श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें८०२ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र क्षेत्रज्ञं चापि मां विद्धि सर्वक्षेत्रेषु भारत । क्षेत्रक्षेत्रज्ञयोर्ज्ञानं यत्तज्ज्ञानं मतं मम ॥ २ ॥ § § तत्क्षेत्रं यच्च यादृक् च यद्विकारि यतश्च यत् । स च यो यत्प्रभावश्च तत्समासेन मे शृणु ॥ ३ ॥ इसे (शरीरको) जो जानता है, उसे तद्विद अर्थात् इस शास्त्रके जाननेवाले, क्षेत्रज्ञ कहते हैं । (२) हे भारत ! सब क्षेत्रोंमें क्षेत्रज्ञभी मुझेही समझ । क्षेत्र और क्षेत्रज्ञका जो ज्ञान है, वही मेरा ( परमेश्वरका ) ज्ञान माना गया है । [ पहले श्लोकमें 'क्षेत्र' और 'क्षेत्रज्ञ' इन दो शब्दोंका अर्थ दिया है; और दूसरे श्लोकमें क्षेत्रज्ञका यह स्वरूप बतलाया है, कि क्षेत्रज्ञ मैं परमेश्वर हूँ, अथवा जो पिंडमें है, वही ब्रह्मांडमें है । दूसरे श्लोकके चापि = भी शब्दोंका अर्थ यह है - न केवल क्षेत्रज्ञही, प्रत्युत क्षेत्रभी मैही हूँ । क्योंकि, जिन सातवें तथा आठवें अध्यायमें बतला चुके हैं, कि पंचमहाभूतोंसे क्षेत्र या शरीर बनता है, वे प्रकृतिसे बने हैं; और यह प्रकृति परमेश्वरकी ही कनिष्ठ विभूति है ( गीता ७. ४; ८. ४; ९. ८ ) । इस रीतिसे क्षेत्र या शरीरके पंच महाभूतोंसे बने रहनेके कारण क्षेत्रका समावेश उस वर्गमें होता है, जिसे क्षर-अक्षर-विचारमें 'क्षर' कहते हैं; और क्षेत्रज्ञही परमेश्वर है । इस प्रकार क्षराक्षर-विचारके समान क्षेत्रज्ञका विचारभी परमेश्वरके ज्ञानका एक भाग बन जाता है ( गीतार. प्र. ६, पृ. १४३- १४९ ) ; और इसी अभिप्रायको मनमें लाकर दूसरे श्लोकके अंतमें यह वाक्य आया है, कि “ क्षेत्र और क्षेत्रज्ञका जो ज्ञान है, वही मेरा अर्थात् परमेश्वरका ज्ञान है ” जो लोग अद्वैत वेदान्तको नहीं मानते, उन्हें ' क्षेत्रज्ञभी मैंही हूँ' इस वाक्यकी खीचातानी करनी पडती है और प्रतिपादन करना पडता है, कि इस वाक्यसे 'क्षेत्रज्ञ' तथा ' मै परमेश्वर'का अभेदभाव नहीं दिखलाया जाता; और दूसरे कई लोग 'मेरी' (मम) पदका अन्वय 'ज्ञान' शब्दके साथ न लगा 'मतं' अर्थात् 'माना गया है' शब्दके साथ लगाकर यों अर्थ करते हैं, कि “इनके ज्ञानको मैं ज्ञान समझता हूँ।" पर ये अर्थ सहज नहीं हैं। आठवें अध्यायके आरंभमेंही वर्णन है, कि देहमे निवास करनेवाला आत्मा ( अधिदेव ) मैही हूँ, अथवा “जो पिंडमें है, वही ब्रह्मांडमे है"; और सातवेमेभी भगवानने 'जीव'को अपनीही परा प्रकृति कहा है ( ७. ५ ) इसी अध्यायके २२ वें और ३१ वें श्लोकमेंभी ऐसाही वर्णन है । अब बतलाते हैं, कि क्षेत्र-क्षेत्रज्ञका विचार कहाँ पर और किसने किया है:- ] (३) क्षेत्र क्या है, वह किस प्रकारका है, उसके और कौन कौन विकार हैं, (उसमें भी) किससे क्या होता है; ऐसे ही वह अर्थात् क्षेत्रज्ञ कौन है और उसका प्रभाव क्या है ? - इसे मैं संक्षेपमे बतलाता हू, सुन ।