससे तू आगे निःसंदेह मुझमेंही निवास करेगा । | [ इसमें भक्तिमार्गकी श्रेष्ठताका प्रतिपादन है । दूसरे श्लोकमें पहले | यह सिद्धान्त किया है, कि भगवद्भक्त उत्तम योगी है, फिर तीसरे श्लोकमें | पक्षांतर-बोधक 'तु' अव्ययका प्रयोग कर, उसमें और चौथे श्लोकमें कहा है, कि | अव्यक्तकी उपासना करनेवालेभी मुझेही पाते हैं। परंतु इसके सत्य होनेपर- | भी पांचवें श्लोकमें यह बतलाया है, कि अव्यक्त-उपासकोका मार्ग अधिक | क्लेशदायक होता है; छठे और सातवें श्लोकमें वर्णन किया है, कि अव्यक्तकी | अपेक्षा व्यक्तकी उपासना सुलभ होती है; और अंतमें आठवें श्लोकमें उसके

बारहवाँ अध्याय ७९५ § § अथ चित्तं समाधातुं न शक्नोषि मयि स्थिरम् । अभ्यासयोगेन ततो मामिच्छाप्तुं धनंजय ॥ ९ ॥ अभ्यासेऽप्यसमर्थोऽसि मत्कर्मपरमो भव । मदर्थमपि कर्माणि कुर्वन्सिद्धिमवाप्स्यसि ॥ १० ॥ अथैतदप्यशक्तोऽसि कर्तुं मद्योगमाश्रितः । सर्वकर्मफलत्यागं ततः कुरु यतात्मवान् ॥ ११ ॥ श्रेयो हि ज्ञानमभ्यासाज्ज्ञानाद्ध्यानं विशिष्यते । ध्यानात्कर्मफलत्यागस्त्यागाच्छान्तिरनन्तरम् ॥ १२ ॥ | अनुसार व्यवहार करनेका अर्जुनको उपदेश किया है । सारांश, ग्यारहवें अध्या- | यके अंतमें (गीता ११. ५५) जो उपदेश कर चुके हैं, यहाँ अर्जुनके प्रश्न करनेपर | उसीको दृढ कर दिया है । भक्ति-मार्गमें सुलभता क्या है ? - इसका विस्तारपूर्वक | विचार गीतारहस्यके तेरहवें प्रकरणमें कर चुके हैं, इस कारण यहाँ हम उसकी | पुनरुक्ति नहीं करते । इतनाही कह देते हैं, कि अव्यक्तकी उपासना कष्टमय | होनेपरभी मोक्षदायकही है; और भक्ति-मार्गवालोंको स्मरण रखना चाहिये, | कि भक्ति-मार्गमेंभी कर्मोंको न छोड़कर उन्हेंही ईश्वरार्पणपूर्वक अवश्य करना | पड़ता है। और इसी हेतुसे छठे श्लोकमें ही सब कर्मोंका संन्यास करके 'मुझमें | ये शब्द रखे गये हैं। इसका स्पष्ट अर्थ यह है, कि भक्ति-मार्गमेंभी कर्मोंको | स्वरूपतः न छोड़ें, किंतु परमेश्वरमें उन्हें, अर्थात् उनके फलोंको, अर्पण कर दें। | इससे प्रकट होता है, कि भगवानने इस अध्यायके अंतमें जिस भक्तिमान् | पुरुषको अपना प्यारा बतलाया है, उसेभी इसी अर्थात् निष्काम कर्मयोग-मार्ग- | काही समझना चाहिये, स्वरूपतः कर्म-संन्यासीको नहीं। इस प्रकार भक्ति-मार्गकी | श्रेष्ठता और सुलभता बतला कर अब परमेश्वरकी ऐसी भक्ति करनेके उपाय | अथवा साधन बतलाते हुए उनके तारतम्यकाभी अंतमें स्पष्टीकरण करते हैं :- ] (९) अब (इस प्रकार) मुझमें भली भाँति चित्तको स्थिर करते तुझसे न बन पड़े, तो हे धनंजय ! अभ्यासकी सहायतासे अर्थात् बार-बार प्रयत्न करके मेरी प्राप्ति कर लेनेकी आशा रख । (१०) यदि अभ्यास करनेमेंभी तू असमर्थ हो, तो मदर्थ अर्थात् मेरी प्राप्तिके अर्थ (शास्त्रोंमें बतलाये हुए ज्ञान-ध्यान-भजन-पूजा- पाठ आदि) कर्म करता जा; मदर्थ (ये) कर्म करनेसेभी तू सिद्धि पावेगा । (११) परंतु यदि इसके करनेमेंभी तू असमर्थ हो, तो मद्योग अर्थात् मदर्पणपूर्वक योग, याने कर्मयोगका आश्रय करके यतात्मा होकर अर्थात् धीरे धीरे चित्तको रोकता हुआ, (अंतमें) सब कर्मोंके फलोंका त्याग कर दे । (१२) क्योंकि अभ्यासकी अपेक्षा ज्ञान

