श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
पृष्ठ 848, कुल 956 में से
संदर्भ में पढ़ेंतेरहवाँ अध्याय ८०३ ऋषिभिर्बहुधा गीतं छन्दोभिर्विविधैः पृथक् । ब्रह्मसूत्रपदैश्चैव हेतुमद्भिर्विनिश्चितैः ॥ ४ ॥ § § महाभूतान्यहंकारो बुद्धिरव्यक्तमेव च । इंद्रियाणि दशैकं च पंच चेन्द्रियगोचराः ॥ ५ ॥ इच्छा द्वेषः सुखं दुःखं संघातश्चेतना धृतिः । एतत्क्षेत्रं समासेन सविकारमुदाहृतम् ॥ ६ ॥ (४) ब्रह्मसूत्रके पदोंसेभी, यह विषय गाया गया है, कि जिन्हें बहुत प्रकारसे, विविध छंदोंमें, पृथक् पृथक् ( अनेक ) ऋषियोंने ( कार्यकारणरूप ) हेतु दिखला कर पूर्ण निश्चित किया है। । [ गीतारहस्यके परिशिष्ट प्रकरणमें ( गीतार. पृ. ५३३-५३८ ) हमने । विस्तारपूर्वक दिखलाया है, कि इस श्लोकमें ब्रह्मसूत्र शब्दसे वर्तमानवेदान्त । सूत्र उद्दिष्ट हैं। उपनिषद् किसी एकही ऋषिका कोई एक ग्रंथ नहीं है, । अनेक ऋषियोंको भिन्न भिन्न काल या स्थानमें जिन अध्यात्म-विचारोंका स्फुरण । हो आया, वे विचार बिना किसी पारस्परिक संबंधके भिन्न भिन्न उपनिषदोंमें । वर्णित हैं, इसलिये उपनिषद् संकीर्ण हो गये हैं, और कई स्थानोंपर वे परस्पर- । विरुद्धसे जान पडते हैं। ऊपरके श्लोकके पहले चरणमें जो 'विविध' और 'पृथक्' । शब्द हैं, वे उपनिषदोंके इस संकीर्ण स्वरूपकाही बोध कराते हैं। इस प्रकार । इन उपनिषदोंके संकीर्ण और परस्परविरुद्ध होनेके कारण, आचार्य बादरायणने । उनके सिद्धान्तोंकी एकवाक्यता करनेके लिये ब्रह्म-सूत्रों या वेदान्त-सूत्रोंकी रच- । नाकी है, और उस सूत्रोंमें उपनिषदोंके सब विषयोंको लेकर प्रमाणसहित अर्थात् । कार्यकारण आदि हेतु दिखलाकरके, पूर्ण रीतिसे सिद्ध किया है, कि प्रत्येक । विषयके संबंधमें सब उपनिषदोंसे एकही सिद्धान्त कैसे निकाला जाता है; फलतः । अर्थात् उपनिषदोंका रहस्य समझनेके लिये वेदान्त-सूत्रोंकी सदैव ज़रूरत पडती । है, अतः इस श्लोकमें दोनोंकाभी उल्लेख किया गया है। ब्रह्मसूत्रके दूसरे । अध्यायके तीसरे पादके पहले १६ सूत्रोंमें क्षेत्रका विचार और फिर उस पादके । अंततक क्षेत्रज्ञका विचार किया गया है। ब्रह्मसूत्रोंमें यह विचार है, इसलिये । उन्हें 'शारीरक सूत्र' अर्थात् शरीर या क्षेत्रका विचार करनेवाले सूत्रभी कहते । हैं। यह बतला चुके, कि क्षेत्र-क्षेत्रज्ञका विचार किसने और कहां किया है; । अब बतलाते हैं, कि क्षेत्र क्या है :-] ( ५ ) ( पृथिवी आदि पाँच स्थूल ) महाभूत, अहंकार, बुद्धि ( महान् ), अव्यक्त ( प्रकृति ), दश ( सूक्ष्म ) इंद्रियाँ और एक ( मन ); तथा ( पाँच ) इंद्रियोंके पाँच ( शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गंध - ये सूक्ष्म ) विषय, ( ६ ) इच्छा,