श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतेरहवाँ अध्याय ८०१ त्रयोदशोऽध्यायः। श्रीभगवानुवाच। इदं शरीरं कौन्तेय क्षेत्रमित्यभिधीयते। एतद्यो वेत्ति तं प्राहुः क्षेत्रज्ञ इति तद्विदः ॥ १ ॥ तेरहवाँ अध्याय [ पिछले अध्यायमें यह बात सिद्ध की गई, कि अनिर्देश्य और अव्यक्त परमेश्वरका (बुद्धिसे) चितन करनेपर अंतमें मोक्ष तो मिलता है, परंतु उसकी अपेक्षा श्रद्धासे परमेश्वरके प्रत्यक्ष और व्यक्त स्वरूपकी भक्ति करके, परमेश्वरार्पण- बुद्धिसे सब कर्मोंको करते रहनेपर, वही मोक्ष सुलभ रीतिसे मिल जाता है। परंतु इतनेहीसे ज्ञान-विज्ञानका वह निरूपण समाप्त नहीं हो जाता, कि जिसका आरंभ सातवें अध्यायमें किया गया है। परमेश्वरका पूर्ण ज्ञान होनेके लिये बाहरी सृष्टिके क्षर-अक्षर-विचारके साथही साथ मनुष्यके शरीर और आत्माका, अथवा क्षेत्र और क्षेत्रज्ञकाभी, विचार करना पडता है। ऐसेही यदि सामान्य रीतिसे जान लिया, कि सब व्यक्त पदार्थ जड़ प्रकृतिसे उत्पन्न होते हैं; तोभी यह बतलाये बिना ज्ञान- विज्ञानका निरूपण पूरा नहीं होता, कि प्रकृतिके किस गुणसे यह विस्तार होता है? और उसका क्रम कौन-सा है? अतएव तेरहवें अध्यायमें पहले क्षेत्र-क्षेत्रज्ञका विचार, और फिर आगे चार अध्यायोंमें गुणत्रयका विचार बतलाकर अठारहवें अध्यायमें समग्र विषयका उपसंहार किया गया है। सारांश, तीसरी षडध्यायी स्वतंत्र नहीं है, तथा कर्मयोगकी सिद्धीके लिये जिस ज्ञान-विज्ञानके निरूपणका सातवें अध्यायमें आरंभ हो चुका है, उसीकी पूर्ति इस षडध्यायीमें की गई है (गीतारहस्य प्र. १४, पृ. ४५४-४५६)। गीताकी कई प्रतियोंमें इस तेरहवें अध्यायमेंके आरंभमें, यह श्लोक पाया जाता है। अर्जुन उवाच :- "प्रकृतिं पुरुषं चैव क्षेत्रं क्षेत्रज्ञमेव च। एतद्वेदितुमिच्छामि ज्ञानं ज्ञेयं च केशव॥" और उसका अर्थ यह है। अर्जुनने कहा :- "मुझे प्रकृति, पुरुष, क्षेत्र, क्षेत्रज्ञ, ज्ञान और ज्ञेयके जाननेकी इच्छा है, सो बतलाओ।" परंतु स्पष्ट दीख पडता है, कि यह न जानकर, कि क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ- विचार गीतामें आया कैसे है, किसीने पीछेसे यह श्लोक गीतामें घुसेड़ दिया है। टीकाकार इस श्लोकको क्षेपक मानते हैं; और क्षेपक न माननेसे गीताके श्लोकोंकी संख्याभी सात सौमे एक अधिक बढ़ जाती है। अतः इस श्लोकको हमनेभी प्रक्षिप्तही मानकर शांकरभाष्यके अनुसार इस अध्यायका आरंभ किया है।] श्रीभगवानने कहा :- (१) हे कौन्तेय! इम शरीरकोही क्षेत्र कहते हैं। गी. र. ५१