७९६ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र अधिक अच्छा है, ज्ञानकी अपेक्षा ध्यानकी योग्यता अधिक है, ध्यानकी अपेक्षा कमफलका त्याग ( श्रेष्ठ है) और (इस कर्मफलके) त्यागसे तुरंतही शांति ( प्राप्त होती है) है। | [ कर्मयोगकी दृष्टिसे ये श्लोक अत्यंत महत्त्वके हैं। इन श्लोकोंमें भक्ति- | युक्त कर्मयोगके सिद्ध होनेके लिये अभ्यास, ज्ञान-भजन आदि साधन बतलाकर, | इनके और अन्य साधनोंके तारतम्यका विचार करके अंतमें - अर्थात् १२ वें | श्लोकमें - कर्मफलके त्यागकी, अर्थात् निष्काम कर्मयोगकी, श्रेष्ठता वर्णित | है। निष्काम कर्मयोगकी श्रेष्ठताका वर्णन कुछ यहीं नहीं है; किंतु तीसरे | (३.८), पाँचवें (५. २), छठे (६. ४६) अध्यायोंमेंभी यही अर्थ स्पष्ट रीतिसे | वर्णित है; और उसके अनुसार फलत्यागरूप कर्मयोगका आचरण करनेके लियेभी | स्थान-स्थानपर अर्जुनको उपदेश किया है (गीतार. प्र. ११, पृ. ३०९-३१०)। | परंतु जिनका संप्रदाय गीता-धर्मसे जुदा है, उनके लिये यह बात प्रतिकूल है, | इसलिये उन्होंने ऊपरके श्लोकोंका और विशेषतया १२ वें श्लोकके पदोंका अर्थ | बदलनेका प्रयत्न किया है। निरे ज्ञान-मार्गी अर्थात् सांख्य-टीकाकारोंको यह | पसंद नही है, कि ज्ञानकी अपेक्षा कर्मफलका त्याग श्रेष्ठ बतलाया जावे, इसलिये | उन्होंने कहा है, कि या तो ज्ञान शब्दसे 'पुस्तकोंका ज्ञान' लेना चाहिये, अथवा | कर्मफलत्यागकी इस प्रशंसाको अर्थवादात्मक याने कोरी प्रशंसा समझनी चाहिये । | इसी प्रकार पातंजलयोगमार्गवालोंको अभ्यासकी अपेक्षा कर्मफलत्यागका बड़प्पन | नहीं सुहाता; और कोरे भक्ति-मार्गवालोंको - अर्थात् जो कहते हैं, कि भक्तिको | छोड़ दूसरे कोईभी कर्म न करो, उनको - ध्यानकी अपेक्षा अर्थात् भक्तिकी | अपेक्षा कर्मफलत्यागकी श्रेष्ठता मान्य नहीं है। वर्तमान समयमें लुप्त-सा हो | गया है, पातंजलयोग, ज्ञान और भक्ति, गीताका भक्तियुक्त कर्म योग-संप्रदाय | इन तीनों संप्रदायोंसे भिन्न, है और इसीसे उस संप्रदायका कोई टीकाकारभी | नहीं पाया जाता है। अतएव आजकल गीतापर जितनी टीकाएँ पाई जाती हैं, | उनमें कर्मफलत्यागकी श्रेष्ठता अर्थवादात्मक समझी गई है। परंतु हमारी रायमें | यह भूल है। गीतामें निष्काम कर्म योगकोही प्रतिपाद्य मान लेनेसे इस श्लोकके | अर्थके विषयमें कोईभी अड़चन नही रहती। यदि मान लिया जाय, कि कर्म | छोड़नेसे निर्वाह नही होता, निष्काम कर्म करनाही चाहिये; तो स्वरूपतः कर्मोंको | त्यागनेवाला ज्ञान-मार्ग कर्मयोगसे हलका जँचने लगता है; और इंद्रियोंकी कोरी | कसरत करनेवाला पातंजलयोग, अथवा सभी कर्मोंको छोड़ देनेवाला भक्ति-मार्गभी | कर्मयोगकी अपेक्षा कम योग्यताका सिद्ध हो जाता है। इस प्रकार निष्काम | कर्मयोगकी श्रेष्ठता प्रमाणित हो जानेपर यही प्रश्न रह जाता है, कि कर्मयोगमें | आवश्यक भक्तियुक्त साम्य-बुद्धिको प्राप्त करनेके लिये उपाय क्या है ? ये उपाय | तीन हैं - अभ्यास, ज्ञान और ध्यान। इनमेंसे यदि किसीसे अभ्यास न सधे, तो

बारहवाँ अध्याय ७९७ वह ज्ञान अथवा ध्यानमेंसे किसीभी उपायको स्वीकार कर ले । गीताका कथन है, कि इन उपायोंका आचरण करना यथोक्त क्रमसे सुलभ है। १२ वें श्लोकमें कहा है, कि यदि इनमेंसे एकभी उपाय न सधे, तो मनुष्यको चाहिये, कि वह कर्मयोगके आचरण करनेकाही एकदम आरंभ कर दे । अब यहाँ एक शंका यह होती है, कि जिससे अभ्यास नहीं सधता, और जिससे ज्ञान-ध्यानभी नहीं होता, वह कर्मयोग करेगाही कैसे ? अतः कई एकोंने निश्चय किया है, कि कर्म- योगको सबकी अपेक्षा सुलभ कहनाही निरर्थक है। परंतु विचार करनेसे दीख पड़ेगा, कि इस आक्षेपमें कुछभी जान नहीं है। १२ वें श्लोकमें यह नहीं कहा है, कि सब कर्मोंके फलोंका 'एकदम' त्याग कर दे, वरन् यह कहा है, कि पहले भगवानके बतलाये हुए कर्मयोगका आश्रय करके, अर्थात् ततः, तदनंतर धीरे धीरे इस बातको अंतमें सिद्ध कर ले। और ऐसा अर्थ करनेसे कुछभी विसंगति नहीं रह जाती। पिछले अध्यायोंमें कह चुके हैं, कि कर्मफलके स्वल्प आचरणसेही नहीं (गीता २.४०), किंतु जिज्ञासा (गीता ६.४४ और टिप्पणी) हो जानेसेभी मनुष्य, कोल्हूमें धरे जैसे आप-ही-आप अंतमें सिद्धिकी ओर खींचा चला जाता है। अतएव उस मार्गकी सिद्धि पानेका पहला साधन या सीढ़ी यही है, कि कर्म- योगका आश्रय करना चाहिये - अर्थात् इस मार्गसे जानेकी मनमें इच्छा होनी चाहिये। कौन कह सकता है, कि यह साधन अभ्यास, ज्ञान और ध्यानकी अपेक्षा सुलभ नहीं है १२ वें श्लोकका भावार्थभी यही है। न केवल भगवद्गीताहीमें, किंतु सूर्य-गीतामेंभी कहा है :- ज्ञानादुपास्तिरुत्कृष्टा कर्मोत्कृष्टमुपासनात् । इति यो वेद वेदान्तैः स एव पुरुषोत्तमः ॥ “जो इस वेदान्त तत्त्वको जानता है, कि ज्ञानकी अपेक्षा उपासना अर्थात् ध्यान या भक्ति उत्कृष्ट है, एवं उपासनाकी अपेक्षा कर्म अर्थात् निष्काम कर्म श्रेष्ठ है, वही पुरुषोत्तम है" (सूर्यगी. ४. ३७)। सारांश, भगवद्गीताका निश्चित मत यह है, कि कर्मफल-त्यागरूपी योग अर्थात् ज्ञान-भक्तियुक्त निष्काम कर्मयोगही सब मार्गोंमें श्रेष्ठ है; और इसके अनुकूलही नहीं, प्रत्युत पोषक युक्तिवाद १२ वें श्लोकमें है। यदि दूसरे किसी संप्रदायको वह न रुचे, तो वे उसे छोड़ दें, परंतु अर्थकी व्यर्थ खींचातानी न करें। इस प्रकार कर्मफल-त्यागको श्रेष्ठ सिद्ध करके, उस मार्गसे जानेवालेको (स्वरूपतः कर्म छोड़नेवालेको नहीं) जो सम और शांत स्थिति अंतमें प्राप्त होती है, उसका वर्णन करके अब भगवान् बतलाते हैं, कि ऐसाही भक्त मुझे अत्यंत प्रिय है:- ]

७९८ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र § § अद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्रः करुण एव च । निर्ममो निरहंकारः समदुःखसुखः क्षमी ॥ १३ ॥ सन्तुष्टः सततं योगी यतात्मा दृढनिश्चयः । मय्यर्पितमनोबुद्धिर्यो मे भक्तः स मे प्रियः ॥ १४ ॥ यस्मान्नोद्विजते लोको लोकान्नोद्विजते च यः । हर्षामर्षभयोद्वेगैर्मुक्तो यः स च मे प्रियः ॥ १५ ॥ अनपेक्षः शुचिर्दक्ष उदासीनो गतव्यथः । सर्वारम्भपरित्यागी यो मद्भक्तः स मे प्रियः ॥ १६ ॥ यो न हृष्यति न द्वेष्टि न शोचति न कांक्षति । शुभाशुभपरित्यागी भक्तिमान्यः स मे प्रियः ॥ १७ ॥ समः शत्रौ च मित्रे च तथा मानापमानयोः । शीतोष्णसुखदुःखेषु समः संगविवर्जितः ॥ १८ ॥ तुल्यनिन्दास्तुतिर्मौनी सन्तुष्टो येनकेनचित् । अनिकेतः स्थिरमतिर्भक्तिमान्मे प्रियो नरः ॥ १९ ॥ (१३) जो किसीसे द्वेष नहीं करता, जो सब भूतोंके साथ मित्रतासे बर्तता है, जो कृपालू है, जो ममत्व-बुद्धि और अहंकारसे रहित है, जो दुःख और सुखमें समान है, एवं जो क्षमाशील है, (१४) जो सदा संतुष्ट, संयमी तथा दृढ निश्चयी है, जिसने अपने मन और बुद्धिको मुझमें अर्पणकर दिया है, वह मेरा (कर्म-)योगी भक्त मुझको प्यारा है। (१५) जिससे न तो लोगोंको क्लेश होता है और न जो लोगोंसेभी क्लेश पाता है, ऐसेही जो हर्ष, क्रोध, भय और विषादसे अलिप्त है, वही मुझे प्रिय है। (१६) मेरा वही भक्त मुझे प्यारा है, कि जो निरपेक्ष, पवित्र और दक्ष है, अर्थात् किसीभी कामको आलस्य छोडकर करता है, जो (फलके विषयमें) उदासीन है, जिसे कोईभी विकार डिगा नहीं सकता, और जिसने (काम्य फलके) सब आरंभ याने उद्योग छोड़ दिये हैं। (१७) जो न (किसीभी बातका) आनंद मानता है, न द्वेष करता है, जो न शोक करता है और न इच्छाभी रखता है, जिसने (कर्मके) शुभ और अशुभ (फल) छोड़ दिये हैं, वह भक्तिमान् पुरुष मुझे प्रिय है। (१८) जिसे शत्रु और मित्र, मान और अपमान, सर्दी और गर्मी, सुख और दुःख समान हैं, और जिसे (किसीमेभी) आसक्ति नहीं है, (१९) जिसे निंदा और स्तुति दोनों एकसी हैं, जो मितभाषी है, एवं जो कुछ मिल जावे उसीमें संतुष्ट है, जिसका चित्त स्थिर है, और जो अनिकेत है अर्थात् जिसका (कर्म-फलाशारूप) ठिकाना कहींभी नहीं रह गया है, वह भक्तिमान् पुरुष मुझे प्यारा है।

बारहवाँ अध्याय ७९९ [ 'अनिकेत' शब्द उन यतियोंके वर्णनोंमेंभी अनेक बार आया करता है, कि जो गृहस्थाश्रम छोड, संन्यास धारण करके भिक्षा माँगते हुए जंगलोंमें घूमते रहते हैं (मनु. ६. २५) और इसका धात्वर्थ 'बिना घरवाला' है। अतः इस अध्यायके 'निर्मम', 'सर्वारंभपरित्यागी' और 'अनिकेत' शब्दोंसे, तथा गीतामें अन्यत्र 'त्यक्तसर्वपरिग्रहः' (गीता ४. २१), अथवा 'विविक्तसेवी', (गीता १८. ५२) इत्यादि जो शब्द हैं, उनके आधारसे संन्यास-मार्गवाले टीकाकार कहते हैं, कि संन्यासाश्रम मार्गका यह परम ध्येय - "घर-द्वार छोड़ कर बिना किसी इच्छाके जंगलोंमें आयुके दिन बिताना)" - ही गीतामें प्रतिपाद्य है; और इसके लिये वे स्मृति-ग्रंथोंके संन्यास-आश्रम प्रकरणके श्लोकोंका प्रमाण दिया करते हैं। गीता-वाक्योंके ये निरे संन्यास-प्रतिपादक अर्थ संन्यास-संप्रदायकी दृष्टिसे महत्त्वके हो सकते हैं, किंतु वे सच्चे नहीं हैं। क्योंकि गीताके अनुसार 'निरग्नि' अथवा 'निष्क्रिय' होना 'सच्चा' संन्यास नहीं है; और पीछे कई बार गीताका यह स्थिर सिद्धान्त कहा जा चुका है (गीता ५. २; ६. १, २), कि केवल फलाशाको छोड़ना चाहिये, न कि कर्मको। अतः 'अनिकेत' पदका 'घर-द्वार छोड़ना' अर्थ न करके, ऐसा करना चाहिये कि जिसका गीताके कर्मयोगके साथ मेल मिल सके। गीताके ४. २० वें श्लोकमें कर्मफलकी आशा न रखनेवाले पुरुषकोही 'निराश्रय' विशेषण लगाया गया है; और गीता ६. १ में उसी अर्थमें 'अनाश्रितः कर्मफलं' शब्द आये हैं। 'आश्रय' और 'निकेत' इन दोनों शब्दोंका अर्थ एकही है। अतएव अनिकेतका गृहत्यागी अर्थ न करके, ऐसा करना चाहिये, कि आदिमें जिसके मनका स्थान फँसा नहीं है। इसी प्रकार ऊपर १६ वें श्लोकमें जो 'सर्वारंभपरित्यागी' शब्द है, उसका अर्थभी "सारे कर्म या उद्योगोंको छोडनेवाला" नहीं करना चाहिये, किंतु गीता ४.१९ में जो यह कहा है, कि "जिसके समारंभ फलाशा- विरहित हैं, उसके कर्म ज्ञानसे दग्ध हो जाते हैं" वैसाही अर्थ याने "काम्य आरंभ अर्थात् कर्म छोड़नेवाला" करना चाहिये, - यह बात गीता १८.२; ८१. ४९ से सिद्ध होती है। सारांश, जिसका चित्त घर-गृहस्थीमें, बाल- बच्चोंमें अथवा संसारके अन्यान्य कामोंमें उलझा रहता है, उसको आगे उसमे दुःख होता है। अतएव गीताका इतनाही कहना है, कि इन सब बातोंमें चित्तको फँसने न दें; और मनकी इसी विरक्त स्थितिको प्रकट करनेके लिये गीताके 'अनिकेत' और 'सर्वारंभपरित्यागी' आदि शब्द स्थितप्रज्ञके वर्णनमें आया करते हैं। यही शब्द यतियोंके अर्थात् कर्म त्यागनेवाले संन्यासियोंके वर्णनोंमेंभी स्मृतिग्रंथोंमें आये हैं। पर सिर्फ इसी बुनियादपर यह नहीं कहा जा सकता, कि कर्मत्यागरूप संन्यासही गीतामें प्रतिपाद्य है। क्योंकि, इसके साथही गीताका यह दूसराभी निश्चित सिद्धान्त है, कि जिसकी बुद्धिमें वैराग्य पूर्णतः भिद गया

८०० गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र § § ये तु धर्म्यामृतमिदं यथोक्तं पर्युपासते । श्रद्धाना मत्परमा भक्तास्तेऽतीव मे प्रियाः ॥ २० ॥ इति श्रीमद्भगवद्गीता सुपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुन-संवादे भक्तियोगो नाम द्वादशोऽध्यायः ॥ १२ ॥ । हो, उस ज्ञानी पुरुषकोभी इसी विरक्त-बुद्धिसे फलाशा छोड़कर शास्त्रतः प्राप्त । होनेवाले सब कर्म करतेही रहना चाहिये । इस समूचे पूर्वापर संबंधको बिना । समझे, गीतामें जहाँ कहीं 'अनिकेत' को जोडके वैराग्यबोधक शब्द मिल जावें, । तो उन्हींपर सारा दारामदार रख कर यह कह देना ठीक नहीं है, कि गीतामें । कर्मसंन्यास-प्रधान मार्गही प्रतिपाद्य है । ] (२०) ऊपर बतलाये हुए इस अमृततुल्य धर्मका जो मत्परायण होते हुए श्रद्धासे आचरण करते हैं, वे भक्त मुझे अत्यंत प्रिय हैं । । [ यह वर्णन पहले हो चुका है ( गीता ६. ४७; ७. १८ ), कि भक्ति- । मान् ज्ञानी पुरुष सबसे श्रेष्ठ है; उस वर्णनके अनुसार भगवानने इस श्लोकमें । बतलाया है, कि उनका अत्यंत प्रिय कौन है, अर्थात् यहाँ परम भगवद्भक्त । कर्मयोगीका वर्णन किया है । पर भगवान्ही गीता ९. २९ वें श्लोकमें कहते हैं, । कि “ मुझे सब एकसे हैं, कोई विशेष प्रिय अथवा द्वेष्य नहीं ।” देखनेमें यह विरोध । प्रतीत होता है सही; पर यह जान लेनेसे कोई विरोध नहीं रह जाता, कि एक । वर्णन सगुण उपासनाका अथवा भक्ति-मार्गका है; और दूसरा अध्यात्म-दृष्टि । अथवा कर्मविपाक-दृष्टिसे किया गया है । गीतारहस्यके तेरहवें प्रकरणके अंतमें । (पृ. ४३०-४३१ ) इस विषयका विवेचन है । ] इस प्रकार श्रीभगवानके गाये हुए - अर्थात् कहे हुए - उपनिषदमें, ब्रह्म- विद्यान्तर्गत योग - अर्थात् कर्मयोग, शास्त्रविषयक, श्रीकृष्ण और अर्जुनके संवादमें भक्तियोग नामक बारहवाँ अध्याय समाप्त हुआ ।

तेरहवाँ अध्याय ८०१ त्रयोदशोऽध्यायः। श्रीभगवानुवाच। इदं शरीरं कौन्तेय क्षेत्रमित्यभिधीयते। एतद्यो वेत्ति तं प्राहुः क्षेत्रज्ञ इति तद्विदः ॥ १ ॥ तेरहवाँ अध्याय [ पिछले अध्यायमें यह बात सिद्ध की गई, कि अनिर्देश्य और अव्यक्त परमेश्वरका (बुद्धिसे) चितन करनेपर अंतमें मोक्ष तो मिलता है, परंतु उसकी अपेक्षा श्रद्धासे परमेश्वरके प्रत्यक्ष और व्यक्त स्वरूपकी भक्ति करके, परमेश्वरार्पण- बुद्धिसे सब कर्मोंको करते रहनेपर, वही मोक्ष सुलभ रीतिसे मिल जाता है। परंतु इतनेहीसे ज्ञान-विज्ञानका वह निरूपण समाप्त नहीं हो जाता, कि जिसका आरंभ सातवें अध्यायमें किया गया है। परमेश्वरका पूर्ण ज्ञान होनेके लिये बाहरी सृष्टिके क्षर-अक्षर-विचारके साथही साथ मनुष्यके शरीर और आत्माका, अथवा क्षेत्र और क्षेत्रज्ञकाभी, विचार करना पडता है। ऐसेही यदि सामान्य रीतिसे जान लिया, कि सब व्यक्त पदार्थ जड़ प्रकृतिसे उत्पन्न होते हैं; तोभी यह बतलाये बिना ज्ञान- विज्ञानका निरूपण पूरा नहीं होता, कि प्रकृतिके किस गुणसे यह विस्तार होता है? और उसका क्रम कौन-सा है? अतएव तेरहवें अध्यायमें पहले क्षेत्र-क्षेत्रज्ञका विचार, और फिर आगे चार अध्यायोंमें गुणत्रयका विचार बतलाकर अठारहवें अध्यायमें समग्र विषयका उपसंहार किया गया है। सारांश, तीसरी षडध्यायी स्वतंत्र नहीं है, तथा कर्मयोगकी सिद्धीके लिये जिस ज्ञान-विज्ञानके निरूपणका सातवें अध्यायमें आरंभ हो चुका है, उसीकी पूर्ति इस षडध्यायीमें की गई है (गीतारहस्य प्र. १४, पृ. ४५४-४५६)। गीताकी कई प्रतियोंमें इस तेरहवें अध्यायमेंके आरंभमें, यह श्लोक पाया जाता है। अर्जुन उवाच :- "प्रकृतिं पुरुषं चैव क्षेत्रं क्षेत्रज्ञमेव च। एतद्वेदितुमिच्छामि ज्ञानं ज्ञेयं च केशव॥" और उसका अर्थ यह है। अर्जुनने कहा :- "मुझे प्रकृति, पुरुष, क्षेत्र, क्षेत्रज्ञ, ज्ञान और ज्ञेयके जाननेकी इच्छा है, सो बतलाओ।" परंतु स्पष्ट दीख पडता है, कि यह न जानकर, कि क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ- विचार गीतामें आया कैसे है, किसीने पीछेसे यह श्लोक गीतामें घुसेड़ दिया है। टीकाकार इस श्लोकको क्षेपक मानते हैं; और क्षेपक न माननेसे गीताके श्लोकोंकी संख्याभी सात सौमे एक अधिक बढ़ जाती है। अतः इस श्लोकको हमनेभी प्रक्षिप्तही मानकर शांकरभाष्यके अनुसार इस अध्यायका आरंभ किया है।] श्रीभगवानने कहा :- (१) हे कौन्तेय! इम शरीरकोही क्षेत्र कहते हैं। गी. र. ५१

८०२ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र क्षेत्रज्ञं चापि मां विद्धि सर्वक्षेत्रेषु भारत । क्षेत्रक्षेत्रज्ञयोर्ज्ञानं यत्तज्ज्ञानं मतं मम ॥ २ ॥ § § तत्क्षेत्रं यच्च यादृक् च यद्विकारि यतश्च यत् । स च यो यत्प्रभावश्च तत्समासेन मे शृणु ॥ ३ ॥ इसे (शरीरको) जो जानता है, उसे तद्विद अर्थात् इस शास्त्रके जाननेवाले, क्षेत्रज्ञ कहते हैं । (२) हे भारत ! सब क्षेत्रोंमें क्षेत्रज्ञभी मुझेही समझ । क्षेत्र और क्षेत्रज्ञका जो ज्ञान है, वही मेरा ( परमेश्वरका ) ज्ञान माना गया है । [ पहले श्लोकमें 'क्षेत्र' और 'क्षेत्रज्ञ' इन दो शब्दोंका अर्थ दिया है; और दूसरे श्लोकमें क्षेत्रज्ञका यह स्वरूप बतलाया है, कि क्षेत्रज्ञ मैं परमेश्वर हूँ, अथवा जो पिंडमें है, वही ब्रह्मांडमें है । दूसरे श्लोकके चापि = भी शब्दोंका अर्थ यह है - न केवल क्षेत्रज्ञही, प्रत्युत क्षेत्रभी मैही हूँ । क्योंकि, जिन सातवें तथा आठवें अध्यायमें बतला चुके हैं, कि पंचमहाभूतोंसे क्षेत्र या शरीर बनता है, वे प्रकृतिसे बने हैं; और यह प्रकृति परमेश्वरकी ही कनिष्ठ विभूति है ( गीता ७. ४; ८. ४; ९. ८ ) । इस रीतिसे क्षेत्र या शरीरके पंच महाभूतोंसे बने रहनेके कारण क्षेत्रका समावेश उस वर्गमें होता है, जिसे क्षर-अक्षर-विचारमें 'क्षर' कहते हैं; और क्षेत्रज्ञही परमेश्वर है । इस प्रकार क्षराक्षर-विचारके समान क्षेत्रज्ञका विचारभी परमेश्वरके ज्ञानका एक भाग बन जाता है ( गीतार. प्र. ६, पृ. १४३- १४९ ) ; और इसी अभिप्रायको मनमें लाकर दूसरे श्लोकके अंतमें यह वाक्य आया है, कि “ क्षेत्र और क्षेत्रज्ञका जो ज्ञान है, वही मेरा अर्थात् परमेश्वरका ज्ञान है ” जो लोग अद्वैत वेदान्तको नहीं मानते, उन्हें ' क्षेत्रज्ञभी मैंही हूँ' इस वाक्यकी खीचातानी करनी पडती है और प्रतिपादन करना पडता है, कि इस वाक्यसे 'क्षेत्रज्ञ' तथा ' मै परमेश्वर'का अभेदभाव नहीं दिखलाया जाता; और दूसरे कई लोग 'मेरी' (मम) पदका अन्वय 'ज्ञान' शब्दके साथ न लगा 'मतं' अर्थात् 'माना गया है' शब्दके साथ लगाकर यों अर्थ करते हैं, कि “इनके ज्ञानको मैं ज्ञान समझता हूँ।" पर ये अर्थ सहज नहीं हैं। आठवें अध्यायके आरंभमेंही वर्णन है, कि देहमे निवास करनेवाला आत्मा ( अधिदेव ) मैही हूँ, अथवा “जो पिंडमें है, वही ब्रह्मांडमे है"; और सातवेमेभी भगवानने 'जीव'को अपनीही परा प्रकृति कहा है ( ७. ५ ) इसी अध्यायके २२ वें और ३१ वें श्लोकमेंभी ऐसाही वर्णन है । अब बतलाते हैं, कि क्षेत्र-क्षेत्रज्ञका विचार कहाँ पर और किसने किया है:- ] (३) क्षेत्र क्या है, वह किस प्रकारका है, उसके और कौन कौन विकार हैं, (उसमें भी) किससे क्या होता है; ऐसे ही वह अर्थात् क्षेत्रज्ञ कौन है और उसका प्रभाव क्या है ? - इसे मैं संक्षेपमे बतलाता हू, सुन ।

तेरहवाँ अध्याय ८०३ ऋषिभिर्बहुधा गीतं छन्दोभिर्विविधैः पृथक् । ब्रह्मसूत्रपदैश्चैव हेतुमद्भिर्विनिश्चितैः ॥ ४ ॥ § § महाभूतान्यहंकारो बुद्धिरव्यक्तमेव च । इंद्रियाणि दशैकं च पंच चेन्द्रियगोचराः ॥ ५ ॥ इच्छा द्वेषः सुखं दुःखं संघातश्चेतना धृतिः । एतत्क्षेत्रं समासेन सविकारमुदाहृतम् ॥ ६ ॥ (४) ब्रह्मसूत्रके पदोंसेभी, यह विषय गाया गया है, कि जिन्हें बहुत प्रकारसे, विविध छंदोंमें, पृथक् पृथक् ( अनेक ) ऋषियोंने ( कार्यकारणरूप ) हेतु दिखला कर पूर्ण निश्चित किया है। । [ गीतारहस्यके परिशिष्ट प्रकरणमें ( गीतार. पृ. ५३३-५३८ ) हमने । विस्तारपूर्वक दिखलाया है, कि इस श्लोकमें ब्रह्मसूत्र शब्दसे वर्तमानवेदान्त । सूत्र उद्दिष्ट हैं। उपनिषद् किसी एकही ऋषिका कोई एक ग्रंथ नहीं है, । अनेक ऋषियोंको भिन्न भिन्न काल या स्थानमें जिन अध्यात्म-विचारोंका स्फुरण । हो आया, वे विचार बिना किसी पारस्परिक संबंधके भिन्न भिन्न उपनिषदोंमें । वर्णित हैं, इसलिये उपनिषद् संकीर्ण हो गये हैं, और कई स्थानोंपर वे परस्पर- । विरुद्धसे जान पडते हैं। ऊपरके श्लोकके पहले चरणमें जो 'विविध' और 'पृथक्' । शब्द हैं, वे उपनिषदोंके इस संकीर्ण स्वरूपकाही बोध कराते हैं। इस प्रकार । इन उपनिषदोंके संकीर्ण और परस्परविरुद्ध होनेके कारण, आचार्य बादरायणने । उनके सिद्धान्तोंकी एकवाक्यता करनेके लिये ब्रह्म-सूत्रों या वेदान्त-सूत्रोंकी रच- । नाकी है, और उस सूत्रोंमें उपनिषदोंके सब विषयोंको लेकर प्रमाणसहित अर्थात् । कार्यकारण आदि हेतु दिखलाकरके, पूर्ण रीतिसे सिद्ध किया है, कि प्रत्येक । विषयके संबंधमें सब उपनिषदोंसे एकही सिद्धान्त कैसे निकाला जाता है; फलतः । अर्थात् उपनिषदोंका रहस्य समझनेके लिये वेदान्त-सूत्रोंकी सदैव ज़रूरत पडती । है, अतः इस श्लोकमें दोनोंकाभी उल्लेख किया गया है। ब्रह्मसूत्रके दूसरे । अध्यायके तीसरे पादके पहले १६ सूत्रोंमें क्षेत्रका विचार और फिर उस पादके । अंततक क्षेत्रज्ञका विचार किया गया है। ब्रह्मसूत्रोंमें यह विचार है, इसलिये । उन्हें 'शारीरक सूत्र' अर्थात् शरीर या क्षेत्रका विचार करनेवाले सूत्रभी कहते । हैं। यह बतला चुके, कि क्षेत्र-क्षेत्रज्ञका विचार किसने और कहां किया है; । अब बतलाते हैं, कि क्षेत्र क्या है :-] ( ५ ) ( पृथिवी आदि पाँच स्थूल ) महाभूत, अहंकार, बुद्धि ( महान् ), अव्यक्त ( प्रकृति ), दश ( सूक्ष्म ) इंद्रियाँ और एक ( मन ); तथा ( पाँच ) इंद्रियोंके पाँच ( शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गंध - ये सूक्ष्म ) विषय, ( ६ ) इच्छा,